आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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अलीकं वेति ? नाद्यो, दूषितत्वात् । न द्वितीयः, स्वयमनभ्युप-
गमात् । योऽप्यभ्युपगच्छेत् सोऽपि विरुद्धधर्माध्यासाद् भेद-
मिच्छेत्, तन्निवृत्तौ च तन्निवृत्तिम् ।
न तृतीयः, अहमिति विकल्पस्य सवस्तुकतायाः प्रागेव प्रमा-
धनात् । अवस्तुकत्वेऽपि न तत्र प्रकृतोपयोगिभेदाऽग्रहसंभवः,
सदसदारोपितसदारोपितासत्त्वव्यधिकरणाव्यपदेश्यभेदेन षड्विध-
है, या उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है, अथवा अलीक (मिथ्या)
है ? इनमें आद्यपक्ष नहीं हो सकता । क्योंकि विज्ञानवादका खण्डन
करते हुए पूर्वमे इसका भी खण्डन किया जा चुका है। द्वितीय भी
नहीं होगा । क्योंकि विज्ञानसे अतिरिक्त वस्तुकी सत्ता तुम स्वयं नहीं
मानते हो । यदि मानो तो विज्ञानसे अतिरिक्त एव विज्ञानका विषय-
भूत वह वस्तु ही आत्मा सिद्ध हो जाती है। जो भी विज्ञानसे अतिरिक्त
विषयकी सत्ता मानता है, वह भी उस विषयमें विरुद्ध धर्मोंका अध्यास
होनेपर ही भेद स्वीकार कर सकता है और अध्यासके अभावमे अभेद।
अर्थात् उक्त अहम्प्रतीतियोँका विषय जो विज्ञानातिरिक्त अहमर्थ है,
उसमें विरुद्ध धर्मों की प्रतीति नहीं होनेसे वही एक पूर्वापरमे अभिन्न
आत्मा सिद्ध हो जाता है ।
विषयदृष्टिवाला तीसरा अलीकपक्ष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि
"अहम्" इस विकल्पकी सवस्तुकता पहले ही अर्थात् "प्रत्यक्षपृष्ठभा-
बित्वे साक्षादेव सवस्तुक" इत्यादि वचनसे ही सिद्ध की जा चुकी है।
यदि यह विकल्प अवस्तुविषयक हो तो भी वहाँ अभेद-प्रतिसन्धानमें
उपयोगी जो भेदका अग्रह, वह नहीं हो सकेगा । क्योंकि सत् भेद,
असत् भेद, जिसमें सत्ता आरोपित है ऐसा भेद जिसमे असत्ता
आरोपित है ऐसा भेद, व्यधिकरण भेद तथा अव्यपदेश्य भेद ये
छहों प्रकारके भेदका अग्रह नहीं हो सकेगा, जो कि अभेदारोप करा
सके । यह बात भी द्वितीय परिच्छेदमें ही कही जा चुकी है ।
अर्थात् सत्भेदका अग्रह नहीं हो सकता, क्योंकि जो अलीक हैं, उनमें
सत्भेद रह ही नहीं सकता जिसका अग्रह हो । यदि भेदको असत्
मानो तो असत्भेदके अग्रहसे अभेदका ग्रह माननेपर अतिव्या-
प्तिदोष आ जायगा । अर्थात् जहाँ अभेदग्रह नहीं होना चाहिये वहाँ