आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 423, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें३७४ आत्मतत्त्वविवेके
प्रवृत्त्यन्तानां कार्यकारणभावस्य इहैव जन्मनि निश्चितत्वात्,
तथा च तदभावे तदभावस्य सुलभत्वात् । अन्यथा त्वतिप्रसङ्गात् ।
अतएव नेन्द्रियाणि१ चेतयन्ते, दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थ-
ग्रहणाच्च ।
न च मनस्तथा, तस्य करणत्वेनैवानुमानादिति प्रतिबन्ध-
सस्कारका अभाव, उसके अभावमे व्याप्तिस्मरणका अभाव, उसके
अभावमें इष्टसाधनतानुमितिका अभाव, उसके अभावमे स्तन्यपानकी
इच्छाका अभाव, तथा इच्छाके अभावमें प्रवृत्तिका अभाव न्यायसिद्ध
है। यदि कारणके अभावमे भी कार्यकी उत्पत्ति मानी जाय तो सर्वत्र
कार्योत्पत्ति होने लगेगी तथा सभी कार्य आकस्मिक होने लगेंगे ।
उक्त प्राथमिक प्रवृत्तिकी अनुपपत्तिसे ही इन्द्रिया भी चेतन आत्मा
नहीं हो सकती हैं । अर्थात् इन्द्रियोंको चेतन माननेपर जन्म होनेके
वाद प्रथम-प्रथम देखने, सुनने, छूने या कुछ पकड़ने आदिमे जो बालक
की प्रवृत्ति होती है, वह नहीं हो सकेगी। क्योंकि इस जन्ममें उस
इन्द्रियको कुछ अनुभव नहीं होनेसे प्रवृत्तिका हेतु इष्टसाधनताज्ञान
अभी हुआ नहीं है । एव दर्शन और स्पर्शनकेद्वारा एक ही वस्तुका
ज्ञान होनेसे भी सिद्ध होता है कि इन्द्रियाँ चेतन नहीं हैं, किन्तु
उनसे अतिरिक्त नित्य आत्मा ही चेतन है । अर्थात् जिसे मैंने देखा
था, उसे छू रहा हूँ, अथवा जिसे छुआ था, उसे देख रहा हूँ—इस
प्रकार नेत्रसे दृष्ट वस्तुका त्वचासे और त्वचासे छुई गयी वस्तुका नेत्रसे
प्रतिसन्धान होता है, यह प्रतिसन्धान इन्द्रियोंसे अतिरिक्त स्थिर चेतन
माने विना सम्भव नहीं है । कारण, दूसरेसे दृष्टका दूसरेद्वारा प्रति
सन्धान नहीं हो सकनेसे नेत्रसे दृष्टका त्वचासे कथमपि प्रतिसन्धान
नहीं हो सकेगा । स्थिर चेतन आत्मा माननेपर तो नेत्रसे देखनेवाला
भी वही है और त्वचासे छूनेवाला भी वही है । इसलिये उक्त प्रति
सन्धानके होनेमें कोई अनुपपत्ति नहीं है ।
एवं मनको भी चेतन (ज्ञानका कर्त्ता) नहीं कह सकते । क्योंकि
१ इन्द्रियाणि न चेतयन्ते इति क्वचित् पाठ ।