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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 530 में से

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पृष्ठ 115

एव, न ह्येते विकल्पाः कञ्चिदर्थभेदमुल्लिखन्त एव उत्पद्यन्ते,
न च प्रमाणास्पदमेव व्यवहारास्पदमिति, तच्चयुक्तम्१ । तथाहि
शशविषाणमिति ज्ञानमन्यथाख्यातिर्वा स्यात् असत्ख्यातिर्वा । न
तावदाद्यस्ते रोचते, तथा सति हि किञ्चिदारोप्यं किञ्चिदारोप-
विषय इति स्यात् । तथा चारोपविषयस्तत्रैवास्ति आरोपणीयस्त्व-
न्यत्रैवेति जितं नैयायिकैः । नापि द्वितीयः, कारणानुपपत्तेः ।
इन्द्रियस्य ज्ञानजनने विषयाधिपत्येनैव२ व्यापारात् । लिङ्गशब्दा-
भासयोरन्यथाख्यातिमात्रजनकत्वात् । अपहस्तितस्वार्थगोश्वापद-

ज्ञात ही हैं । क्योंकि कूर्मरोम या वन्ध्यापुत्र आदि शब्द को सुनकर
जो ज्ञान उत्पन्न होते हैं, वे किसी वस्तु विशेषको विषय किये बिना
नहीं होते हैं । यहाँपर यह आवश्यक नहीं हे कि जो प्रामाणिकरूपसे
ज्ञात होगा, उसीमें कोई व्यवहार होगा । अर्थात् व्यवहारके लिये उसे
किसी भी प्रकारसे ज्ञात होना चाहिये ।
(उत्तर) इस प्रकारका कथन ठीक नहीं है । क्योंकि शश-
शृङ्ग, कूर्मरोग, वन्ध्यापुत्र आदि ज्ञानको अन्यथाख्याति मानते हो
या असत्ख्याति मानते हो । इनमे प्रथम पक्ष तो तुम्हें नहीं पसन्द
है । क्योंकि उस पक्षमें कोई आरोप्य होगा और कोई आरोप का
विषय । अर्थात् वन्ध्यास्त्री कूर्म आदि आरोपके विषय होंगे और उनमें
पुत्र रोम आदिका सम्बन्ध आरोप्य होगा । ऐसी दशामे वन्ध्यास्त्री तो
सामने ही हे और पुत्रका सम्बन्ध भी दूसरी जगह हे ही । इस प्रकार
नैयायिकोंको विजय प्राप्त हो गयी ।
कारण न हो सकनेसे असत्ख्याति ( असत्‌का ज्ञान ) रूप द्वितीय
पक्ष भी संभव नहीं हे । क्योंकि इन्द्रिय द्वारा ज्ञान होनेमें विषय और
इन्द्रियका सन्निकर्षरूप व्यापार आवश्यक हे। हेत्वाभास और
शब्दाभास तो अन्यथाख्याति ही पैदा करते हैं न कि असत्ख्याति ।

१. तन्न युक्तम्—१ पृ० पा०
२. विषयाधिपत्येन—सन्निहितविषयसहकारित्वेनेत्यर्थं इति शिरोमणिः ।