आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 421, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंणीयमत्र प्रतिसन्धानम् । अन्यथा य एव बालस्त्वया दृष्टः, स
एव युवा मया दृश्यत इत्यनेनानैकान्तात् ।
१न चासिद्धमिदं विशेषणं देहस्यैव चेतनत्वात् । मैवं ।
देहत्वमूर्तत्वभूतत्वरूपादिमत्त्वादिभ्यः । न च भूतानां समुदाये
पर्यवसिते चैतन्यम्, प्रतिदिनं तस्यान्यत्वे पूर्वपूर्वदिवसानुभूत-
स्यास्मरणप्रसङ्गात् ।
अभेदकी सिद्धि नहीं होगी । अतः अभेदसाधक प्रतिसन्धानमे विरुद्ध
धर्मरहितविषयकत्वरूप विशेषण देना चाहिये । यदि ऐसा विशेषण
नहीं दिया जायगा तो—जिसे तूने बालक देखा था, उसे ही मैं युवा देख
रहा हूँ—यहा भी अभेद प्रतिसन्धान होनेसे विषय तथा दोनों आत्माओं
में अभेद सिद्धि होने लगेगी । अर्थात् यहाँ दृश्यांशमे बालत्व और
युवत्वरूप विरुद्धधर्मका अध्यास होनेसे विषयांशमें अभेद नहीं होता है
तथा द्रष्टाके अंशमे भी त्वया और मयाके रूपमे विरुद्ध धर्मका अध्यास
होनेसे द्रष्टाके अशमें भी अभेद नहीं होता है । तात्पर्य यह है कि
“योऽहं घटमद्राक्षम् सोऽहं स्पृशामि” यह प्रतिसन्धान ही स्थिर आत्मा-
की सत्तामे प्रमाण है, क्योंकि यहाँ विरुद्ध धर्म आदि कोई बाधक
नहीं है ।
यदि कहो कि—विरुद्धधर्मरहितविषयत्वरूप विशेषण आत्माके
सम्बन्धमे असिद्ध है, क्योंकि देह ही चेतन आत्मा है, और उसमें
परिमाणभेदसे प्रतिदिन विरुद्धधर्मका अध्यास हुआ करता है—तो ऐसा
नहीं कह सकते हो । क्योंकि देहत्व, मूर्तत्व भूतत्व तथा रूपवत्त्व आदि
हेतुओंसे देहमें चेतनत्वका अभाव ही सिद्ध होता है । अर्थात् ‘देहो
न चेतन , मूर्तत्वात्, भूतत्वात्, रूपवत्त्वात्, रसवत्त्वात् पृथिव्यादिवत्’
इत्यादि अनुमानोंसे शरीर अचेतन ही सिद्ध होता है । अत देहको
चेतन आत्मा नहीं कह सकते ।
एव देहको चेतन माननेमें देहगत भूतसमुदायमे चैतन्य नहीं हो
सकता, क्योंकि देहगत भूतसमुदायके प्रतिदिन बदलते रहनेके कारण
पूर्वदिनमें अनुभूत वस्तुका दूसरे दिन स्मरण नहीं हो सकेगा । क्योंकि
१ नचासिद्धम् इति पाठो युज्यते ।