आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलम्भवादः ३८१
हि तस्य हानं विनाशो, नित्यत्वात् । नापि विप्रयोगो, व्यापक-
त्वात् । नाप्यप्रतिपत्तिः, यथा यथा तदर्थं यत्नः, तथा तथा
प्रतिपत्तेः । उपेक्षात इति चेत्, कृतैवैतावन्तं कालमुपेक्षा,
तथापि तद्धानासिद्धेः ।
निष्प्रयोजनं चैतत् , सोपाधेर्हि त्यागो दुःखहानाय, निरु-
पाधेस्तु किमर्थम् ? पुनः सोपाधित्वशङ्कया इति चेत्, न, बीजा-
भावादिति । कुतः पुनरुपादेयः ? तथा मति भावनाक्रमेण
उसके त्यागका अर्थ उसका विनाश नहीं है, क्योंकि यह नित्य है । त्याग
का अर्थ दूर हो जाना या व्यवहित हो जाना भी नहीं है, क्योंकि आत्मा
व्यापक है । अप्रतीतिको भी आत्माका त्याग नहीं कहा जा सकता ।
क्योंकि अप्रतीतिरूप त्यागके लिये जैसे जैसे यत्न किया जायगा, वैसे
वैसे उसकी प्रतीति ही होती जायगी । यदि कहो कि—उपेक्षासे अप्रतीति
की सिद्धि हो जायगी, अर्थात् आत्माकी प्रतीतिके लिये कोई यत्न ही
नहीं किया जायगा, अतः उसकी अप्रतीति स्वतः हो जायगी—तो आपने
इतने समय तक आत्मज्ञानके प्रति उपेक्षा की ही, फिर भी आत्माका हान
( अप्रतीति ) नहीं सिद्ध हुआ । अर्थात् "अहं गौरः अहं सुखी ' इत्यादि
ज्ञानकी धारा चलती ही रहती है । अतः आत्माका त्याग किया जाना
प्रत्येक दृष्टिसे अशक्य है ।
एवं निरुपाधिक आत्माका हान निष्प्रयोजन भी है । क्योंकि
सोपाधिक आत्माका त्याग दुःखसे छुटकारा पानेके लिये अपेक्षित है,
किन्तु निरुपाधिक आत्माका त्याग किसलिये अपेक्षित है ? यदि कहो
कि—सोपाधिककी आशङ्कासे अर्थात् शरीर-इन्द्रिय आदि उपाधिका
भविष्यमे पुनः संसर्गे हो जानेकी आशङ्कासे निरुपाधिक आत्माका भी
त्याग अपेक्षित है—तो यह नहीं कह सकते । धर्माधर्म या मिथ्याज्ञान-
रूप बीजका अभाव हो जानेसे ही आत्माको पुनः शरीरग्रहणकी आशङ्का
नहीं रहेगी ।
यदि यह पूछो कि—आत्मा यदि हेय नहीं है तो उपादेय ( ग्राह्य )
भी क्यों है ?—तो इसका उत्तर यह है कि न्यायके अनुसार आत्माका