आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलम्भवादः ३६९
तस्मात् स्वोपादान एव स्मृतिं करोतीति गत्यन्तराभावा-
दापाततिक्तमप्युपेयमेव१ । तथा च स्मृतेः कालान्तरसम्बन्धात्
संस्कारतदुपादानयोः स्थैर्यमयत्नसिद्धमवर्जनीयञ्चेति२ ।
एतेन धर्माधर्मरूपः३ संस्कारो व्याख्यातः । तथा च यो यः
संस्कारः क्वचित् सन्तान आहितः४ स तत्रैव फलाधानयोग्यो
नहीं। अतः यहाँ कोई अनुपपत्ति या आपत्ति नहीं होगी-तो यह भी
नहीं हो सकता। क्योंकि पीतसंस्कारसन्तानका उपादानकारण जो पीतानु-
भव है, वह परम्परया पीतानुभवके बाद कदाचित् होनेवाले नीला नुभव-
जन्यनीलसंस्कारसन्तानका भो उपादानकारण होगा। अत नीलसंस्कार-
सन्तानमें भी पीतस्मरण होने लगेगा।
इसलिए संस्कार अपने उपादानमें ही स्मृति पैदा करेगा-यह बात
आपातत कटु होनेपर भी दूसरा चारा नहीं होनेके कारण माननी ही
पड़ेगी और वह उपादान ही आत्मा है। तथा स्मृतिका, संस्कारके बहुत
बाद, कालान्तरसे सम्बन्ध होनेके कारण संस्कार और उसके उपादानका
स्थैर्य (स्थायित्व) भी बिना प्रयासके ही सिद्ध हो गया और वह
अनिवार्य भी है। अर्थात् अनुभवके अनन्तर वर्षों बाद भी होती हुई
स्मृति संस्कारकी और उसके उपादानकारण आत्माकी स्थिरताको
पक्षधर्मताब्रलसे स्वतः सिद्ध कर देती है।
इसीसे धर्माधर्मरूप संस्कारकी भी व्याख्या हो गयी। अर्थात् यज्ञ
और हिंसा आदिसे उत्पन्न जो धर्म-अधर्मरूप संस्कार, वे भी स्वयं के
और अपने उपादानकारण (आत्मा) के स्थिरत्वके बिना कालान्तरमे होने
वाले स्वर्ग-नरकादि फलके जनक नहीं हो सकते हैं। अतः उस दृष्टिसे
भी स्थिर आत्माकी सिद्धि होती है।
इसी प्रकार "जो जो संस्कार जिस किसी सन्तानमें आधित रहता
है, वह उसीमें स्मृतिरूप फलको उत्पन्न करनेके योग्य होता है, अन्यत्र
नहीं" इत्यादि कथन भी खण्डित हो गया। क्योंकि बुद्धिधारासे अति-
१ अभ्युपेयमिति क्वचित् पाठः २ च इति क्वचित् पाठः
३ धर्माधर्मेक्षण इति २ पु० पा० ४ संतानेनोपहित इति २ पु० पा०