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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 530 में से

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पृष्ठ 428

अनुपलम्भवादः ३ *
वृत्तेः। अननुवृत्तावभियोगनिवृत्तौ फलासिद्धेः।
इत्थञ्च नैरात्म्यदृष्टिर्नास्तिक्यं दृढयेत्। तच्च प्रबलविषय-
तृष्णानिष्णतं१ मनर्थमनन्तं प्रसुवीत। न चेदेवम्, कुतो "याव-
ज्जीवेदि"त्यादयो निःशङ्कमुल्लापाः२।
यदुक्तमुपकारिणि रज्येत अपकारिणं द्विष्यादिति, तदेवमे-
तत्। यो हि मोक्षमुपकारं मनुते, स तद्धेतौ रक्तः, तमुपाददानः
तत्परिपन्थिनं द्वेषादलंप्रत्ययाद्वा परिहरन्नेव समीहितं समासाद-
छोड़नेकी इच्छा करेगा और न सुखको पानेकी। मैं स्वर्ग और अपवर्ग
फलका भागी बनूँ यह इच्छा तबतक बनी रहती है, जबतक कि सुख
पाने और दुःख छोड़नेका प्रयत्न जारी रहता है। उक्त इच्छाकी
अनुवृत्ति नहीं रहनेपर प्रयत्न की भी निवृत्ति हो जायगी और प्रयत्नके
अभावमें स्वर्गादि फल भी नहीं सिद्ध हो सकेगा। अर्थात् उक्त फलेच्छा
से सिद्ध होता है कि आत्मतत्त्वका ज्ञान अनिवार्य है।
एवं, यह नैरात्म्यबुद्धि नास्तिक्यको अर्थात् 'न परलोक है और न
कर्मफल होता है' इस तरहके निश्चयको और दृढ़ करेगा तथा वह
नास्तिक्य प्रबल विषय-तृष्णासे भरे हुए अनन्त अनर्थोंको उत्पन्न करेगा।
यदि ऐसा न करता तो क्यों--
"यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।"
इत्यादि निःशङ्क प्रलाप होते ? अर्थात् नास्तिक्यके कारण उत्पन्न
विषय-तृष्णाकी वजहसे ही उक्त प्रलाप नास्तिकोंकी ओरसे किये
जाते हैं।
और जो यह कहा कि--आत्माका प्रतिसन्धान करनेवाला व्यक्ति
आत्माके उपकारीके प्रति राग करेगा और अपकारीके प्रति द्वेष करेगा--
तो यह ऐसा ही है। अर्थात् उक्त कथन ठीक ही है। क्योंकि जो
मोक्षको उपकारके रूपमें मानता है, वह मोक्षके हेतुमें रागवान् होकर
उसे ग्रहण करता हुआ तथा उसके बाधकको (भोगेच्छाको) द्वेषबुद्धि
१. सम्प्लुतम् इति १ पु० पा० । २. निःशङ्कप्रलापाः इति १ पु० पा०