आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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तर्काश्चात्र भवन्ति—आदिमत्त्वे प्रथमप्रवृत्त्यनुपपत्तौ सर्वथै-
वापवृत्तिप्रसङ्गः । सान्तत्वेऽनादेः सत्त्वानुपपत्तिप्रसङ्गः । अद्र-
व्यत्वे निर्गुणत्वप्रसङ्गः । अविभुत्वे दहनपवनादेः क्रियानुपपत्ति-
प्रसङ्गः¹ ।
न च संयुक्तसंयोगात्तदुत्पत्तिः, साक्षात् क्रियावद्द्वारकस्य
तस्याभावात् । अतथाभूतस्य च तद्धेतुत्वेऽतिप्रसङ्गात् ।
उक्त अनुमानोंमें विपक्षबाधक तर्क
उक्त अनुमानोंमें विपक्षबाधक तर्क भी हैं । जैसे, आत्मा यदि
आदिमान् हो तो जन्मकालिक प्रथम प्रवृत्ति नहीं हो सकनेके कारण उसमें
सर्वथा ही प्रवृत्तिका अभाव होने लगेगा । आत्मा यदि सान्त हो तो
अनादि होते हुए सान्त होनेके कारण वह भाव वस्तु नहीं हो सकेगा,
जैसे प्रागभाव । आत्मा यदि द्रव्य न हो तो वह निर्गुण हो जायगा ।
यदि अव्यापक हो तो अग्नि-पवन आदिमें क्रियाकी उत्पत्ति नहीं हो
सकेगी । अर्थात् नानादिग्वर्ती पवनादिमें अदृष्टवाले आत्माके संयोगसे
ही एकसाथ क्रियाकी उत्पत्ति होती है । आत्माके अव्यापक होनेपर
न सबमें एक साथ आत्माका संयोग हो सकेगा और न उनमें एक साथ
क्रियाकी उत्पत्ति हो सकेगी । किन्तु देखा यह जाता है कि एक ही
साथ अग्नि, पवन, जल आदिमें क्रिया होती रहती है । अतः सबमें
एक साथ संयोग होनेके लिये आत्माका व्यापक होना अनिवार्य है ।
यदि कहो कि—साक्षात् संयोग नहीं होनेपर भी संयुक्तसंयोगसे
पवनादिमें क्रियाकी उत्पत्ति हो जायगी । अर्थात् शरीरवृत्ति अविभु
आत्मासे संयुक्त आकाश और उससे संयुक्त होनेसे पवनादिमें क्रिया
होगी—तो ऐसा नहीं हो सकता । क्योंकि साक्षात् क्रियावान्के द्वारा
वह क्रिया नहीं हो रही है । अर्थात् संयुक्त संयोगसे जहा क्रिया होती
है, वहाँ क्रियावान्के द्वारा ही होती है । जैसे, सँडसीकी क्रियासे लोहे
में क्रिया होती है । देहसंयुक्त होनेपर भी पवनादिमें क्रिया नहीं हो
सकेगी । क्रिया रहितके साथ संयोग भी यदि क्रियाका जनक हो तो
शरीरसंयुक्त आकाशके संयोगसे जहाँ तहाँ क्रिया होने लगेगी ।
१ क्रियानुत्पत्तिप्रसङ्ग इति क्वचित् पाठ ।