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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 420, कुल 530 में से

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पृष्ठ 420

रपि तथाभावप्रसङ्गादिति । तदिदमुक्तरूपं प्रतिसन्धानं निमित्त-
वत्तया व्याप्तम् , अनिमित्तकत्वे नियमानुपपत्तेः । तच्चानेककर्तृ-
कत्वे नास्तीति व्यापकानुपलब्ध्या विपक्षान्निवर्तमानं निमित्तव-
त्त्वेककर्तृकत्वे विश्राम्यतीति प्रतिबन्धसिद्धिः ।
एवञ्च सति अन्वयोऽपि नर्तकीभ्रूलताक्षेपादौ द्रष्टव्यः ।
सैव हि भ्रूलता, त एव वा परमाणवः प्रतिसन्धीयमाना नाना-
ज्ञाननिमित्तत्वेऽवस्थिताः । विरुद्धधर्मविरोधिविषयत्वेन तु विशेष-

ज्ञानसन्तानके अन्तःपाती स्मृति-सुख आदि भी अतीन्द्रिय होने लगेगा
और उसका प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा ।
इस प्रकार पूर्वापर प्रतीतियोंके एकाश्रयत्वका अवगाहन करनेवाला
तथा पूर्वानुभूत अर्थका अवगाहन करने वाला प्रतिसन्धान ( प्रत्यभिज्ञा
तथा स्मरण ) निमित्तवत्तासे व्याप्त है अर्थात् उक्त प्रतिसन्धानका अवश्य
कोई निमित्त है । बिना निमित्तका हो तो प्रतिसन्धानका कोई नियम