आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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त्वपटुरिति स्वदर्शनश्रद्धावतो विरुद्धधर्माध्यासादपि न भीः।
न हि स एव पटुरपटुश्चेति सम्भवति। न च स्वसंविदितरूपस्या-
जाड्यार्थं पश्यामः।
निराकारपक्षेऽपि यावानर्थो बुद्धेर्विषयस्तावति स्फुटैव सा। यत्र
चास्फुटा, नासौ तस्य (तस्या) विषयः। तथात्वे वा विषयेतरव्यवस्था
होनेसे उसमें वैजात्य नहीं होता। किंतु एसी बात नहीं है। बल्कि
सभी ज्ञान स्वभावसे ही सर्वविषयाकार होते हैं। और उनमें किसी
आकारके पटु होनेसे स्पष्टरूपसे उस आकारका उल्लेख होता है तथा
किसीके अपटु होनेसे उल्लेख नहीं होता है। अर्थात् ज्ञानोमे विषयकृत
ही वैजात्य होता है। इसीलिये पीतानुभवसे नीलप्रतिसन्धान तथा नीला-
नुभवसे पीतप्रतिसन्धानका प्रसङ्ग भी नहीं होगा—तो ऐसा नहीं कह
सकते। क्योंकि यदि सभी ज्ञान सर्वविषयाकार हों तो प्रत्येक अनुभवमे
नीलादिका उल्लेख होना चाहिये। इसके समाधानके लिये अनुभवको
नीलपी