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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 530 में से

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पृष्ठ 112

क्षणभङ्गवादः ६३
कर्तृत्वविविक्तस्यावस्तुनो नियमेनोपलम्भात् ? आहोस्विद् वस्तु-
विविक्तस्य वक्तृत्वस्यानुपलम्भादिति ?
न तावदवस्तु केनापि प्रमाणेनोपलम्भगोचरः, तथात्वे वा
नावस्तु । नाप्युत्तरः, समानत्वात् । नहि वक्तृत्वमिव अवक्तृत्व-
मपि वस्तुविविक्तं कस्यचित् प्रमाणस्य विषयः ।
तद्विविक्तविकल्पमात्रं तावदस्तीति चेत्, तत्संसृष्टविकल्प-
नेऽपि को वारयिता ? ननु वक्तृत्वं वचनं प्रति कर्तृत्वं, तत्
कथमवस्तुनि ? तस्य सर्वसामर्थ्यविरहलक्षणत्वादिति चेत्,
विरोध किस प्रमाणसे सिद्ध होता है ? क्या वक्तृत्वसे शून्य ही अवस्तु-
की नियमतः उपलब्धि होनेसे ? अथवा वस्तुविहीन वक्तृत्वकी अनु-
पलब्धि होनेसे ?
इनमे प्रथम पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि अवस्तुकी तो किसी भी
प्रमाणसे उपलब्धि नहीं होती है। यदि उपलब्धि होगी तो वह अवस्तु
नहीं रह जायगी।
दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योंकि मेरे और आपके साध्यों-
की समान स्थिति है। क्योंकि, जैसे वस्तुविहीन वक्तृत्व अप्रामाणिक
है, वैसे ही वस्तुविहीन अवक्तृत्वमे भी कोई प्रमाण नहीं है।
यदि कहो कि—प्रमाण न होनेपर भी वक्तृत्वसे शून्य अवस्तु
(वन्ध्यासुत) का ज्ञानमात्र तो है—तो वक्तृत्वसे सम्पृक्त अवस्तुके
ज्ञानको भी कौन रोकनेवाला है ?
यदि कहो कि—वक्तृत्वका अर्थ है 'वचनक्रियाका कर्त्ता होना'
और वह कर्त्तापन अवास्तविक वन्ध्यासुतमे कैसे आ सकता है ? क्योंकि
वह हर प्रकारकी सामर्थ्यसे रहित है—तो, उसमे अवक्तृत्व भी कैसे आ
सकता है ? क्योंकि उसका भी अर्थ है 'वचनसे भिन्न कार्यके प्रति कर्त्ता
होना' जो मिथ्या में नहीं हो सकता ।
यदि कहो कि—जिसमें हर प्रकारकी सामर्थ्यका अभाव है, उसमें
बोलनेकी सामर्थ्यका भी अभाव रहने में कोई विरोध नहीं है—तो