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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 530 में से

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पृष्ठ 427

३७८ आत्मतत्त्वविवेके
द्वायोपन्यस्तस्तदलमननेन ।
स्यादेतत्, सिद्धोऽप्ययमीदृशो हेय एव । आत्मदर्शी हि
तदुपकारिणि रज्यते, तदपकारिणं च द्वेष्टि । रागद्वेषौ च मूलं
संसारस्य । यस्तु न तं पश्येन्, नासौ तदुपकारापकारिणमपि ।
ततो न रज्येत, न द्विष्यात्, न संसरेदिति जाङ्गलिकेन ( विष-
विद्यावता ) नैर्विष्यवत् मुमुक्षुणापि नैरात्म्यमेव भावनीयमिति
चेत्—न, अनात्मदर्शिनो मुमुक्षुत्वव्याघातात् । न ह्यात्मानम-
प्रतिसन्धाय कश्चिद् दुःखं हातुमिच्छेत् सुखं वाऽवाप्तुम् । मया
१स्वर्गापवर्गफलभागिना भवितव्यमित्यभिप्रायस्य यावदभियोगमनु-
प्रथमपादको छोडकर किये हो, किन्तु ऐसा न करो । अर्थात् प्रथम-
पादस्थ आगमसे विरोध होनेके कारण अणुत्वप्रतिपादक आगम आत्मा
की दुर्बोधता सूचित करनेके लिये है ।।
आत्माका उपादेयत्वनिरूपण
( पूर्वपक्ष ) अस्तु, प्रमाणोंसे सिद्ध हुआ भी इस तरहका आत्मा हेय
( त्याज्य ) ही है । क्योंकि आत्माका ज्ञान रखनेवाला व्यक्ति उसके
उपकारीके प्रति राग रखेगा और उसके अपकारीके प्रति द्वेष करेगा और
ये राग और द्वेष ही संसारके मूल हैं । जो तो ऐसे आत्माका ज्ञान नहीं
करेगा, वह उसके उपकारी और अपकारीको भी नहीं जानेगा और न
उसमें राग करेगा, या न द्वेष करेगा और न आवागमनरूप संसारमें
बँधेगा । अत जिस प्रकार विषवैद्य विषमे भी नैर्विष्य ( औषध ) की
भावनासे ही चिकित्सा करता है, वैसे ही मोक्षकी कामनावाले व्यक्तिको
भी नैरात्म्य ( आत्माका अभाव ) की ही भावना करनी चाहिये ।
समाधान—इस तरहकी बात नहीं कह सकते । क्योंकि जो आत्म-
दर्शी नहीं होगा वह मुमुक्षु ( मोक्षाभिलाषी ) भी नहीं हो सकता है ।
अर्थात् जो दुःखयुक्त आत्माको जानेगा, वही उसके दुःखनाशरूप मोक्षकी
इच्छा करेगा । आत्माका प्रतिसन्धान किये बिना न कोई दुःखको
१. स्वर्गापवर्गपद सुखदुःखाभावपरे इति आधारग्रन्थ टिप्पणी ।