सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 412, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 412

स्यापि भेदस्याग्रहोऽभेदारोपौपयिकतया तन्न न सम्भवतीत्युक्तत्वा-
दिति ॥
अथवा इहानुभवः१ कालान्तरभाविनीं स्मृतिं जनयेत् ?
•तज्जनितो वा संस्कारः ? सोऽप्यतीन्द्रियः ? प्रत्यक्षसिद्धो वा ?
अतीन्द्रियोऽपि तावत्कालावस्थायी२ ? सन्तन्यमानो वा ?
प्रत्यक्षसिद्धोऽपि तदुत्तरबुद्धिधारारूपः ? तदन्यो वा ? तद्विशेषो
भी अभेदग्रह होने लगेगा । यदि भेदमें सत्त्व आरोपित हो तो उसका
अग्रह नहीं हो सकता । क्योंकि जब आरोप है तो अग्रह कैसा ? भेदमें
असत्त्वका आरोप रहते हुए उसका अग्रह कहो तो भेदमें पारमार्थिकत्व
आ जायगा, क्योकि उसमें असत्त्वको आरोपित मानते हो । इस प्रकार
वह अलीक नहीं हो सकता ।
यदि व्यधिकरण अर्थात् दूसरेके भेदके अग्रहसे अभेदका आरोप
मानो तो जिस किसीके भेदके अग्रहसे घटपटादिमें भी अभेदारोप
होने लगेगा । एव सत्-असत् आदि कोटियोंसे रहित अनिर्वचनीय
भेदके अग्रहसे अभेदारोप माननेमें सर्वत्र अभेदारोपका प्रसङ्ग होने
लगेगा ॥
स्थिर-आत्मसाधनमें अन्य प्रकार
अथवा यह बताओ कि कालान्तरमें होनेवाली स्मृतिके प्रति अनुभव
कारण है ? या अनुभवसे उत्पन्न संस्कार ? वह संस्कार भी अतीन्द्रिय
है ? या प्रत्यक्ष-सिद्ध है ? यदि अतीन्द्रिय हो तो स्मृति उत्पन्न होनेके
समय तक स्थायी है ? अथवा क्षणिक होनेके कारण सन्तन्यमान अर्थात्
धारारूप है ? यदि प्रत्यक्ष-सिद्ध वह संस्कार हो तो यह अनुभवके बाद
होने वाली बुद्धियोंकी धारारूप है ? या उससे भिन्न है ? अथवा
अनुभवोत्तरकालिक बुद्धिधारागत कोई विशेष (धर्म) है ? वह
विशेष भी अनुभवप्रभवत्वमात्र है ? या अनुभवितृसन्तानगत वैजात्य
है ? अर्थात् नीलानुभवके बाद जिन बुद्धियोंका सन्तान जारी रहता
है, सान्तानिकभूत उन बुद्धियोंमें ही रहने वाला वैजात्य अभिप्रेत
१. कि म् इत्यपि क्वचित् पाठः । २. तत्कालावस्थायी इति क्वचित् पाठः ।