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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 417, कुल 530 में से

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पृष्ठ 417

३६८ आत्मतत्त्वविवेके
न स्यात् । सांशे त्वेवं युक्तमेतदिति दर्शितं प्राक् । तस्मादतीन्द्रियः
संस्कारः परिशिष्यते । स च न सन्तन्यमानः, तत्रैव स्मृत्यादि-
प्रसङ्गे प्रवृत्तिसन्ताने फलानवकाशप्रसङ्गात् । १अन्यत्र संस्कारे-
ऽन्यत्र फलेऽतिप्रसङ्गात् । परम्परैकोपादानतया नियमे
संस्कारान्तरसन्तानेऽपि स्मृतिप्रसङ्गात् ।
युक्त है। क्योंकि उस वस्तुको हम सावयव मानते हैं। साथ ही
अवयवोंमें परस्पर भेद होनेसे मेरे मतमें विरुद्धधर्मका संसर्ग दोष भी
नहीं होगा। क्योंकि भिन्न अवयवको स्फुट कहा जाता है और भिन्न
अवयवको अस्फुट कहा जाता है, न कि एक ही अवयवको स्फुट और
अस्फुट कहते हैं।
अतः अनुभवसे उत्पन्न जो अतीन्द्रिय संस्कार, वही स्मृतिके निया-
मकके रूपमें बच जाता है। किन्तु उस सन्तन्यमान (अस्थायी)
संस्कारको अर्थात् संस्कारके सन्तानको स्मृतिनियामक नहीं मान सकते।
क्योंकि तब संस्कारोंके सन्तानमें ही स्मृति और स्मृतिजन्य इच्छा आदि
फल हो सकेगा तथा प्रवृत्तिविज्ञानके सन्तानमें स्मृत्यादिरूप फल नहीं
हो सकेगा। ऐसी स्थितिमें "अहं घटं स्मरामि" इत्यादि प्रतीति नहीं
हो सकेगी। क्योंकि प्रवृत्तिविज्ञानधाराका अन्तःपाती ज्ञान ही अहमा-
स्पद होता है, संस्कार नहीं।
यदि भिन्न सन्तानोंमें संस्कार मानो और भिन्न सन्तान (प्रवृत्ति-
विज्ञानसन्तान) में स्मृतिरूप फल मानो तो अतिप्रसङ्गरूप दोष हो
जायगा। अर्थात् नीलसंस्कारसे भी पीतस्मरण होने लगेगा।
यदि यह नियम करो कि—परम्परया समान उपादानकारणसे उत्पन्न
संस्कार ही स्मृत्यादि फल उत्पन्न कर सकेगा, अतः अतिप्रसङ्ग दोष नहीं
होगा। अर्थात् एक ही नीलानुभवरूप उपादान-कारणसे संस्कारोंका
भी सन्तान उत्पन्न होता है और प्रवृत्तिविज्ञानोंका भी सन्तान उत्पन्न
होता है। अतः यहाँका संस्कार अपने समान उपादान कारणसे उत्पन्न
होने वाले प्रवृत्तिविज्ञानसन्तानमें स्मृति पैदा करेगा, दूसरे सन्तानमें
१. यदप्यतिप्रसङ्गादिति क्वचित् पाठः ।