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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 415, कुल 530 में से

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पृष्ठ 415

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मानाऽऽमलकी कालान्तरेऽपि फले माधुर्यमुन्मीलयति, लावार-
सावसेकाद् वा धवलिमानमपहाय रक्ततामनुवर्त्तमानं कार्पास-
बीजं कुसुमेषु रक्तताम् । न चैवं प्रकृतेऽपि, जपा१कुसुमाद्यु-
पधानसन्निधानेऽपि२ तद्रूपतामनादाय धवलिमानमेव सन्दधानस्य
स्फटिकस्येव विज्ञानस्य ३विषयोपधानमपगम्य४ चिद्रूपतामात्रेणानु-
वृत्तेः ।
सर्वाकारत्वमेव सर्वज्ञानानां, किन्तु कश्चिदाकारः पकड़में
है, उससे वैजात्य ही नीलस्मरणका नियामक होगा । पीतानुभवसन्तान
ऐसा ही सन्तान है, जिसमें पहले नीलानुभव नहीं हुआ रहता
है । अतः उसका विजातीय सन्तान नीलानुभवसन्तान ही होगा । इस
लिये पीतानुभवके बाद नीलस्मरणका प्रसङ्ग नहीं होगा । जैसे कि
दूधसे सींचनेके कारण अम्लत्व (खट्टापन) को छोड़कर मधुरताको
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