आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 424, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिद्धिः, परलोक्यात्मसिद्धिश्च । अनादिश्चासौ वीतरागजन्मा-
दर्शनात् ।
अनन्तश्च मतोऽनादित्वात् । द्रव्यं च समवायिकारणत्वात् ।
विभुश्च नित्यद्रव्यत्वे सत्यमूर्तत्वात् । अमूर्तश्च निष्क्रियत्वात् ।
निष्क्रियश्च नित्यत्वे सति अस्मदादिप्रत्यक्षत्वात्, प्रत्यक्षधर्माश्रय-
त्वाच्चेति ।
अनुमानद्वारा मनकी सिद्धि ज्ञानके प्रति करणके रूपमे ही होती है न
कि ज्ञानके कर्त्ताके रूपमे, इसप्रकार देहत्व, इन्द्रियत्व और मनस्त्वमें
अचेतनकी व्याप्ति सिद्ध हो जाती है । साथ ही पूर्वजन्मके अनुभवके
बिना प्रथम प्रवृत्तिकी अनुपपत्तिके कारण पूर्वजन्ममें रहनेवाले परलोकी
आत्माकी भी सिद्धि हो जाती है । एव वह चेतन आत्मा अनादि भी
सिद्ध होता है । क्योंकि रागशून्य कोई भी प्राणी उत्पन्न नहीं होता है ।
अर्थात् जन्मते ही विषयमे राग पूर्वजन्मके अनुभवके कारण होता है
और उस जन्ममे जन्मते ही जो राग होता है, वह उससे भी पूर्वजन्मके
अनुभवके कारण होता है । इस प्रकार पूर्व-पूर्व जन्ममे आत्माकी सत्ता
सिद्ध होनेसे वह अनादि भी सिद्ध हो जाता है ।
एव, वह चेतन आत्मा अनन्त भी है । क्योंकि वह भाव वस्तु होते
हुए अनादि है । और वह ज्ञान इच्छा आदिका समवायिकारण होने
से द्रव्य भी है । क्योंकि द्रव्य ही किसीका समवायिकारण होता है ।
वह चेतन आत्मा विभु (व्यापक) भी है । क्योंकि वह नित्य द्रव्य
होते हुए अमूर्त है । और वह अमूर्त भी इसलिये है कि वह क्रिया
रहित है । क्योंकि जिसमें क्रिया होती है, वही मूर्त होता है । और
निष्क्रिय भी इसलिये है कि वह नित्य होते हुए हम लोगोंके प्रत्यक्षका
विषय है तथा प्रत्यक्षगुणोंका आश्रय है । अर्थात् आत्माका और उसमें
रहनेवाले ज्ञान सुखादि गुणोंका हमलोगोंको प्रत्यक्ष होता रहता है और
वह आत्मा नित्य भी है । क्योंकि जो नित्य होता है और जिसका
तथा जिसके गुणोंका प्रत्यक्ष होता है, वह निष्क्रिय होता है—ऐसा
नियम है ॥