आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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येत, न तु विपर्ययात् । यस्तु भोगम्, सोऽपि तथा, इत्यनुकूल-
मेव प्रतिकूलत्वेन गृहीतं मन्दैः । अन्यत्रानुरज्येत, अन्यत्रापि
द्विष्यादिति न दृष्टं गोवैद्यकेऽपीति ।
तथापि दुःखहेतुत्वादिन्द्रियादिवदसौ हीयतामिति चेत्,
यादृशो दुःखहेतुस्तादृशो हेय एव, सोपाधिश्च तथा । निरुपाधि-
रपि हीयतामिति चेन्न, अशक्यत्वात् , निष्प्रयोजनत्वाच्च । न
या अलंबुद्धिसे दूर करता हुआ अपने अभीष्ट ( मोक्ष ) को प्राप्त कर
सकता है, न कि इसके विपरीत भोगोंके सेवनसे ।
एवं, जो तो भोगको अपने उपकारके रूपमे मानता है, वह भी
वैसा ही करता है । अर्थात् भोगानुकूलमें राग करता हुआ तथा भोगमे
बाधकका परिहार करता हुआ ही अपने अभीष्ट भोगको प्राप्त कर सकता
है । अत यह राग और द्वेष तो अभीष्टके ही साधक हैं । किन्तु
मन्दबुद्धियोंने अनुकूलको ही प्रतिकूलके रूपमें समझ लिया है । अन्यत्र
अर्थात् जो अभीष्ट नहीं है उसमें यदि राग हो तथा जो अभीष्ट हो
उसीमें द्वेष हो तो वह राग और द्वेष प्रतिकूल हो सकता है । किन्तु
ऐसा तो गो-चिकित्सकमे भी नहीं देखा जाता है । क्योंकि गौका चीरना
फाड़ना महान् अनर्थका कारण है, फिर भी चिकित्सक उसे रोगसे मुक्त
करनेके उद्देश्यसे उसकी शल्य-चिकित्सा करता ही है और उसका पाप
उस चिकित्सकको नहीं लगता है । उसी प्रकार राग-द्वेष भी स्वरूपतः
अनर्थका हेतु नहीं होता है, यदि उसका उद्देश्य कल्याणमय हो ।
अतः मुक्तिमें राग करना और उसके प्रतिबन्धकमें द्वेष करना उचित
ही है ।
फिर भी दुःखका हेतु होनेके कारण इन्द्रिय विषय तथा देहादिके
समान यह आत्मा त्याज्य होगा, ऐसा यदि कहो तो जिस तरहका आत्मा
दुःखका हेतु है, वैसा त्याज्य ही है । और शरीर-इन्द्रिय आदि उपाधिसे
युक्त ही आत्मा दुःखका हेतु है । यदि कहो कि-उपाधि विहीन शुद्ध
आत्मा भी त्याज्य होगा-तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि उपाधि-
रहित आत्माका त्याग असंभव है और निष्प्रयोजन भी है । क्योंकि