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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 530 में से

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पृष्ठ 413

३६४ आत्मतत्त्वविवेके
वा ? विशेषोऽप्यनुभवप्रभवत्वमात्रं वा ? अनुभवितृसन्तान-
वैजात्यं वा ?
तत्र न प्रथमः, अनुत्पन्नानन्वयध्वस्तयोर्विशेषात् । नापि
दृश्योऽन्यः, तस्यानुपलब्धिबाधितत्वात् । नाप्यनुभवप्रभवत्व-
मात्रं विशेषः, न हि कर्मकरकरोपनीतमेव बीजं क्षितिमासाद्याङ्कुरं
कुरुते न तु प्रमादपतितम् । तथा नीलाद्यनुभवप्रभवसन्तानः १
है । इसीलिये जिस सन्तानसे पहले नीलानुभव नहीं हुआ है, उसीसे
वैजात्य यहाँ विवक्षित है । अतः जो अननुभूत है, उसका स्मरण-
प्रसङ्ग यहाँ नहीं होगा । यह अन्तिम विकल्पका अभिप्राय है ।
उपर्युक्त पक्षोंमें प्रथमपक्ष नहीं हो सकता है । क्योंकि नहीं उत्पन्न
होना या निरन्वयध्वस्त हो जाना, इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है ।
अर्थात् चिरकाल पूर्वमें उत्पन्न होकर नष्ट हुआ अनुभव बहुत कालके
बाद होनेवाली स्मृतिका कारण नहीं हो सकता, जो वस्तु अपना प्रति-
निधित्वरूप कोई दूसरी वस्तु पैदा किये बिना ही विलीन हो जाती है,
यह स्वयं भी नहीं पैदा हुएके समान है । अतः पूर्वोत्पन्न नीलानुभवका
निरन्वय-ध्वंस हो जानेके कारण नहीं उत्पन्न हुएके बराबर होनेसे वह
कालान्तरमें नीलकी स्मृति नहीं करा सकेगा । अनुभवके बाद होने-
वाली बुद्धिधारासे अन्य दृश्यभूत संस्कार भी स्मृतिका कारण
नहीं हो सकता है । क्योंकि उपलब्धि नहीं होनेसे उक्त संस्कार ही
बाधित है ।
“अनुभवोत्तरकालिक बुद्धिधारागत जो अनुभवप्रभवत्वमात्रस्वरूप
विशेष है, वही संस्कार है, जो भावी स्मृतिका जनक है” यह पक्ष भी
ठीक नहीं है । क्योंकि यह नियम नहीं है कि श्रमिकके हाथसे समझ
बूझकर डाला हुआ बीज ही पृथ्वीमें पहुँचकर अङ्कुर पैदा करता हो और
प्रमादसे गिरा हुआ न करता हो । वैसे ही नीलानुभव सन्तान (नील-
बुद्धिधारा) पीतानुभवसे ही उपनीत हो या नीलानुभवसे ही उपनीत,
इनमें स्मृति पैदा करनेके सम्बन्धमें कोई विशेषता नहीं है । अर्थात् जैसे
१. नीलाद्यनुभवसन्तानः इति क्वचित् पाठः ।