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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 530 में से

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पृष्ठ 426

अनुपल. भवा१० ३--
मूर्तत्वे नित्यस्यास्मदादिप्रत्यक्षधर्मानाधारत्वप्रसङ्गः, विशेष-
गुणवतापारम्भकत्वप्रसङ्गश्च । सक्रियत्वे मूर्तत्वप्रसङ्ग इति
शास्त्रार्थसंग्रहः ।
अणुरेवासौ, विज्ञानामवायिकारणसंयोगाधारत्वान्मनोवत् ।
अणीयांसमणोरपीति बाधप्रतिरोधाविति१ कश्चित् । तदयुक्तम्,
आत्मन्यविभौ मनसोऽणुत्वासिद्धेः, तत्संयोगक्रमादेव क्रियाक्रमो-
पपत्तेः । आगमस्तु 'महतोऽपि महीयांसम्' इति प्रथमपादमप-
एवं आत्मा यदि मूर्त हो तो नित्य होते हुए मूर्त होनेके कारण हम
लोगोंसे प्रत्यक्ष होने योग्य सुख ज्ञान आदि गुणोंका वह आश्रय नहीं हो
सकेगा । जैसे नित्य एव मूर्त परमाणुओंके गुणोंका प्रत्यक्ष नहीं होता
है । साथ ही मूर्त होते हुए विशेषगुणवान् होनेके कारण द्रव्यका
आरम्भक भी होने लगेगा । जैसे, पृथिवी आदिका परमाणु द्वयण-
कादिका आरम्भक होता है ।
किसीका मत है कि—यह आत्मा अणु है, न कि विभु । क्योंकि
ज्ञानका असमवायिकारण जो सयोग, उसका वह आधार है, जैसे मन ।
अर्थात् ज्ञानका असमवायिकारण आत्म मन सयोग होता है, अतः उस
सयोगका आश्रयभूत मन जैसे अणु है, वैसे ही उसका आश्रयभूत
आत्मा भी अणु ही है । इस अनुमानसे विभुत्वानुमानका प्रतिरोध
हो जायगा । एवं "अणीयासमणोरपि" इस श्रुतिद्वारा बाध भी हो
जायगा—किन्तु उक्त मत अयुक्त है । क्योंकि आत्मा यदि विभु न हो
तो मनका अणुत्व ही नहीं सिद्ध हो सकेगा । कारण, आत्माके विभु
होनेके कारण युगपत् अनेक ज्ञानोंकी उत्पत्ति होने लगेगी, वैसा न हो,
इसीलिये मनकी सिद्धि की जाती है, ताकि अणु-मनके क्रमिक संयोगके
कारण ज्ञान भी क्रमसे ही हो । यदि आत्मा ही अणु हो तो आत्माके
क्रमिक-संयोगसे ही क्रमिक ज्ञान क्रियाकी उपपत्ति हो जायगी, फिर मन
को अणु सिद्ध करना ही असंभव हो जायगा । एव उक्त आगमका जो
प्रमाणके रूपमे उपन्यास किये हो वह भी "महतोऽपि महीयांसम्" इस
१ 'बाधविरोधादिति' इति क्वचित् पाठः ।