आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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नान्यत्रेत्याद्यपि निरस्तम् । अतिरिक्तसंस्कारपक्षे हेतोर्व्यधि-
करणत्वात्, विशेषलक्षणस्य च स्वरूपासिद्धत्वात्, अविशिष्टोत्तर-
कार्यप्रवाहमात्रस्य च विरुद्धत्वादिति ।
न चातीन्द्रियोऽपि संस्कारः सौगतनये संभवति । तस्य ज्ञान-
त्वे परोक्षत्वानुपपत्तेः, अज्ञानत्वे ज्ञानोपादानकत्वायोगात्,
सन्तानान्तरत्वे ज्ञानस्यापि पारोक्ष्ये तदन्तःपातिनः स्मृतिसुखादे-
रिक्त संस्कारपक्षमें संस्कारत्व-हेतु व्यधिकरण (आश्रयासिद्ध) हो
जायगा । अर्थात् “संस्कार-, स्वसन्ताने स्मृतिजनकः, संस्कारत्वात्” इस
अनुमानमें संस्काररूप आश्रय (पक्ष) असिद्ध है । क्योंकि तुम
संस्कारको मानते नहीं हो । अथवा यहा हेतुके व्यधिकरण होनेका
अभिप्राय यह है कि स्वसन्तानगत संस्कार स्वसन्तानमें ही स्मृति उत्पन्न
कर सकता है, न कि प्रवृत्तिविज्ञानसन्तानमें, क्योंकि प्रवृत्तिविज्ञानसन्तान
संस्कारका अधिकरण नहीं है ।
यदि संस्कारत्वको ज्ञानगत-जातिविशेषस्वरूप मानो तो संस्कारत्वहेतु
स्वरूपासिद्ध हो जायगा । क्योंकि तुम्हारे मतमें कोई भी जाति होती ही
नहीं है और मेरे मतमें भी ज्ञानमे संस्कारत्व-जाति नहीं होती है । यदि
सस्कारका अर्थ अनुभवके बाद होनेवाला अविशिष्ट (सामान्यत) कार्य-
प्रवाहमात्र लो तो यह विरुद्ध होगा । अर्थात् नीलानुभवोत्तरकार्यप्रवाहके
अन्तर्गत नीलानुभवके बाद होनेवाला घटपटादिका सन्तान भी गृहीत
होने लगेगा, किन्तु घटपटादिका सन्तान स्मृतिरूप फल उत्पन्न करता नहीं
है । अतः उक्त प्रकारका संस्कार स्मृतिरूप फलके विरुद्ध है ।
एवं बौद्धमतमें अतीन्द्रिय स्थिर संस्कार प्रतिसन्धानका नियामक
नहीं हो सकता है । क्योंकि उस संस्कारको ज्ञानस्वरूप मानें तो वह
परोक्ष (अतीन्द्रिय) नहीं हो सकता है । कारण, बौद्धमतमे सभी
ज्ञान स्वप्रकाश होनेसे प्रत्यक्ष होते हैं । यदि उस संस्कारको ज्ञानसे
भिन्न मानें तो उसका उपादान-कारण ज्ञान नहीं हो सकेगा ।
यदि उस संस्कारको ज्ञानका सन्तानान्तर मानें तथा उस ज्ञानको भी
परोक्ष मानें, अर्थात् घट मं ... ज्ञान ... हो तो उस ...