आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
१२ आत्मतत्त्वविवेक
अस्तु तर्हि तस्यैव तेनैव सहकारिणा संबन्धोऽसंबन्धश्चेति
विरोधः, न, विकल्पानुपपत्तेः । तथाहि संबन्धिनः संबन्ध्यन्तरे स्वा-
भावस्वाभाव्यं वा विरुध्येत ? अभावप्रतियोगित्वं वा ? तदैवेति
सहितं वा ? तत्रैवेति सहितं वा ? उभयासहितं वा ? तथैवेति
सहितं वेति ?
न प्रथमः, अनभ्युपगमात् । न द्वितीयः, सत्कार्यप्रतिषेधात् १।
न तृतीयः, प्राक्प्रध्वंसाभावयोर्विद्यमानकालत्वानभ्युपगमात् ।
परस्पर भिन्न होना ही करण और अकरणका विरोध है" यह पूर्वोक्त
तृतीयपक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि इस प्रकारका विरोध माननेमे
परस्परमे भिन्न होनेमात्रसे कृतकत्व और अनित्यत्वमे भी विरोधका
प्रसङ्ग हो जायगा ।
(शङ्का) तब उसी (बीज) का उसी सहकारीके साथ कभी सम्बन्ध-
का होना और कभी न होना ही विरोध होवे ।
(उत्तर) यह नहीं कह सकते हो, क्योंकि अग्रिम विकल्पोंमे कोई
भी विकल्प नहीं बन सकता है ।
जैसे, क्या दूसरे सम्बन्धीको एक सम्बन्धीका अभावरूप होना
विरुद्ध होगा ? अर्थात् एक सहकारीका दूसरा सहकारी अभावस्वरूप
ही है और भाव और अभावका सम्बन्ध कभी हो नहीं सकता है, यही
विरोध है ? अथवा भावरूप एक सहकारीका दूसरे सहकारीमे
अभावप्रतियोगित्वरूप असमवधान विरुद्ध होगा ? अथवा जिस क्षणमे
अपना समवधान है उसी क्षणमे उसका असमवधान विरुद्ध होगा ?
अथवा जिस जगह समवधान है वहीं असमवधानका होना विरुद्ध
होगा ? अथवा उसी क्षण और उसी देशमें उसका समवधान और
असमवधानका होना विरुद्ध होगा ? अथवा जिस रूपसे समवधान हो
उसी रूपसे असमवधानका होना विरुद्ध होगा ?
इनमे प्रथमपक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि एक सम्बन्धीका अभावरूप
दूसरे सम्बन्धीको हम नहीं मानते हैं । दूसरा भी ठीक नहीं है,
१. प्रतिषेधात्—२ पु० पा०
न चतुर्थः, स हि न तावत् स्थितियौगपद्यनियमेन, संबन्धि-
नोरतदसिद्धेः । इत एव तत्सिद्धावितरेतराश्रयत्वं, नियमसिद्धौ
हि विरोधसिद्धिः तत्सिद्धौ च भेदे सति नियमसिद्धिरिति ।
न चान्यतस्तत्सिद्धिरस्तदभावात् अनियतोपसर्पणापसर्पणका-
रणप्रयुक्तत्वाच्च संबन्धासंबन्धयोः । नापि विनाशस्य अहेतुकत्वात्
अयं विरोधोऽर्थात् सिद्ध्यति, तस्याप्यसिद्धेः । ध्रुवभावित्वे तु
पश्यामः । नापि पञ्चमः, न हि तदैव तत्रैव स एव सहकार्यस्ति
नास्ति चेति अभ्युपगच्छामः ।
क्योंकि सत्कार्यवादका तुम्हारे यहाँ निषेध है । अर्थात् सत्कार्यवादमें
ही भावका अभाव नहीं होता है । तीसरा भी नहीं हो सकता है,
क्योंकि केवल प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव ही भावके कालमे नहीं माना
जाता है । अत्यन्ताभाव तो देशभेदसे भावकाल मे भी रहता ही है ।
चतुर्थ प्रकारका विरोध भी ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त प्रकारका
विरोध तब सिद्ध होता जब कि—सम्बन्धियोंमें एकके सत्ताकालमें
बिना किसी व्यवधानके दूसरेकी अवश्य सत्ता है—ऐसा नियम होता ।
किन्तु यह नियम ही असिद्ध है । यदि ऐसा मानो कि इस विरोधसे ही
यह नियम सिद्ध हो जायगा, तो यहाँ अन्योन्याश्रय दोष आ जायगा ।
क्योकि नियमकी सिद्धि होनेपर विरोधकी सिद्धि होगी और विरोधके
सिद्ध होनेपर धर्मीमे भेद सिद्ध होकर सभी सहकारियों (सन्वन्धियों)
के एक साथ रहनेके नियमकी सिद्धि होगी ।
किसी दूसरे प्रमाणसे भी उक्त नियमकी सिद्धि नहीं हो सकती,
क्योंकि वैसा कोई प्रमाण नहीं है । एवं सहकारियों का परस्पर उप-
सर्पण और अपसर्पण अनियत है और इसी कारण उनमें सम्बन्ध और
असम्बन्ध दोनों ही होते हैं ।
यह भी नहीं हो सकता कि—किसी वस्तुके विनाशमें हेतुकी
अपेक्षा नहीं होनेसे सभी वस्तु क्षणिक होगी, अतः उसमे सम्बन्ध और
असम्बन्धका विरोध स्वतः सिद्ध हो जायगा—क्योंकि बिना हेतुका
५४ आत्मतत्त्वविवेक
ननु समवधानं नाम सहकारिणा धर्मः संयोगो भवद्भिरिष्यते,
स च तेभ्यो व्यतिरिक्तोऽव्याप्यवृत्तिश्चेत्यपि। तथा च स एव
तदैव तत्रैवास्ति नास्ति चेति। अनतिरेके स्थिरवादिनो व्यस्ता-
न्यपि बीजवारिधरणिधामानि तान्येवेति तेभ्योऽपि कार्योत्पत्ति-
प्रसङ्गः। व्याप्यवृत्तित्वे च सर्वत्र रक्तादिदिभ्रमः शब्दादिकार्यो-
त्पत्तिप्रसङ्गश्च। तस्मादसंयुक्तेभ्योऽय एव संयुक्तस्वभावाः पर-
माणवो जाता इत्येव ज्यायः।
विनाश भी असिद्ध है। यदि कहो कि वस्तुओंका विनाश ध्रुव है
इसलिये विनाशमे किसी हेतुकी अपेक्षा नहीं है—तो इसके सम्बन्ध
मे आगे कहेंगे।
एव पाचव प्रकारका विरोध भी नहीं हो सकता है। क्योंकि—
उसी कालमे उसी स्थानमें वही सहकारी है भी और नहीं भी है-ऐसा
हम नहीं मानते हैं।
(शङ्का) समवधानको भी आप सहकारियोंका धर्म और संयोग
रूप मानते हैं और यह भी मानते हैं कि वह समवधान उन
सहकारियोंसे अतिरिक्त और अव्याप्यवृत्ति (एकदेशी) भी है। तब
वही समवधान (संयोग) उसी समय यहीं पर है भी और
नहीं भी है, इस प्रकार विरोध आ जाता है। यदि वह
समवधान सहकारियोंसे अतिरिक्त न हो तो चूँकि स्थिरवादीके मतसे
छिटफुट रहनेवाले भी बीज, पानी, पृथ्वी और प्रकाश वे ही हैं,
इसलिये छिटफुट रहनेकी स्थितिमें भी उनसे अङ्कुररूप कार्यकी
उत्पत्ति होनी चाहिये। यदि संयोगको एकदेशी न मानकर व्याप्यवृत्ति
मानें तो एक भागमे रङ्गका संयोग होनेपर सर्वांशमे लालिमाकी
प्रतीति होनी चाहिये और आकाशके एक भागमें नगाडके संयोगसे
सम्पूर्ण आकाशम शब्दकी उत्पत्ति होनी चाहिये। इसलिये असंयुक्त
परमाणुओंसे दूसरे ही संयुक्त स्वभाववाले परमाणु उत्पन्न होते हैं,
यही मानना समुचित है। अर्थात् परमाणुपुञ्जसे या सहकारिसमूह-
से अतिरिक्त संयोग नहीं है। इस प्रकार क्षणभङ्गवाद सिद्ध हो
जाता है।
क्षणभङ्गवादः ५५
नैतदेवम्, क्षणिकपरमाणावप्यस्य विरोधस्य दुर्वारत्वात् ।
तथाहि पूर्वदिगवस्थितः परमाणुर्यथाऽपरदिगवस्थितेन परमाणु-
नाऽपरदिगवच्छेदेनावृतरूप उत्पन्नः, तथैव किं पूर्वदिगवच्छे-
देनापि न वा ? उभयथा वा ? आद्ये उभयतोऽप्यनुपलब्धिप्रसङ्गः ।
द्वितीये तु उभयतोऽप्युपलम्भापत्तिः । तृतीये पुनः स एव दुरात्मा
विरोधः, स एव तेनैव तदैवावृतोऽनावृतश्चेति ।
प्रकारभेदमुपादायाविरोध इति चेत्, कः पुनरसौ¹ दिगन्तरा-
वच्छेदः ? यदि हि यदिगवच्छेदेनैव संयुक्तस्तदिगवच्छेदेनैवासंयु-
( उत्तर ) ऐसा पूर्वपक्ष ठीक नहीं है । कारण, क्षणिक परमाणुमें
भी इस प्रकारका विरोध नहीं रोका जा सकता है । क्योंकि, पूर्व
दिशामें स्थित परमाणु अपर दिशामे स्थित परमाणुसे जैसे अपर भागकी
ओर आवृत ( ढँका ) होकर पैदा होता है, वैसे ही क्या वह पूर्वभागकी
ओर भी आवृत ही होता है ? या पूर्वभागके समान अपरभागकी ओर
भी अनावृत ( बिना ढँका ) उत्पन्न होता है ? अथवा एक भागकी ओर
अनावृत और दूसरे भागकी ओर आवृत दोनों ही प्रकारका होता है ?
यहाँ प्रथम पक्षमें उसकी दोनों ही ओर अनुपलब्धि होनी चाहिये ।
द्वितीय पक्षमें दोनों ही ओरसे उपलब्धि ( प्रत्यक्ष ) होनी चाहिये ।
तृतीय पक्षमें तो वही दुरात्मा विरोध तुम्हारे यहां भी उपस्थित हो जाता
है कि 'वही उसीसे उसी कालमें आवृत भी है और अनावृत भी' ।
यदि कहो कि—विशेषणभेदको लेकर यहाँ विरोधका निवारण हो
जायगा—तो वह कौन सा विशेषणभेद है ?
यदि कहो कि—भिन्न-भिन्न दिशाका योग ही विशेषणभेद है,
क्योंकि यदि जिस दिशाकी ओर संयुक्त है उसी दिशाकी ओर असंयुक्त
भी हो, तब विरोध हो । यहां तो ऐसा है नहीं—तो अहो ! संयोग
और संयोगीमें परस्पर भेद मानने वाले मेरे पक्षमें भी यदि यह
सिद्धान्त लागू हो तब दोष कैसा ?
१. कश्च पुनरसौ-इति शङ्करमिश्रसम्मतः पाठः ।
५६ आत्मतत्त्वविवेके
क्तोऽपि, ततो विरोधः स्यात्, इह तु नैवमिति चेत्, हन्त ! संयोग-
संयोगिनोर्भेदपक्षेऽपि यद्यय मसिद्धान्तवृत्तान्तः स्यात् कीदृशो
दोष इति ? एतेन व्यतिरेकपक्षोऽपि निरस्तः ।
अधिकश्च तत्राश्रयहेतुदृष्टान्तसिद्धौ प्रमाणाभावः, अवस्तुनि
प्रमाणप्रवृत्तेः प्रमाणप्रवृत्तावलीकत्वानुपपत्तेः ।
एव तर्ह्यव्यवहारे स्ववचनविरोध स्यादिति चेत्, तत् किं
स्ववचनविरोधेन तेषु प्रमाणमुपदर्शितं भवति ? व्यवहारनिषेध
व्यवहारो वा खण्डित स्यात् ? अप्रामाणिकोऽय व्यवहारोऽव-
श्याभ्युपगन्तव्य इति वा भवेत् ?
इस प्रकार 'जो सत् है वह क्षणिक है' इस अन्वयव्याप्तिके खण्डन-
से 'जो क्षणिक नहीं है वह सत् भी नहीं है, जैसे खरहेकी सींग'
यह व्यतिरेक व्याप्ति भी खण्डित हो गयी ।
बल्कि अन्वयव्याप्तिकी अपेक्षा व्यतिरेकव्याप्तिपक्षमे पक्ष, हेतु
और दृष्टान्तकी सिद्धिमें कोई प्रमाण नहीं हे यह अधिक दोष है।
क्योंकि जो अवस्तु ( असत् ) है, उसमे किसी प्रमाणकी प्रवृत्ति नहीं हो
सकती है और जिसमे प्रमाणोंकी प्रवृत्ति होगी, वह असत् नहीं होगा।
अर्थात् स्थिरभावरूप पक्ष तुम्हारे मतमे अप्रामाणिक है। अक्षणिकत्व
हेतुको तुम सत्में मानते नहीं और असत् अप्रामाणिक ही है। इस
प्रकार हेतु भी अप्रसिद्ध है। साथ ही शशशृङ्गरूप दृष्टान्त भी
अप्रसिद्ध ही है।
( शङ्का ) यदि अप्रामाणिकमे व्यवहार न हो तो सिद्धान्तीको
स्ववचनका विरोध हो जायगा । अर्थात् 'असत्मे अनुमानादिका व्यवहार
^ हो सकता यह कहना भी तो असत्में व्यवहार ही है ।
( उत्तर ) तो क्या मेरे स्ववचनविरोधसे उन असत् पक्षादिकोंमें
प्रामाणिकता आ जाती है ? अथवा व्यवहारके निषेधका व्यवहार
खण्डित हो जाता है ? अथवा-अप्रामाणिक भी यह अनुमान-व्यवहार
अवश्य मानना चाहिये-यह सिद्ध होता है ?
क्षणभङ्गवादः ५७
न तावत् प्रथमः, नहि विरोधसहस्रेणापि स्थिरे तस्य
क्रमादिविरहे वा प्रत्यक्षमनुमानं वा दर्शयितुं शक्यम्, तथात्वे वा
कृतं भौतकलहेन ।
द्वितीय¹स्त्विष्यत एव प्रामाणिकैः । अवचनमेव तर्हि प्राप्तम्
किं कुर्मो यत्र वचनं सर्वथैवानुपपन्नं तत्रावचनमेव श्रेयः । त्वमपि
परिभावय तावन्निष्प्रामाणिकेऽर्थे मूकवावदूकयोः कतरः श्रेयान्² ।
एवं विदुषापि भवता न मूकीभूय स्थितम्, अपि तु व्यध-
इनमे प्रथम तो हो नहीं सकता है। क्योंकि हजारों विरोधके रहने
पर भी तुम स्थिरभावरूप पक्षमे अथवा उसमें असत्त्वको सिद्ध करने-
वाले क्रमयौगपद्याभावरूप हेतुमे अथवा शशशृङ्गरूप दृष्टान्तमे प्रत्यक्ष
या अनुमान प्रमाण नहीं दिखा सकते हो। यदि दिखा सको तो
भूताविष्टोंकी तरह इस निरर्थक कलहकी क्या आवश्यकता है ?
द्वितीय पक्ष तो प्रामाणिकोंको इष्ट ही है। अर्थात् शशशृङ्गादि
अलीक पदार्थोंमे विधिव्यवहारके समान ही निषेधका भी व्यवहार
हम नहीं ही मानते हैं। "शशशृङ्ग नास्ति" यह जो निषेधव्यवहार
होता है, उसका तो अर्थ यह है कि शशमे शृङ्ग नहीं है। शश भी
सत् है और शृङ्ग भी कहीं सत् है। इसलिये शशमें शृङ्ग नहीं है, ऐसा
व्यवहार होनेमें कोई बाधा नहीं है।
यदि यह कहो कि—तब हमे अलीक पदार्थोंके सम्बन्धमे कुछ नहीं
बोलना चाहिये अर्थात् मौन धारण किये रहना चाहिये—तो क्या करें,
जहा बोलना सर्वथा ही असंगत है, वहाँ न बोलना ही अच्छा है।
स्वय भी तो विचारो कि अप्रामाणिक अर्थके बारेमे मूक रह जानेवाले
और अधिक बोलनेवालेमे कौन अच्छा है ?
यदि कहो कि—ऐसा जानते हुए भी आपसे (मुझसे) मूक होकर
नहीं रहा गया, प्रत्युत असत्मे भी व्यवहारका प्रतिषेधरूप व्यवहार कर
१. द्वितीय स्त्विष्यत—इति पाठ क्वचित् ।
२ कतरः प्रामाणिक—इति १ पु० पाठ
५८ आत्मतत्त्वविवेके
हारः प्रतिषिद्ध एवासतीति चेत्, सत्यम्, यथा अप्रामाणिकः स्व-
वचनविरुद्धोऽर्थो मा प्रसाङ्क्षीदिति मन्यमानेन त्वया अप्रामाणिक
एवासति व्यवहारः स्वीकृतस्तथास्माभिरपि प्रमाणचिन्तायाम-
प्रामाणिको व्यवहारो मा प्रसाङ्क्षीदिति मन्यमानैरप्रामाणिक
एव स्ववचनविरोधः स्वीक्रियते । यदि तूभयत्रापि भवान् समान-
दृष्टिः स्यादस्माभिरपि तदा न किञ्चिदुच्यत इति ।
तृतीये त्वप्रामाणिकश्चाप्यवश्याभ्युपगन्तव्यश्चेति कस्येयमाज्ञेति
भवानेव प्रष्टव्यः । व्यवहारस्य सुदृढनिरूढत्वादिति चेत्, अप्रा-
माणिकश्च सुदृढनिरूढश्चेति व्याघातः । कथंचिदपि व्यवस्थितत्वा-
ही दिया गया—तो यह ठीक है। क्योंकि, जैसे—जो सत् है, वह
क्षणिक है—अपने इस वचनका विरोधी अक्षणिक शशशृङ्गमें भी
सत्त्वरूप अप्रामाणिक अर्थ न प्रसक्त हो जाय, यह मानते हुए तुम
असत् शशशृङ्गमें अप्रामाणिक ही अनुमानव्यवहार स्वीकृत किये हो,
वैसे ही हम भी क्षणिकत्वसिद्धिके लिये प्रमाणकी चिन्तामें शशशृङ्ग-
में व्यतिरेकव्याप्तिग्रहरूप तुम्हारे द्वारा किया गया अप्रामाणिक भी
व्यवहार न प्रसक्त हो जाय, ऐसा मानते हुए अप्रामाणिक भी स्ववचन-
विरोध हम स्वीकार करते हैं ।
यदि आप दोनों ही ओर समानदृष्टि हों, तब हम भी कुछ नहीं
कहते हैं । अर्थात् तुम यदि शशशृङ्गमे व्यतिरेकव्याप्ति दिखाना
छोड़ दो तो हम भी उसके खण्डनका यत्न नहीं करेंगे ।
तृतीयपक्षमें तो—असत्में व्यवहार अप्रामाणिक भी है और उसे
अवश्य मानना भी चाहिये—यह किसकी आज्ञा है ? ऐसा आप ही से
पूछा जा सकता है।
यदि कहो कि—असत्में व्यवहार अबाधितरूपसे अनादि परम्परासे
सिद्ध है, इसलिये अप्रामाणिक होता हुआ भी मानने ही योग्य है—
तो उक्तव्यवहार अप्रामाणिक भी है और अनादिपरम्परासिद्ध भी है—
यह परस्पर व्याहत वचन है ।
क्षणभङ्गवादः ५९
दिति चेत्, अप्रामाणिकत्वेन कथञ्चिदपि व्यवतिष्ठते, प्रामाणिकञ्चेत्
तदेवोच्यतामिति वादे व्यवस्था।
जल्पवितण्डयोस्तु पक्षादिषु प्रमाणप्रश्नमात्रप्रवृत्तस्य न
स्ववचनविरोधः, तत्र प्रमाणेनोत्तरमनिष्टमशक्यं च। अप्रमाणेनैव
तूत्तरे स्ववचनेनैव भङ्गः, मदुक्तेषु पक्षादिषु प्रमाणं नास्तीति स्वय-
मेव स्वीकारात्। अनुत्तरे तु अप्रतिभैवेति।
यदि च व्यवहारस्वीकारे विरोधपरिहारः स्यात्, असौ
स्वीक्रियेतापि, न त्वेवम्, न खलु सकलव्यवहाराभाजनं च तन्नि-
षेधव्यवहारभाजनं चेति वचनं परस्परमविरोधि।
यदि कहो कि—अनुभवसे ही इस प्रकारका व्यवहार व्यवस्थित है—
तो यह अनुभव यदि अप्रामाणिक है तो किसी प्रकार भी उससे व्यवहार
व्यवस्थित नहीं हो सकता है। यदि प्रामाणिक है तो वह प्रमाण ही
बताओ। क्योंकि यही वादनामक कथाका नियम है।
जल्प और वितण्डा नामक कथाओंमें तो तुम्हारे पक्ष हेतु और
दृष्टान्तमें सिर्फ प्रमाण पूछनेमें प्रवृत्त होनेसे मुझे स्ववचनविरोध
नहीं होगा। उस प्रश्नका यदि प्रमाणसे उत्तर दो तो अनिष्ट हो
जायगा। अर्थात् शशशृङ्ग भी प्रामाणिक होने लगेगा। साथ ही
प्रमाणद्वारा शशमें शृङ्गका ग्रहण अशक्य भी है।
यदि अप्रमाणसे ही उत्तर दो, तब तो अपने वचनसे ही तुम्हारी
पराजय होजाती है। क्योंकि “मेरे (तुम्हारे) कहे पक्षादिकोंमें प्रमाण
नहीं है” ऐसा तुमने स्वयं ही स्वीकार कर लिया। यदि मेरे प्रश्नका
कुछ उत्तर ही न दो तो अप्रतिभानामक निग्रहस्थानसे निगृहीत
होते हो।
एवं, यदि व्यवहार स्वीकार करनेपर विरोधका परिहार हो जाता
रहता तो यह स्वीकार भी कर लिया जाता। अर्थात् मूक रहना अच्छा
नहीं बताते। परन्तु ऐसा तो है नहीं। क्योंकि सभी व्यवहारोंका यह
अपात्र भी है और निषेध व्यवहारका पात्र भी है—यह वचन परस्परमें
अविरोधी नहीं है किन्तु विरोधी है।
६० आत्मतत्त्वविवेके
विधिव्यवहारमात्राभिप्रायेणाभाजनत्ववादे कुतो विरोध इति
चेत्, हन्त ! सकलविधिव्यवहाराभाजनत्वेन किञ्चिद् व्यवह्रियते
न वा ? उभयथापि स्ववचनविरोधः, उभयथाप्यवस्तुनैव तेन
भवितव्यम्, वस्तुनः सर्वव्यवहारविरहानुपपत्तेः ।
नेतिपक्षे सकलविधिनिषेधव्यवहारविरहीत्यनेनैव व्यवहारेण
विरोधात् । अव्यवहृतस्य निषेधुमशक्यत्वात् । व्यवह्रियत इति
पक्षेऽपि विषयस्वरूपपर्यालोचनयैव विरोधात्, न हि सर्वव्यवहारा-
विषयश्च व्यवह्रियते चेति ।
यदि चावस्तुनो निषेधव्यवहारगोचरत्वं विधिव्यवहारगोच-
रतापि किं न स्यात् ? प्रमाणाभावस्योभयत्रापि तुल्यत्वाद् इति ।
यदि कहो कि—असत्में सकल व्यवहारका अपात्रत्व मानने वालेके
यहां उसमें निषेधव्यवहार करनेमें भले ही विरोध हो, पर केवल विधि-
व्यवहारका अपात्रत्व माननेवालेके यहां कैसे विरोध होगा ? अर्थात्
शशशृङ्ग आदिमें सत्त्व और क्षणिकत्वका निषेधव्यवहार करनेमे बौद्ध-
को स्ववचन विरोध नहीं होगा । क्योंकि असत्को हम केवल विधिव्य-
वहारका ही अपात्र मानते हैं—तो अहो ! सभी विधि और निषेध व्यव-
हारोंका अपात्ररूपसे किसीको व्यवहृत करते हो या नहीं ? दोनों ही
दशाओंमे तुम्हें भी स्ववचन विरोध हो जाता है । तथा दोनों ही
दशाओंमे वह अवस्तु (असत्) ही होगी, जिसे तुम व्यवहृत करते हो ।
कारण, वस्तुमें (सत्मे) सकल व्यवहारका अभाव नहीं हो सकता है ।
क्योंकि नहीं पक्षमे—सकल विधि-निषेध-व्यवहारका विरही असत्
—यह भी तो एक व्यवहार ही हुआ, जिससे विरोध आ जाता है ।
कारण व्यवहारमें लाये बिना निषेध ही नहीं कर सकते हो । व्यवहृत
करनेके पक्षमें तो विषयस्वरूपकी पर्यालोचना करनेसे ही विरोध झलक
जाता है। क्योंकि यह नहीं हो सकता कि—'सब व्यवहारका अविषय
भी हो और व्यवहृत भी होता हो' ।
एवं यदि अलीक (मिथ्या वन्ध्यासुतादि) में सत्त्व और क्षणिकत्व-
क्षणभङ्गवादः ६१
वन्ध्यासुतस्यावक्तृत्वेऽचेतनत्वादिकमेव प्रमाणं वक्तृत्वे तु न
किञ्चिदिति चेन्न, तत्रापि सुतत्वस्य विद्यमानत्वात् । न हि
वन्ध्यायाः सुतो न सुतः, तथा सति स्ववचनविरोधात् । वचन-
मात्रमेतत् न तु परमार्थतः सुत एवासाविति चेन्न, अचेतनस्याप्येवं-
रूपत्वात् । चेतनादन्यत् स्वभावान्तरमेव ह्यचेतनमित्युच्यते । चैतन्य-
निवृत्तिमात्रमेवेह विवक्षितम् , तच्च सम्भवत्येनेति चेन्न, तत्राप्यसु-
तत्वनिवृत्तिमात्रस्यैव विवक्षितत्वात् ।
के निषेधव्यवहारकी विषयता है तो उसमे विधिव्यवहारकी भी
विषयता क्यों न हो ? कारण, अलीकमे विधि और निषेध दोनों ही
व्यवहारोंके होनेमे प्रमाणाभाव समान रूपसे है ।
यदि कहो कि—बन्ध्यासुतमे वक्तृत्वनिषेधका व्यवहार करनेमे
उसका अचेतन होना ही प्रमाण है, किन्तु उसमे वक्तृत्वका विधिव्यवहार
करनेमें तो कुछ प्रमाण नहीं है—तो यह कहना ठीक नहीं है । क्योंकि
उसके वक्तृत्वमे भी उसका सुत होना ही प्रमाणरूपसे विद्यमान है ।
यह नहीं कह सकते कि बन्ध्याका सुत सुत नहीं है । क्योंकि वैसा
कहनेपर अपने ही वचनका विरोध हो जायगा । अर्थात् बन्ध्यासुत
कहना और उसे सुत न मानना यह स्पष्ट ही स्ववचनविरोध है ।
यदि कहो कि—यह वचनमात्र ही है न कि वह वस्तुत सुत ही
है—तो ऐसा नहीं हो सकता । क्योंकि तब तो उसका अचेतन होना
भी ऐसा ही हो जायगा । अर्थात् बन्ध्यासुतको अचेतन कहना भी
वचनमात्र ही है, न कि वह घटादिके समान वस्तुत अचेतन ही है ।
क्योंकि चेतनसे भिन्न एक दूसरे स्वभावका पदार्थ ही अचेतन कहा
जाता है ।
यदि कहो कि—यहाँ अचेतनपदसे कोई विलक्षण स्वभाववाला
अभिप्रेत नहीं है, किन्तु चैतन्यकी निवृत्तिमात्र ही विवक्षित है और
वह बन्ध्यासुतमे सम्भव ही है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि
तब उसमे वक्तृत्व सिद्ध करनेमें भी हेतुवाची सुतपदसे असुतत्वकी
निवृत्तिमात्र ही विवक्षित बताया जा सकता है और वह सम्भव ही है ।
६२ आत्मतत्त्वविवेके
असुतत्वनिवृत्तिमात्रस्य स्वरूपेण कृतिज्ञप्त्योरसामर्थ्ये
समर्थमर्थान्तरमध्यवस्यमन-तर्भाव्य कुतो हेतुत्वमिति चेन्न, अचै-
तन्येऽप्यस्य न्यायस्य समानत्वात् । व्याववृत्तिरूपमपि तदेव गमकं
यदतस्मादेव, यथा शिशपात्वम्, वन्ध्यासुतस्त्वसुतादिव घटादेः
सुतादपि देवदत्तादेर्व्यावर्तते अतो न हेतुरिति चेत्, नन्विदम-
चैतन्यमपि अस्यैवरूपमेन, नहि वन्ध्यासुतश्चेतनादिव देवदत्तादे-
रचैतनादिकाष्ठादेर्न व्यावर्तते ।
वक्तृत्वं वस्त्वेकनियतो धर्मः, स कथमवस्तुसाध्यो विरोधा-
दिति चेत्, स पुनरयं विरोधः कुतः प्रमाणात् सिद्धः ? किं
यदि कहो कि—असुतत्वकी निवृत्तिमात्र तो अलीक होनेके कारण
स्वय किसी क्रियाको और किसी ज्ञानको करानेमें असमर्थ है । इसलिये
समर्थ एव अनुभवमे आनेवाले किसी दूसरे पदार्थका अन्तर्भाव किये
बिना यह हेतु कैसे बन सकता है ? —तो ऐसा नहीं कह सकते ।
क्योंकि तुम्हारे अचैतन्य हेतुमे भी यह न्याय समानरूपसे लागू
हो जायगा ।
यदि कहो कि—व्यावृत्ति (निवृत्ति) रूप होकर भी वही बोधक
होता है, जो विजातीयसे ही व्यावृत्त होता है, न कि सजातीयसे भी ।
जैसे शिंशपात्व अपने विजातीय कटहल आदिसे ही व्यावृत्त होता है,
न कि सीसमसे भी । इसलिए वह अपने वृक्षत्वका बोधक हो सकता
है । किन्तु वन्ध्यासुत तो जैसे असुत अर्थात् विजातीय घट आदि से
व्यावृत्त है, वैसे ही देवदत्त आदि सुतसे भी व्यावृत्त है । अत वह
वक्तृत्वका हेतु नहीं हो सकता है—तो निश्चय ही तुम्हारा यह अचैतन्य
हेतु भी इसके समान ही है । क्योंकि ऐसी बात नहीं है कि वन्ध्यासुत
जैसे चेतन देवदत्तसे व्यावृत्त है, वैसे ही काष्ठ आदि अचेतनसे भी
व्यावृत्त न हो ।
यदि कहो कि—वक्तृत्व केवल वस्तुका ही नियत धर्म है, अत.
यह अवस्तु (मिथ्या) भूत वन्ध्यासुतमें कैसे सिद्ध किया जा सकता
है ? क्योंकि वस्तु और अवस्तु परस्पर विरुद्ध हैं—तो बताओ, यह
क्षणभङ्गवादः ६३
कर्तृत्वविविक्तस्यावस्तुनो नियमेनोपलम्भात् ? आहोस्विद् वस्तु-
विविक्तस्य वक्तृत्वस्यानुपलम्भादिति ?
न तावदवस्तु केनापि प्रमाणेनोपलम्भगोचरः, तथात्वे वा
नावस्तु । नाप्युत्तरः, समानत्वात् । नहि वक्तृत्वमिव अवक्तृत्व-
मपि वस्तुविविक्तं कस्यचित् प्रमाणस्य विषयः ।
तद्विविक्तविकल्पमात्रं तावदस्तीति चेत्, तत्संसृष्टविकल्प-
नेऽपि को वारयिता ? ननु वक्तृत्वं वचनं प्रति कर्तृत्वं, तत्
कथमवस्तुनि ? तस्य सर्वसामर्थ्यविरहलक्षणत्वादिति चेत्,
विरोध किस प्रमाणसे सिद्ध होता है ? क्या वक्तृत्वसे शून्य ही अवस्तु-
की नियमतः उपलब्धि होनेसे ? अथवा वस्तुविहीन वक्तृत्वकी अनु-
पलब्धि होनेसे ?
इनमे प्रथम पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि अवस्तुकी तो किसी भी
प्रमाणसे उपलब्धि नहीं होती है। यदि उपलब्धि होगी तो वह अवस्तु
नहीं रह जायगी।
दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योंकि मेरे और आपके साध्यों-
की समान स्थिति है। क्योंकि, जैसे वस्तुविहीन वक्तृत्व अप्रामाणिक
है, वैसे ही वस्तुविहीन अवक्तृत्वमे भी कोई प्रमाण नहीं है।
यदि कहो कि—प्रमाण न होनेपर भी वक्तृत्वसे शून्य अवस्तु
(वन्ध्यासुत) का ज्ञानमात्र तो है—तो वक्तृत्वसे सम्पृक्त अवस्तुके
ज्ञानको भी कौन रोकनेवाला है ?
यदि कहो कि—वक्तृत्वका अर्थ है 'वचनक्रियाका कर्त्ता होना'
और वह कर्त्तापन अवास्तविक वन्ध्यासुतमे कैसे आ सकता है ? क्योंकि
वह हर प्रकारकी सामर्थ्यसे रहित है—तो, उसमे अवक्तृत्व भी कैसे आ
सकता है ? क्योंकि उसका भी अर्थ है 'वचनसे भिन्न कार्यके प्रति कर्त्ता
होना' जो मिथ्या में नहीं हो सकता ।
यदि कहो कि—जिसमें हर प्रकारकी सामर्थ्यका अभाव है, उसमें
बोलनेकी सामर्थ्यका भी अभाव रहने में कोई विरोध नहीं है—तो
६४ आत्मतत्त्वविवेके
अवक्तृत्वमपि कथं तत्र ? तस्य वचनेतरकर्त्तृत्वलक्षणत्वादिति ।
सर्वसामर्थ्यविरहे वचनसामर्थ्यविरहो न विरुद्ध इति चेत्, अथ
सर्वसामर्थ्यविरहो बन्ध्यासुतस्य कुतः प्रमाणात् सिद्धः ? आवस्तु-
त्त्वादेवेति चेत्, नन्वेतदपि कुतः सिद्धम् ? सर्वसामर्थ्यविरहादिति
चेत्, सोऽयमितस्ततः केवलैर्वचनैर्निर्धनाधमर्णिक इव साधून्
भ्रामयन् परस्पराश्रयदोषमपि न पश्यति ।
क्रमयौगपद्यविरहादिति चेन्न, तद्विरहसिद्धावपि प्रमाणानुयो-
गस्यानुवृत्तेः । सुतत्वे च परामृश्यमाणे तदविनाभूतसकलवक्तृत्त्वा-
दिधर्मप्रसक्तौ कुतः क्रमयौगपद्यविरहसाधनस्यावकाशः ? कुतस्तरां
चावस्तुत्वसाधनस्य ? कुतस्तमां चावक्तृत्त्वादिसाधनानाम् ?
बताओ, तूने किस प्रमाणसे जाना कि बन्ध्यासुतमें हर प्रकारकी सामर्थ्य
का अभाव है ?
यदि कहो कि—उसके मिथ्या होनेसे—तो यही कैसे जाना कि
बन्ध्यासुत मिथ्या है। यदि कहो कि—उसमें हर प्रकारकी सामर्थ्यका
अभाव है, अर्थात् वह कुछ भी नहीं कर सकता है, इसलिये जानते हैं
कि वह मिथ्या है—तब तो निर्धन सद्दुकके समान तू भी केवल
बातोंसे ही सज्जनों को इधर उधर भरमाते हो और अन्योन्याश्रय
दोषको भी नहीं देखते ।
यह कहना कि—हर प्रकारकी असामर्थ्यका कारण क्रम और यौग-
पद्यका अभाव है। अर्थात् जो किन्हीं कार्यों के करनेमे सामर्थ्यवान् होता
है, वह या तो क्रमश करता है या युगपत् ( एक साथ ) करता है।
बन्ध्यासुत तो न क्रमसे कुछ करता है और न एक साथ । इसीलिए वह
सर्वसामर्थ्यसे रहित है—ठीक नहीं है। क्योंकि क्रम और यौगपद्यके
अभावकी भी सिद्धिके लिए प्रमाणकी अपेक्षा ज्यों की त्यों है। क्योंकि
जब उसे सुत कहते हो तो सुतोंमे रहनेवाले वक्तृत्व आदि सम्पूर्ण धर्म
उसमें भी होने ही लगेंगे । इस स्थितिमें बन्ध्यासुतमे क्रमयौगपद्या-
भावकी सिद्धि कैसे होगी ? और वह मिथ्या भी कैसे सिद्ध होगा ?
क्षणभङ्गवादः ६५
तस्मात् प्रमाणमेव सीमा व्यवहारनियमस्य तदतिक्रमे त्वनियम
एवेति ।
न ह्यप्रतीते देवदत्तादौ 'स किं गौरः कृष्णो वेति' वैयात्यं
विना प्रश्नः । तत्रापि यद्येकोऽप्रतीतपरामर्शविषय¹ एवोत्तरं
ददाति न गौर इति, अपरोऽपि किं न दद्यान्न कृष्ण इति ।
न चैवं सति काचिदर्थसिद्धिः, प्रमाणाभावविरोधयोरुभयत्रापि
तुल्यत्वादिति ।
नन्वप्रतीतेर्व्यवहाराभाव इति युक्तं, कूर्मरोमादयस्तु प्रतीयन्त
तथा यह भी कैसे सिद्ध होगा कि वन्ध्यासुतमे अवक्तृत्वादि है, अर्थात्
यह वक्ता आदि नहीं हो सकता ।
इसलिये किसी भी व्यवहारका नियामक प्रमाण ही है । उसके
बिना तो कोई नियम ही नहीं रह जायगा । क्योंकि प्रमाणसे देवदत्त
आदिको जाने बिना “क्या वह गोरा या काला है ?” ऐसा प्रश्न
धृष्टताके बिना नहीं हो सकता है । अर्थात् जिस वस्तुको जानते नहीं
उसके गोरा काला होनेका प्रश्न ही नहीं होता है । साथ ही वैसा प्रश्न
होनेपर भी यदि कोई उसके गोरापन कालापनको बिना जाने ही उत्तर
देता है कि वह गोरा नहीं है तो दूसरा भी यह उत्तर क्यों न दे कि वह
काला नहीं है । ऐसी स्थितिमें काला या गोरा किसीका निर्णय नहीं
हो सकता है । क्योंकि प्रमाणाभाव और विरोध दोनों ही उत्तरोंमे
समान हैं ।
यहाँ प्रमाणका अभाव इसलिये है कि दोनोंमे किसीने प्रमाणके
साथ उत्तर नहीं दिया । और विरोध इसलिए है कि प्रमाणके द्वारा
जिस वस्तुको जाना ही नहीं उसका गोरा न होना या काला न होना
कैसे जान सकता है ? और उत्तर भी कैसे दे सकता है ?
( शङ्का ) यह ठीक है कि अज्ञात विषयके सम्बन्धमे किसी प्रकार
का व्यवहार नहीं होता, किन्तु कछुएके रोम या बन्ध्याका पुत्र आदि तो
१. अविदितपरामर्श विषय इति म० ठक्कुरसम्मत पाठ. ।
५
एव, न ह्येते विकल्पाः कञ्चिदर्थभेदमुल्लिखन्त एव उत्पद्यन्ते,
न च प्रमाणास्पदमेव व्यवहारास्पदमिति, तच्चयुक्तम्१ । तथाहि
शशविषाणमिति ज्ञानमन्यथाख्यातिर्वा स्यात् असत्ख्यातिर्वा । न
तावदाद्यस्ते रोचते, तथा सति हि किञ्चिदारोप्यं किञ्चिदारोप-
विषय इति स्यात् । तथा चारोपविषयस्तत्रैवास्ति आरोपणीयस्त्व-
न्यत्रैवेति जितं नैयायिकैः । नापि द्वितीयः, कारणानुपपत्तेः ।
इन्द्रियस्य ज्ञानजनने विषयाधिपत्येनैव२ व्यापारात् । लिङ्गशब्दा-
भासयोरन्यथाख्यातिमात्रजनकत्वात् । अपहस्तितस्वार्थगोश्वापद-
ज्ञात ही हैं । क्योंकि कूर्मरोम या वन्ध्यापुत्र आदि शब्द को सुनकर
जो ज्ञान उत्पन्न होते हैं, वे किसी वस्तु विशेषको विषय किये बिना
नहीं होते हैं । यहाँपर यह आवश्यक नहीं हे कि जो प्रामाणिकरूपसे
ज्ञात होगा, उसीमें कोई व्यवहार होगा । अर्थात् व्यवहारके लिये उसे
किसी भी प्रकारसे ज्ञात होना चाहिये ।
(उत्तर) इस प्रकारका कथन ठीक नहीं है । क्योंकि शश-
शृङ्ग, कूर्मरोग, वन्ध्यापुत्र आदि ज्ञानको अन्यथाख्याति मानते हो
या असत्ख्याति मानते हो । इनमे प्रथम पक्ष तो तुम्हें नहीं पसन्द
है । क्योंकि उस पक्षमें कोई आरोप्य होगा और कोई आरोप का
विषय । अर्थात् वन्ध्यास्त्री कूर्म आदि आरोपके विषय होंगे और उनमें
पुत्र रोम आदिका सम्बन्ध आरोप्य होगा । ऐसी दशामे वन्ध्यास्त्री तो
सामने ही हे और पुत्रका सम्बन्ध भी दूसरी जगह हे ही । इस प्रकार
नैयायिकोंको विजय प्राप्त हो गयी ।
कारण न हो सकनेसे असत्ख्याति ( असत्का ज्ञान ) रूप द्वितीय
पक्ष भी संभव नहीं हे । क्योंकि इन्द्रिय द्वारा ज्ञान होनेमें विषय और
इन्द्रियका सन्निकर्षरूप व्यापार आवश्यक हे। हेत्वाभास और
शब्दाभास तो अन्यथाख्याति ही पैदा करते हैं न कि असत्ख्याति ।
१. तन्न युक्तम्—१ पृ० पा०
२. विषयाधिपत्येन—सन्निहितविषयसहकारित्वेनेत्यर्थं इति शिरोमणिः ।
क्षणभङ्गवादः ६७
ख्यातिजनकत्वे शशविषाणादिशब्दात् कूर्मरोमादिविकल्पानामप्यु-
त्पत्तिप्रसङ्गात्, नियामकाभावात् ।
स हि सङ्केतो वा स्यात् ? शब्दस्वाभाव्यं वा ? आद्यस्ता-
वत् सङ्केतविषयाप्रतीतेरेव पराहतः । तत एव१ तत्प्रतीतावितरेतरा-
श्रयत्वम्, पदसङ्केतबलेनैव प्रतीतौ स्वार्थापरित्यागात् । तथा
चानन्विताः पदार्था एवान्विततया परिस्फुरन्तीति विपरीतख्याति-
अर्थात् गलत हेतु और मिथ्यावादीके शब्दसे भी उसी अर्थकी प्रतीति होती
है, जो कहीं सत् है । जिस हेतुका अपने साध्यके साथ और जिस शब्द-
का अपने अर्थके साथ कहीं भी सम्बन्ध न हो और वह असत् अर्थकी
प्रतीति करावे तो शशशृङ्ग आदि शब्दसे कूर्मरोम आदि अर्थका ज्ञान भी
होने लगेगा । क्योंकि ऐसा न होने देनेवाला कोई नियामक नहीं है ।
क्योंकि यह नियमन करने वाला सङ्केत होगा ? अथवा शब्द-
का स्वभाव ? प्रथम पक्षमें 'शशविषाण' इस पदसमूहका सङ्केत
मानो तो असंभव है । क्योंकि सङ्केतका विषय जो अखण्ड शशविषाण
उसकी कहीं प्रतीति ही नहीं है तो उसमें 'शशविषाण' इस पदसमूहका
सङ्केत कैसे हो सकता है ? यदि इसी सङ्केतके बलपे उसकी प्रतीति
मानो तो अन्योन्याश्रय दोष हो जाता है “सङ्केतसे प्रतीति और प्रतीति
होनेपर सङ्केत” ।
यदि कहो कि—शश और विषाण इन प्रत्येक पदोंके सङ्केतबलसे
ही “शशविषाण' इस अखण्ड अर्थकी प्रतीति हो जायगी—तब तो
शशपदका खरहारूप अपना अर्थ और विषाणपदका सींगरुप अपना अर्थ
कहीं सत् ही है न कि असत् । इस प्रकार पृथक् पृथक् लोकमें प्रसिद्ध
खरहा और सींगरुप अर्थ केवल परस्पर मे असम्बद्ध है, और 'शशशृङ्ग'
शब्दसे सम्बद्धरूपमें भासित होते हैं, यह अन्यथाख्याति ही तो हो
रही है न कि असत्ख्याति ।
यदि कहो कि—शश और विषाण पदोंका भी पृथक्-पृथक् अपने-
अपने अर्थोंके साथ भी कोई सम्बन्ध नहीं है, अर्थात् उन पदोंका
१ '०एवेति भ० ठक्कुरसम्मतः पाठः ।
६८ आत्मतत्त्वविवेके
रेणानुवर्त्तते। स्वार्थपरित्यागे तु पुनरप्यनियमः, असामयिकार्थ-
प्रत्यायनात्। शब्दस्वाभाव्यात् तु नियमे व्युत्पन्नवदव्युत्पन्न-
स्यापि तथाविधविकल्पोदयप्रसङ्गादिति।
वासनाविशेषादिति चेत्, अथासदुल्लेखिनः प्रत्ययस्य वासनैव
कारणम् ? उत वासनापि ? न तावदाद्यः, शशविषाणादिप्रत्य-
यानां सदातनत्वप्रसङ्गात्। कदाचित् प्रबोधादिति चेत्, न,
प्रबोधोऽपि सहकार्यन्तरं वा ? अतिशयपरम्परापरिपाको वा ?
आद्ये वासनैवेति पक्षानुपपत्तिः। द्वितीयेऽपि यद्यर्थान्तरप्रत्या-
सत्तेस्तदा पूर्ववत्।
खरहा और सींगरुप अर्थ भी असत् ही है इसप्रकार असत्ख्याति
सिद्ध हो जाती है—तब तो फिर भी किस शब्दसे कौन अर्थ समझा
जाय इसका कोई नियम नहीं रह गया। इस स्थितिमे घटशब्दसे पटका
भी बोध होना चाहिये। यह कहना तो ठीक नहीं है कि—शब्दका
स्वभाव ही ऐसा है कि कोई खास शब्द किसी खास अर्थको ही बताता
है—क्योंकि तब विद्वान्के समान मूर्खको भी समान रूपसे शब्दोंसे
अर्थबोध होना चाहिये। कारण शब्दका स्वभाव सबके प्रति समान है।
इस दोषसे बचनेके लिये यदि संस्कारविशेषको कारण मानो,
तो बताओ, असत् अर्थका उल्लेख करनेवाले ज्ञानका कारण केवल
संस्कार ही है ? या संस्कार भी एक कारण है ? इनमें प्रथम पक्ष ठीक
नहीं है, क्योंकि संस्कारके सदा होनेसे शशविषाणादिका ज्ञान भी
सदा होते रहना चाहिये।
यदि कहो कि—संस्कारके कभी कभी उद्बुद्ध होनेसे शशशृङ्ग-
ज्ञान भी कभी कभी होगा—तो ठीक नहीं है। क्योंकि संस्कारका
उद्बोध (जागरण) संस्कारसे भिन्न एक अन्य सहायक है ? या उन्हीं
संस्कारोंकी एक परिपक्व अवस्थामात्र है ? प्रथम पक्षमें वासना
(संस्कार) ही कारण है, यह कथन असङ्गत हो जाता है। द्वितीय
पक्षमें भी संस्कारका वह अवस्था यदि दूसरी वस्तुके संसर्गसे हो तो
"वासना ही कारण है" यह कथन फिर असङ्गत हो जाता है। यदि
क्षणभङ्गवाद ६९
स्वसंततिमात्राधीनत्वे तु बाह्यवादव्याघातः,१ नीलादिबुद्धीनामपि
वासनापरिपाकादेवोत्पादात्२ । वासनापीति पक्षे तु तदन्योऽपि
हेतुः कश्चिद् वक्तव्यः, स च विचार्यमाणः पूर्वन्यायं नाति-
वर्त्तत इति ।
न च शशविषाणादिशब्दानामसदर्थैः सह सम्बन्धावग-
मोऽपि। तथाहि परबुद्धीनामनुल्लेखात् तद्विषयस्याऽप्यनुल्लेख
एव। न चार्थक्रियाविशेषोऽप्यस्ति, यतो विषयविशेषमुन्नीय तत्र
संस्कारोंकी धारासे ही वह अवस्था बन जाती है, तब तो बाह्यवादका
व्याघात हो जायगा। क्योंकि नीलपीतादिज्ञान भी बिना बाह्यवस्तुकी
अपेक्षा किये ही परिपक्वावस्थाप्राप्त संस्कारसे ही उत्पन्न हो जायगा।
अर्थात् नीलपीतादिविकल्पोंके कादाचित्कत्वकी उपपत्तिके लिये ही तुमने
बाह्यनीलादिको स्वीकार किया है। वह कादाचित्कत्व यदि वासना-
मात्रके अधीन उत्पन्न हो जाय तो बाह्य नीलादिका स्वीकार व्यर्थ
हो जायगा।
इन सभी दोषोंसे बचनेके लिए-ज्ञान होनेमे वासना भी कारण
है-ऐसा द्वितीय पक्ष स्वीकार करो तो वासनासे अन्य जो हेतु है,
उसे भी बताना चाहिए। और उसपर विचार किये जानेपर वह
भी पूर्ववत् ही खण्डित हो जाता है। अर्थात् असत्ख्यातिका कारण
इन्द्रिय नहीं हो सकती है, क्योंकि असत् वस्तुसे उसका सन्निकर्ष
नहीं होता और वह सन्निकृष्ट वस्तुको ही बतानेमे समर्थ है। हेत्वा-
भास या शब्दाभाससे तो असत्की ख्याति हो ही नहीं सकती, यह
बता चुके हैं।
एव शशविषाण आदि शब्दोंका असत् अर्थोंके साथ सम्बन्धज्ञान
भी नहीं हो सकता है। क्योंकि दूसरेकी बुद्धिका ज्ञान दूसरेको नहीं
१ नीलादिविकल्पकादाचित्कत्वेन त्वया नीलादीनि बाह्यानि स्वीक्रियन्ते।
तच्च कादाचित्कत्व यदि वासनामात्राधीनमेव तदा गत बाह्यनीलादि
स्वीकारव्यसनेनेति शङ्करमिश्रः ।
२. वासनापरिपाकादेवोत्पादात्-१ पु० पा०
७०
सङ्केतो गृह्यताम् । न च सङ्केतयितुरेव वचनात् तदवगतिः,
तद्विषयाणां सर्वेषां वचनानामप्रतीतविषयत्वेनागृहीतसमयतया
अप्रतिपादकत्वात् ।
न च शशविषाणमुच्चारयतः कश्चिदभिप्रायो वृत्त इति तद्वि-
षयोऽस्य वाच्य इति सुग्रहः समय इति वाच्यम्, न ह्येवमाकारः
होनेसे शशविषाणशब्दका प्रयोग करनेवाला व्यक्ति उस शब्दका
किस अर्थके साथ सम्बन्ध जानकर प्रयोग करता है, इसका ज्ञान श्रोताको
नहीं हो सकता है । एवं शशशृङ्गशब्दके प्रयोगके बाद किसी
वस्तुका लाना या ले जाना भी नहीं दीख पडता, जिससे उस
वस्तुविशेषको जानकर उसमें शशशृङ्गशब्दका संकेत (सम्बन्ध)
जाना जाय ।
यह भी नहीं कह सकते कि—जैसे, 'पिक' शब्दका अर्थ 'कोकिल'
होता है, संकेतकर्त्ताके इस वचनसे हम पिकशब्दके अर्थको जान
जाते हैं, वैसे ही शशशृङ्ग शब्दका अर्थ भी संकेतकर्त्ताके वचनसे ही
जाना जा सकता है—क्योंकि वहाँ कोकिलशब्दके द्वारा कोयलरूप
वस्तुको पहलेसे ही हम जानते हैं और उसीकी सहायतासे पिकशब्दका
भी कोयलअर्थके साथ सम्बन्ध जाने जाते हैं । किन्तु यहाँपर शश-
शृङ्गशब्दका अर्थ जाननेके लिए संकेतकर्त्ता जितने भी शब्दोंका प्रयोग
करेगा, वे सभी शब्द शशशृङ्गशब्दके समान ही श्रोताके लिए
अपरिचित अर्थवाले ही होंगे । इस प्रकार जब स्वयं उन्हीं शब्दोंका
उस असत् अर्थके साथ सम्बन्ध नहीं जाना गया है, तब उनकी
सहायतासे शशशृङ्गशब्दका अर्थ कैसे जाना जा सकता है ? अर्थात्
जब वह अर्थ ही असत् है तो किसी भी कल्पित शब्दसे उस अर्थकी
उपस्थिति श्रोताके मनमे नहीं हो सकती है । कोयल तो सत् वस्तु है
और वह सबको प्रत्यक्ष है ।
यह कहना भी ठीक नहीं है कि—शशविषाणशब्दका उच्चारण
करनेवाला व्यक्ति अवश्य ही किसी अर्थके अभिप्रायसे उच्चारण करता
है, अत वही अर्थ शशविषाणशब्दका वाच्य है, ऐसा संकेतग्रह
आसानी से हो सकता है—क्योंकि सामान्यरूपसे हुए ऐसे सङ्केतग्रहका
समयग्रहः। गां बधानेत्युक्ते अप्रतीतशब्दार्थस्याप्यभिप्रायमात्र-
प्रतीतौ समयग्रहप्रसङ्गात्। न च विशेषान्तरविनाकृतः कल्प-
नामात्त्रविषयोऽस्य वाच्य इति साम्प्रतम्, घटकूर्मरोमादीनामपि
तदर्थत्वप्रसङ्गात्।
न च सर्वे प्रतिपत्तारः स्वस्ववासनयाऽसदर्थशब्दसंबन्धप्रति-
पत्तिभाज इति साम्प्रतम्, परस्परवार्तानभिज्ञतया अपरार्थत्वप्र-
ङ्गात्। न हि स्वयं कृतं समय^२मग्राहयित्वा परो व्यवहारयितुं
शक्यते। न च व्यवहारोपदेशान्तरेण ग्राहयितुमपि। न च गां
बधानेतिवत् शशविषाणपदार्थे व्यवहारः, न चायमसावश्व इति-
शाब्दबोधमें कोई उपयोग नहीं है। अन्यथा 'गा बधान' ऐसा कहनेपर
जिसे विशेषरूपसे 'गा' और बधान' पदका अर्थ नहीं मालूम है उसे
भी केवल यह जानकर कि ये पद अवश्य ही किसी अर्थके अभिप्रायसे
कहे गये हैं, सङ्केतज्ञान होकर शाब्दबोध हो जाना चाहिये।
यह भी समुचित नहीं है कि—शशविषाण आदि शब्दोंका कोई
विशेष अर्थ नहीं होनेपर भी कल्पनामात्रका विषय जो अलीक अर्थ
वही इस शब्दका वाच्यार्थ है—क्योंकि कोई भी काल्पनिक अर्थ यदि
शशविषाण शब्दका अर्थ माना जाय तो काल्पनिक घटरोम^१ और
कूर्मरोम आदि भी शशविषाणशब्दका अर्थ होने लगेगा।
यह भी ठीक नहीं है कि—बोध करनेवाले सभी व्यक्ति अपनी
अपनी वासनासे ही उपस्थित हुए अलीक अर्थोंमें शशविषाण आदि
शब्दोंका सङ्केत जान लेते हैं—क्योंकि अपनी वासनाके आधारपर
उपस्थित अर्थमे हुआ शब्दका सङ्केतग्रह अपने ही तक रह जायगा,
दूसरे को नहीं हो सकता। इसलिये दूसरे व्यक्तिके प्रति शशशृङ्ग
आदि शब्दोंका व्यवहार असम्भव हो जायगा। कारण, स्वयं कल्पित
किसी अर्थमें किसी शब्दके सङ्केतको बिना दूसरे को बताये उसके
१. यद्वा यन्मते घटस्यापि काल्पनिकत्वं तन्मतमाश्रित्योक्तमिति शक्यमित्रः।
२. स्वयं कृतं सङ्केतं—१ पु० पा०