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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 414, कुल 530 में से

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पृष्ठ 414

पीताद्यनुभवेनैवोपपद्यतां नीलाद्यनुभवेनैव वेति न कश्चिद्
विशेषः । एवं चाऽननुभूतेऽपि स्मरणप्रसङ्गो न चानुभूतेऽपीति ।
१शालिप्रभवस्य बीजस्य शालित्व'प्रतिसन्धानवन्नियम इति
चेत्, न, क्षीर-जम्बूरसपायिनील-धवलकलरवजनितविपरीतपारा-
वतवदनियमदर्शनेन तस्याप्रयोजकत्वात् । वैजात्यं तु विशेषो
भवेत्, यथा क्षीरावसेकादम्लत्वं परिहृत्य माधुर्यमुपादानानुवर्त-
अंकुर पैदा करनेमें बीजत्वमात्र प्रयोजक है, और वह किसी भी प्रकार
पृथिवीमें पहुँचकर अङ्कुर पैदा कर देता है, वैसे ही नीलादिविषयकी
स्मृतिमें भी अनुभवप्रभवत्वमात्र ही प्रयोजक है, उसे नील या पीत
विषयविशेषकी अपेक्षा नहीं है । अतः नीलादिविषयक या पीतादि-
विषयक जिस किसी अनुभवसे उपनीत होनेमात्रसे ही स्मृतिका प्रयोजक
हो जायगा । ऐसी स्थितिमें नीलविषयक अनुभवके न होनेपर भी
नीलविषयकी स्मृति होने लगेगी । क्योंकि आप उस स्मृति-प्रयोजक
अनुभवमें विषयविशेषकी अपेक्षा मानते नहीं हैं । यदि स्मृतिके प्रति
अनुभवप्रभवत्वको प्रयोजक न मानें तो अनुभूत विषयकी भी स्मृति
नहीं होनी चाहिये ।
यदि कहो कि—जैसे, शालि ( धान ) प्रभव ही बीज शालि उत्पन्न
करता है, न कि दूसरे यवादिसे उत्पन्न बीज शालि उत्पन्न करता, वैसे ही
नीलातुभवप्रभव ही नीला‌नुभवसन्तान नीलस्मरणका कारण होगा न कि
पीतानुभवप्रभव भी अनुभवसन्तान कारण होगा । अतः पूर्वोक्त अतिप्रसङ्ग
या अप्रसङ्ग-दोष नहीं होगा—तो ऐसा नहीं कह सकते हो । क्योंकि
"तत्प्रभवत्व तादृश प्रतिसन्धानका जनक है" यह नियम व्यभिचरित
है । कारण, क्षीरपान करनेवाले नीले कबूतरसे भी धवल कबूतरका तथा
जामुनका रस पीनेवाले धवल कबूतरसे भी नीलरङ्गके कबूतरका उत्पन्न
होना देखा जाता है । अतः तत्प्रभवत्त्वमात्र तादृश प्रतिसन्धानका
प्रयोजक नहीं हो सकता है ।
अनुभवितृसन्तानगत वैजात्यनामक विशेष तो प्रतिसन्धानका निया-
मक हो सकता है । अर्थात् जिस सन्तानमें नीला‌नुभव पहले नहीं हुआ
१. शालिप्रतिसन्धानवत् इति क्वचित् पाठः ।