आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवाद ६९
स्वसंततिमात्राधीनत्वे तु बाह्यवादव्याघातः,१ नीलादिबुद्धीनामपि
वासनापरिपाकादेवोत्पादात्२ । वासनापीति पक्षे तु तदन्योऽपि
हेतुः कश्चिद् वक्तव्यः, स च विचार्यमाणः पूर्वन्यायं नाति-
वर्त्तत इति ।
न च शशविषाणादिशब्दानामसदर्थैः सह सम्बन्धावग-
मोऽपि। तथाहि परबुद्धीनामनुल्लेखात् तद्विषयस्याऽप्यनुल्लेख
एव। न चार्थक्रियाविशेषोऽप्यस्ति, यतो विषयविशेषमुन्नीय तत्र
संस्कारोंकी धारासे ही वह अवस्था बन जाती है, तब तो बाह्यवादका
व्याघात हो जायगा। क्योंकि नीलपीतादिज्ञान भी बिना बाह्यवस्तुकी
अपेक्षा किये ही परिपक्वावस्थाप्राप्त संस्कारसे ही उत्पन्न हो जायगा।
अर्थात् नीलपीतादिविकल्पोंके कादाचित्कत्वकी उपपत्तिके लिये ही तुमने
बाह्यनीलादिको स्वीकार किया है। वह कादाचित्कत्व यदि वासना-
मात्रके अधीन उत्पन्न हो जाय तो बाह्य नीलादिका स्वीकार व्यर्थ
हो जायगा।
इन सभी दोषोंसे बचनेके लिए-ज्ञान होनेमे वासना भी कारण
है-ऐसा द्वितीय पक्ष स्वीकार करो तो वासनासे अन्य जो हेतु है,
उसे भी बताना चाहिए। और उसपर विचार किये जानेपर वह
भी पूर्ववत् ही खण्डित हो जाता है। अर्थात् असत्ख्यातिका कारण
इन्द्रिय नहीं हो सकती है, क्योंकि असत् वस्तुसे उसका सन्निकर्ष
नहीं होता और वह सन्निकृष्ट वस्तुको ही बतानेमे समर्थ है। हेत्वा-
भास या शब्दाभाससे तो असत्की ख्याति हो ही नहीं सकती, यह
बता चुके हैं।
एव शशविषाण आदि शब्दोंका असत् अर्थोंके साथ सम्बन्धज्ञान
भी नहीं हो सकता है। क्योंकि दूसरेकी बुद्धिका ज्ञान दूसरेको नहीं
१ नीलादिविकल्पकादाचित्कत्वेन त्वया नीलादीनि बाह्यानि स्वीक्रियन्ते।
तच्च कादाचित्कत्व यदि वासनामात्राधीनमेव तदा गत बाह्यनीलादि
स्वीकारव्यसनेनेति शङ्करमिश्रः ।
२. वासनापरिपाकादेवोत्पादात्-१ पु० पा०