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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

चदुपदेशः । न च यथा गौस्तथा गवय इतिवदुपलक्षणातिदेशः । न
चेह प्रभिन्नकमलोदरे मधूनि मधुकरः पिबतीतिवत् प्रसिद्धपदसामा-
नाधिकरण्यम् ।
तदमूः शशविषाणादिकल्पाः¹ नासत्ख्यातिरूपास्तथात्वे
कारणाभावात् मूकस्वप्नवदाम व्यावहारिकत्व²प्रसङ्गाच्च । तस्मा
दन्यथाख्यातिरूपा एवेति नैतदनुरोधे³नाप्यवस्तुनो निषेधव्यव-
हारगोचरत्वमिति ।
प्रति उस शब्दका व्यवहार नहीं किया जा सकता है। ओर यह भी
नहीं हो सकता कि प्रवृत्तिरूप व्यवहार अथवा शब्दोपदेश के बिना ही
सङ्केतका ग्रह हो जाय। अत शशविषाणशब्दका सङ्केतग्रह नहीं
हो सकता है।
क्योंकि गौमें बाधना आदि व्यवहार जैसे होता है वैसे शशशृङ्ग
पदार्थम कोई व्यवहार नहीं होता। एव “इसे अश्व कहते हैं' इसके
समान “इसे शशशृङ्ग कहते ह' ऐसा शब्दोपदेश भी नहीं होता है।
और न तो 'गो के सदृश गवय होता है' इसके समान किसी वस्तुकी
सदृशता ही शशशृङ्ग मे बतलाई जा सकती है। एव जैसे, प्रभिन्न
कमलोदरे मधूनि मधुकर पिबति' इस वाक्यमे आये मधुकरपदका
सङ्केत वह व्यक्ति आसानीसे जान जाता है, जिसे कमलका खिलना
और उसके द्वारा इसके रसका पान किया जाना आदि पहलेसे विदित
है। अर्थात् प्रसिद्ध पदोंके साहचर्यसे भी अप्रसिद्ध पदका सङ्केतग्रह
हो जाता है। किन्तु शशशृङ्गशब्द तो मधुकरशब्दके समान प्रसिद्ध
पदोंके साथ कहीं व्यवहृत होता हुआ भी नहीं पाया जाता है।
अत शशविषाण कूर्मरोम आदि प्रतीतिया असत्ख्यातिरूप नहीं
हो सकती हैं, क्योंकि वैसा होनेका कोई कारण नहीं है। यदि हो भी
सकें तो भी गूँगेके स्वप्नके समान उनका व्यवहारमें उपयोग नहीं हो
सकता है। इसलिये उक्त प्रतीतिया अन्यथाख्यातिरूप ही हैं। इस
१. कल्पना — इति युक्त पाठ ।
२ अव्यावहारिकत्व इति पाठो युक्तो भाति ।
३ न तदनुरोधेन—२ पु० पा० ।

क्षणभङ्गवादः ७३
भवतु वा असत्ख्यातिस्तथापि न ततो व्यतिरेकः प्रामा-
णिकः । तथाहि कोऽयं व्यतिरेको नाम ? यद्यतो व्यतिरिच्यते
तस्य तत्राभावो वा ? तदभावस्वभावत्वं वा ? तन्न न तावत्
क्रमयौगपद्ययोः शशविषाणे अभावः प्रमाणगोचरः, वृक्षरहितभूभृत्-
कटकवत् क्रमयौगपद्यरहितस्य शशविषाणस्य प्रमाणागोचरत्वात् ।
नापि क्रमयौगपद्याभावरूपत्वं शशविषाणस्य प्रामाणिकं
घटाभाववच्छशविषाणस्य प्रमाणेनानुपलम्भात् । घटाभावोऽपि
प्रकार शशविषाणप्रतीतिके अनुरोधसे भी अवस्तुमें निषेध व्यवहार नहीं
हो सकता है ।
अथवा शशविषाण आदिकी प्रतीति असत्ख्याति ही हो तथापि उस
असद् वस्तुमें क्रमयौगपद्यका या अर्थक्रियाकारित्वरूप सत्ताका व्यतिरेक
( अभाव ) सिद्ध नहीं हो सकता है । कारण, यह व्यतिरेक क्या
वस्तु है, यह प्रश्न उठता है । क्या जो जिससे व्यतिरिक्त ( भिन्न )
है उसका उसमें अभाव व्यतिरेक है ? अर्थात् अधिकरण से भिन्न
और उसमें रहने वाला अभाव व्यतिरेक है । अथवा प्राभाकर मतके
अनुसार उसका अभावरूप दूसरेका होना ही व्यतिरेक है ? अर्थात्
भूतलादि अधिकरणसे अतिरिक्त घटाभाव कोई वस्तु नहीं है, किन्तु
अधिकरणस्वरूप ही है । इन दोनों पक्षोंमें प्रथम पक्षके अनुसार
शशशृङ्गमें क्रमयौगपद्यका अभाव अप्रामाणिक है । क्योंकि जैसे, वृक्ष-
रहित पर्वतकी तराई प्रत्यक्ष प्रमाणसे देखी जाती है, वैसे क्रमयौगपद्यसे
रहित शशशृङ्ग किसी भी प्रमाण से नहीं जाना जाता है ।
दूसरा पक्ष अर्थात् शशविषाणका क्रमयौगपद्याभावरूप होना भी
प्रामाणिक नहीं है । क्योंकि घटाभावके समान शशविषाण किसी
प्रमाणसे उपलब्ध नहीं है । अर्थात् शशविषाण क्रमयौगपद्याभावरूप
तब होता जबकि "शशविषाणे क्रमयौगपद्याभावः" ऐसी प्रतीति किसी
प्रमाणसे होती, किन्तु ऐसा होता नहीं है । घटाभाव तो यदि
अधिकरणस्वभाव भी हो तो भी "भूतले घटाभाव " यहां घटाभावकी
स्वतन्त्ररूपसे प्रतीति होती है ।

७४ आत्मतत्त्वविवेके
न प्रमाणगोचर इति चेत्, न, तस्य तद्विविक्तेतरस्वभावस्यापि
प्रमाणात् एव सिद्धेः१, असिद्धौ वा तत्राप्यव्यवहार एव ।
घटस्तावत् स्वाभावविरहस्वभावः प्रमाणसिद्धः ताद्रूप्येण
कदाचिदप्यनुपलम्भात् । एतावतैव तदभावोऽपि घटविरहस्वभावः
सिद्ध इति चेन्न, घटभावस्य तदभावविरहस्वभावत्वानभ्युपगमात् ।
न चान्यस्य स्वभावे प्रमाणगोचरे तदन्योऽपि सिद्धः स्यादति-
प्रसङ्गात् ।
यदि कहो कि—शशविषाणके अप्रामाणिक होनेसे यदि उसमे
क्रमयौगपद्याभाव या तत्स्वरूपत्व न बन सके तो घटाभाव भी (बौद्धके
यहाँ) प्रामाणिक नहीं है । अर्थात् अप्रामाणिक होनेपर भी भूतलादिमे
जैसे घटाभावादिका व्यवहार होता है, वैसे अप्रामाणिक भी शश-
विषाणमे क्रमयौगपद्याभावका व्यवहार होनेमे कोई अनुपपत्ति नहीं
होगी—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि घटाभाव भी अपने से
भिन्न जो भूतलादि उससे इतर स्वभावका है, यह प्रमाणसे ही सिद्ध
है । यदि न सिद्ध हो तो उसमे (घटाभावमे) भी व्यवहार नहीं ही
होगा, क्योंकि प्रमाणसिद्ध वस्तुका ही व्यवहार होता है ।
यदि कहो कि—घट घटाभावके अभावरूपसे सिद्ध ही है, क्योंकि
उसकी कभी भी घटाभावरूपमें उपलब्धि नहीं होती है । इतनेसे ही
घटाभाव भी घटविरहरूपसे सिद्ध है । अर्थात् बौद्धमतमे स्वतन्त्र-
रूपसे घटकी प्रमिति न होनेपर भी जैसे उसमें सभी लौकिक व्यवहार
होते हैं, वैसे ही घटाभाव भी यद्यपि स्वतन्त्ररूपसे प्रमाणसिद्ध वस्तु
नहीं है, तथापि उसमे लौकिक व्यवहार हो ही सकता है—तो यह ठीक
नहीं है । क्योंकि भावभूत घट घटाभावका अभावस्वभाववाला है,
ऐसा तुम नहीं मान सकते हो । कारण, तुम्हारे मतमे अभावके अलीक
होनेसे घट भी मिथ्या होने लगेगा । साथ ही यह भी नहीं हो सकता
कि एकके प्रमाणसे सिद्ध होनेपर दूसरी वस्तु भी सिद्ध हो जाय ।
१. प्रतियोगिसद्भावस्यापि अतद्व्यावृत्तिस्वभावस्य प्रमाणसिद्धत्वादिति
दीधितिः ।

क्षणभङ्गवादः ७५

एवम्भूतावेव घटतदभावौ यदेकस्य परिच्छित्तिरपरस्य व्यव-
च्छित्तिरिति चेत्, न, घटवद् घटाभावस्यापि प्रामाणिकत्वानभ्यु-
पगमे स्वभाववादानवकाशात् । प्रमाणसिद्धे हि वस्तुनि स्वभाव-
वादावलम्बनं न तु स्वभाववादावलम्बनेनैव वस्तुसिद्धिरिति¹
भवतामेव तत्र तत्र जयदुन्दुभिः ।
तत् किमिदानीं स्वाभावविरहस्वभावो घटः प्रमाणानैव
सिद्धः ? तव दृष्ट्या एवमेतत्, घटो हि यादृक्तादृक्स्वभावस्तावत्
प्रमाणपथमतीर्णस्तस्य तु यदि परमार्थतोऽभावोऽपि कश्चित् स्यात्,
स्यात् परमार्थतः सोऽपि तद्विरहस्वभाव इति तथैव प्रमाणेनावे-

क्योंकि वैसा होनेपर वृक्ष सिद्ध करनेके लिये प्रवृत्त हुआ प्रमाण घड़ा
भी सिद्ध कर दे । यह अतिप्रसङ्ग हो जायगा ।
(शङ्का) और जगह भले ही न हो, तथापि घट और घटाभावका
तो यही स्वभाव है कि एकके निषेधमे दूसरेकी प्रतीति हो जाती है ।
(उत्तर) ऐसा कहना ठीक नहीं है । क्योंकि घटके समान
घटाभाव तुम्हारे मतसे प्रामाणिक वस्तु नहीं है । अतः उसमे किसी
प्रकारका स्वभाववर्णन नहीं हो सकता है, क्योंकि प्रमाणसिद्ध वस्तुमे
ही स्वभावका वर्णन किया जा सकता है, न कि स्वभाव वर्णन कर देनेसे
ही वस्तुकी सिद्धि हो जायगी । यह आपकी ही घोषणा है ।
(शङ्का) तो क्या, अब घड़ेमे अपने अभावका विरहस्वभावत्व
प्रमाणसे नहीं ही सिद्ध होगा ?
(उत्तर) हां, तुम्हारे दर्शनके अनुसार तो ऐसा ही है । क्योंकि
घड़ा तो परमाणुओंके समूहरूपमे या एक अवयवीके रूपमें प्रमाणसिद्ध
है । किन्तु उसका अभाव भी यदि कोई पारमार्थिक वस्तु हो तो घड़ा
भी वस्तुतः उस अभावका अभावरूप हो । और यह अभावाभावरूपसे
ही प्रमाण द्वारा जाना भी जाय । किन्तु आप तो ऐसा मानते नहीं ।

१. वस्तुव्यवस्थितिरिति—१ पु० पा० ।

७६ आत्मतत्त्वविवेके
दितः स्यात् । न चैतदभ्युपगम्यते भवता । तस्माद् घटवत्
तदभावस्यापि प्रामाणिकत्वेनैवानयोः परस्परविरहलक्षणव्यति-
रेकसिद्धिः, अप्रामाणिकत्वे त्वनयोरपि न तथाभाव इति । शश-
विषाणादिष्वपीयमेव गतिः । ननु काल्पनिकरूपसम्पत्तिरेवास्त्व-
नुमानाङ्गम् , तन्न, तस्याः सर्वत्र सुलभत्वात् ।
ननु पक्षसपक्षविपक्षास्तावद्वस्त्ववस्तुभेदेन द्विरूपाः । तत्र
ये कल्पनोपनीतास्तत्र काल्पनिका एव पक्षधर्मान्वयव्यति-
रेकाः, प्रमाणोपनीतेषु तु प्रामाणिका एवेति विभागः ।
तदिह काल्पनिकाग्नेर्यद्यपि प्रमेयत्वादेर्व्यावृत्तिः काल्पनिक्यपि
सिद्धा तथापि प्रामाणिकजलह्रदादेः प्रामाणिक्येवेषितव्या, सा
इसलिये घड़ेके समान उसका अभाव भी यदि प्रामाणिक (तात्त्विक) माना
जाय, तभी घट घटाभावका विरहस्वरूप और घटा

च न सिद्धेति कुतस्तस्य हेतुत्वम् ? एवं प्रामाणिके शब्दे पक्षी-
कृते प्रामाणिक एव हेतुमद्भावो वक्तव्यः । न चासौ चाक्षुष-
त्वस्यास्तीति सोऽपि कथं हेतुः ? एवं कृतकत्वस्यापि वस्त्वेक-
नियतस्य धर्मस्य वास्तव एवान्वयो वक्तव्यः, वस्तुनो विपक्षाच्च
वास्तव एव व्यतिरेकः । न च तस्य तौ स्तः, तत् कथमसावपि
हेतुरिति¹ ।
प्रमाणके आधार पर हैं, वहां तो हेतुका रहना या न रहना प्रामाणिक ही
है, ऐसी व्यवस्था है। अतः काल्पनिक निरग्नि स्थान से प्रमेयत्वादि हेतु-
की व्यावृत्ति भी काल्पनिकरूपमें भले ही सिद्ध हो जाती है, तो भी अग्नि-
रहित प्रामाणिक जल ह्रदसे तो प्रमेयत्वहेतुकी व्यावृत्ति भी प्रामाणिक ही
होनी चाहिये । किन्तु वैसा तो सिद्ध नहीं है । ऐसी दशामें
“अग्निमान् प्रमेयत्वात्” इस अनुमानमें प्रमेयत्व कैसे हेतु बनेगा ?
ऐसे ही “शब्दो नित्यः चाक्षुषत्वात्” इस असिद्ध अनुमानमें भी
प्रामाणिक शब्दके पक्ष किये जानेपर उसमे हेतु की सत्ता भी
प्रामाणिक ही अपेक्षित है। किन्तु शब्दमें चाक्षुषत्व तो वस्तुतः
है नहीं, तब वह भी कैसे हेतु होगा ? इसी प्रकार
“नित्यः शब्दः कृतकत्वात्” इस विरुद्ध अनुमानमे भी तात्त्विक
कृतकत्वधर्मका सपक्षमें रहना भी तात्त्विक ही होगा और वास्तविक
विपक्षमे न रहना भी वास्तविक ही होगा। किन्तु कृतकत्व हेतुमें
उक्त बातें नहीं हैं। अर्थात् प्रकृत अनुमानमे सपक्षभूत नित्य पदार्थमें
कृतकत्वका रहना (अन्वय) और विपक्षभूत अनित्यमें न रहना
(व्यतिरेक) दोनों ही असिद्ध हैं। ऐसी दशामें वह भी कैसे हेतु हो
सकता है ? अर्थात् पूर्वोक्त व्यभिचारी, असिद्ध और विरुद्ध हेतुओंसे
अनुमितिकी आपत्ति नहीं होगी।
(उत्तर) उक्त कथन भी प्रलापमात्र है। क्योंकि जबतक कोई
नियामक न हो, यह नहीं कहा जासकता कि अपने अभीष्टकी ओर
१. नन्वित्यादिः हेतुरित्यन्तः पूर्वपक्षः ।

७८ आत्मतत्त्वविवेके
प्रलपितमेतत् , नहि नियामकमन्तरेण सम्पदं प्रति कल्पना
त्वरते विपदं प्रति तु विलम्बत इति शक्यं वक्तुम् , तथा च
निर्वह्निकमपि कूर्मरोम सधूममिति कल्पनामात्रेण विपक्षवृत्तित्वात्
धूमोऽपि नाग्निं गमयेत् ।
वास्तव्यां रूपसम्पत्तौ किमनेन काल्पनिकेन दोषेणेति चेत् ,
तर्हि वास्तव्यामसम्पत्तौ किं काल्पनिक्या तथेति समानम् ।
विरोधा विरोधौ विशेष इति चेत्, कुत एषः ? उभयोरेकत्र वस्त्व-
वस्तुत्वादन्यत्रावस्तुत्वादिति चेत् , तत् किं काल्पनिकोऽपि धूमो
कल्पना तीव्र हो जाती है, और अनिष्टके प्रति तो मन्द पड़ जायगी ।
ऐसा मानने पर "अग्निरहित भी कूर्मरोम धूमवान् है" इस व्यभिचार-
कल्पनामात्रसे ही धूम विपक्षगामी हो जायगा तथा उससे पर्वतमे अग्नि-
की अनुमिति नहीं होनी चाहिये ।
यदि कहो कि—वस्तुतः तो धूम विपक्षगामी नहीं है, अतः कल्पना-
द्वारा उसे विपक्षगामी बनानेमे क्या हानि है ? सत्त्व और क्षणि-
कत्वकी भी शशशृङ्गमे वास्तविक व्यतिरेकव्याप्ति नहीं है, तब काल्प-
निक व्यतिरेकव्याप्तिसे आपको क्या लाभ है ? इस तरह हम दोनों
समान हैं ।
यदि कहो कि—कूर्मरोम मिथ्या है और उसमें वास्तविक धूमका
रहना विरुद्ध है, किन्तु काल्पनिक कूर्मरोम या शशशृङ्गमे क्षणिकत्व
क्रमयौगपद्यका अभाव भी काल्पनिक ही रहे, तो इसमें कोई विरोध
नहीं है, यही हम दोनोंमें अन्तर है—तो बताओ, क्यों एक जगह विरोध
है और दूसरी जगह अविरोध है ?
यदि कहो कि—दोनों स्थलोंमे एक जगह तो वस्तु ( धूम ) और
अवस्तु ( कूर्मरोम ) का सम्बन्ध होनेमे विरोध है तथा दूसरी जगह
अवस्तु अवस्तुका सम्बन्ध होनेमे अविरोध है—तो क्या काल्पनिक भी
धूम वस्तुभूत ( वास्तविक ) है कि कूर्मरोमको उसके साथ विरोध
हो जाय ?

क्षणभङ्गवादः ७९
वस्तुभूतो येन कूर्मरोम्णस्तेन सह विरोधः स्यात् ? क्वचिद्-
वस्तुभूत एवेति निर्धूमत्वमपि क्वचिद्वस्तुभूतमिति तेनापि विरोध
एव । तस्माद् यथा काल्पनिकी विपत्तिर्न दोषाय तथा काल्प-
निकी सम्पत्तिरपि न गुणायेति व्यतिरेकभङ्गः ।
क्षणभङ्गसिद्धौ प्रकारान्तरखण्डनम्
अस्तु तर्हि ध्रुवभावित्वेन विनाशस्याहेतुकत्वे सिद्धे¹ क्षण-
भङ्गः, न, विकल्पानुपपत्तेः । तद्धि तादात्म्यं वा, निरुपाख्यत्वं
वा, तत्कार्यत्वं वा, तद्व्यापकत्वं वा, अभावत्वमेव वेति ।
यदि कहो कि—वहाँ तो वह धूम वास्तविक ही है, अतः उस
वास्तविक धूमका अवास्तविक कूर्मरोमसे विरोध है ही—तो निर्धूमत्व
भी कहीं ( जलादिमे ) वास्तविक ही है, इस प्रकार निर्धूमत्वसे भी
कूर्मरोमको विरोध ही होगा । अर्थात् कूर्मरोममे धूमाभाव भी नहीं
रह सकेगा और उसमे धूमवत्ताका आपादन किया ही जा सकता है ।
अत जैसे, काल्पनिक व्यभिचारसे अनुमानमे कोई दोष नहीं आता
है, वैसे ही सत्त्व और क्षणिकत्वके व्यतिरेकके काल्पनिक सहचारसे
भी कोई लाभ नहीं है । इस तरह तुम्हारे सत्त्व और क्षणिकत्वमें
व्यतिरेकव्याप्तिका भङ्ग हो गया ।
क्षणभङ्गसिद्धिमें प्रकारान्तरका खण्डन
( शङ्का ) क्षणिकत्वकी सिद्धि दूसरे ही प्रकारसे की जायगी । वह
यों है—चूँकि वस्तुओंका विनाश अवश्यभावी है, इसलिए वह विनाश
बिना हेतुका ही होगा । क्योंकि जो अवश्यभावी होता है, उसमे किसी
हेतुकी अपेक्षा नहीं रहती है । इस प्रकार जब विनाश होनेमें किसी
हेतुकी अपेक्षा नहीं है, तब तो कोई भी वस्तु उत्पन्न होते ही नष्ट होती
रहेगी और क्षणिकत्व स्वतः सिद्ध हो जायगा ।
( उत्तर ) क्षणिकत्व सिद्ध करनेका उक्त प्रकार भी ठीक नहीं है ।
क्योंकि यहाँ आगे दिये जानेवाले पाँच विकल्पोंमे कोई भी सम्भव नहीं
१. ध्रुवभावित्वाद विनाशस्याहेतुकत्वेन—१ पु० पा०

८० आत्मतत्त्वविवेके
न पूर्वः—निषेध्यनिषेधयोरेकत्वानुपपत्तेः । उपपत्तौ वा
विश्वस्य वैश्वरूप्यानुपपत्तेः ।
ननु कालान्तरेऽर्थक्रियां * प्रत्यशक्तिरेवास्य नास्तिता, सा
च कालान्तरे समर्थेतरस्वभावत्वमेवेति चेत्, नन्वयमेव क्षण-
भङ्गस्तथा चासिद्धमसिद्धेन साधयतः कस्ते प्रतिनन्दः ? १
अपि च देशान्तरकालान्तरानुषङ्गिणस्तस्य नास्तिता यद्य-
है । जैसे—"विनाश अहेतुक है" इस कथनका क्या अभिप्राय है ?
क्या विनाश प्रतियोगीस्वरूप है ? या निरुपाख्य अर्थात् अलीक है ?
या प्रतियोगीका ही कार्य है ? या उसका व्यापक है ? अथवा अभाव-
स्वरूप ही होता हुआ प्रागभावके समान अहेतुक है ?
इनमें प्रथम विकल्प नहीं हो सकता है । क्योंकि निषेधकी जाने-
वाली वस्तु और उसका निषेध दोनों एक नहीं हो सकते हैं । यदि
परस्पर विरोधी स्वरूपवाले भी निषेध्य और निषेध एक हो जायें तो
संसारमें वही विचित्रता ही नहीं रह जायगी और गौ एवं अश्व भी एक
होने लगेंगे ।
यदि कहो कि—उत्तरकालमें अर्थक्रियाके प्रति भाववस्तुगत जो
असमर्थता है, वही उसका अभाव कहा जाता है । अर्थात् समर्थसे भिन्न
स्वभाववाला यही भाव अभाव कहा जाता है तथा उस असमर्थताको ही
भावका नाश भी कहते हैं—तो यह कथन ठीक नहीं है । क्योंकि प्रथम
क्षणमें सामर्थ्य और दूसरे क्षणमें असामर्थ्य रूप विरोधी धर्म बताकर
यदि एक ही वस्तुको दोनों क्षणोंमें भिन्न भिन्न सिद्ध करना चाहते हो, तो
यही तुम्हारा क्षणभङ्ग है और यह स्वयं असिद्ध है । एवं इस क्षणभङ्गको
सिद्ध करनेके लिये जो क्षणभेदसे सामर्थ्य और असामर्थ्यरूप प्रमाण
उपस्थित कर एक ही वस्तुको भिन्न भिन्न बताते हो, वह भी असिद्ध ही है ।
इस प्रकार असिद्धको असिद्धसे ही सिद्ध करते हुए तुम्हें कौनसा आनन्द
प्राप्त हो रहा है ?
एवं उस स्थान और उस क्षणके अतिरिक्त अन्य स्थान तथा अन्य
१. प्रतिमन्दः—१, ३ पु० पा०

क्षणभङ्गवादः [८१]

मेव, नूनमनवरमिदमुक्तं यदयमेव देशान्तरकालान्तरानुपङ्गीति ।
यदि वा स्वदेशकालवत् कालान्तरदेशान्तरयोरपि नास्तिताननु-
षङ्गेऽस्तित्वप्रसङ्गः । अशक्तेः कथमस्तु ? शक्तेः सत्तालक्षणत्वा-
दिति चेत्, अथ कालान्तरकार्यं प्रति स्वकालेऽशक्तिरसत्त्वं ? किं
वा स्वकार्यमपि प्रति कालान्तरेऽशक्तिरसत्त्वम् ?
आद्ये स्वकालेऽप्यसत्त्वप्रसङ्गः, तदानीमपि तस्य ताद्रूप्यात् ।
कालान्तरकार्यं प्रत्येवमेतदिति चेत्, किमयं मन्त्रपाठः ? न हि


क्षणोंमें भी रहनेवाला वह अभाव यदि प्रतियोगी (भाव) रूप ही
हो तो निश्चय ही यह कथन भी तुम्हारे मतानुसार असंगत ही होगा ।
क्योंकि यह भाव ही देशान्तर और कालान्तरतक रहनेवाला सिद्ध
हो गया ।
यदि दूसरे देश और दूसरे क्षणोंमें भी अभावका अनुवर्तन न मानो
तो वहाँ भावका अस्तित्व सिद्ध हो जायगा ।
यदि कहो कि—दूसरे क्षणोंमें वह भाव वस्तु अर्थक्रियाके प्रति
अशक्त है, अतः उसका दूसरे क्षणोंमें अस्तित्व कैसे होगा ? क्योंकि
शक्ति ही अस्तित्वका लक्षण है—तो बताओ, अन्यकालीन कार्यके प्रति
अपने कालमें जो असमर्थता है, उसे असत्त्व मानते हो ? अथवा अपने
कार्यके प्रति भी दूसरे कालमें असमर्थताको असत्त्व कहते हो ?
प्रथम पक्षमें अपने कालमे भी वह वस्तु असत् होने लगेगी, क्योंकि
उस कालमे भी उसमें असक्ति है ही।
यदि कहो कि—अन्यकालीन कार्यकी दृष्टिसे वह अपने कालमे भी
असत् ही है—तो क्या यह मन्त्रपाठ है कि आँख मूंदकर सत्‌को भी
दूसरी दृष्टिसे असत् मान लिया जाय ? ऐसा व्यवहार तो कहीं नहीं होता
कि जो जिस कार्यमें अशक्त है, वह उस कार्यकी दृष्टिसे है ही नहीं ।
यह नहीं होता कि गर्दभकी दृष्टिसे धूम संसारमें है ही नही। ऐसा
क्यों होता है ? इसीलिए कि अशक्त होनेसे उसका स्वरूप नहीं
निवृत्त हो जाता है ।

८२ आत्मतत्त्वविवेके
यो यत्राशक्तः स तदपेक्षया नास्तीति व्यवह्रियते। न हि रासभा-
पेक्षया धूमो जगति नास्ति। तत् कस्य हेतोः ? न ह्यशक्तस्य
स्वरूपं निवर्तत इति।
द्वितीये तु यदि कालान्तराधाराऽशक्तिः, कथं तदात्मिका ?
तदाधारा चेत्, तदैवासत्त्वप्रसङ्गः। कालान्तरे तु विपर्ययः।
तस्मात्—
विधिरात्माऽस्य भावस्य निषेधस्तु ततः परः।
सोऽपि चात्मेति कः प्रेतः शृण्वन्नपि न लज्जते ॥
अनिर्वचनीयवृत्तिवादखण्डनम्
अस्तु तर्हि 'भावस्वरूपातिरिक्ता निवृत्तिर्नास्ति' इति
दूसरे पक्षके अनुसार यदि उस अशक्तिको अन्य कालमे मानो तो
क्षणिकवादीके मतमे अन्य कालमें उस प्रतियोगी वस्तुके नहीं रहनेसे
वह अशक्ति प्रतियोगीस्वरूप कैसे हो सकती है ? अर्थात् प्रतियोगीका
विनाश प्रतियोगीस्वरूप ही है, यह तुम्हारा कथन गिर जाता है।
यदि कहो कि—यह अशक्ति उस प्रतियोगी वस्तुके कालमे ही है—
तो अशक्तिके कारण वह प्रतियोगी अपने सत्ताकालमें ही असत् होने
लगेगा। इस प्रकार विरोध आ जाता है। साथ ही अपने कालमे असन्
होनेपर दूसरे क्षणोमे इसके विपरीत सत् होने लगेगा।
इसलिए अस्तित्व ही इस भावपदार्थका स्वरूप है, निषेध तो इससे
भिन्न वस्तु है। अतः अस्तित्वके समान निषेध भी वस्तुका स्वरूप
है, ऐसा सुनकर कौन बुद्धिमान् लज्जित नहीं हो जायगा।
विधि स्वरूप है भावका, नहि निषेध विधिरूप।
को नहि सुन लज्जित बने, दोनोंको विधिरूप॥
अनिर्वचनीयवृत्तिवादखण्डन
(शङ्का) यदि प्रथम पक्ष सम्भव नहीं है तो धर्मकीर्तिके "भाव-
स्वरूपातिरिक्ता निवृत्तिर्नास्ति" इस वाक्यमे "सोपाख्या" शब्द जोड़-
कर द्वितीय पक्ष ही रहे। अर्थात् "भावस्वरूपातिरिक्ता सोपाख्या

क्षणभङ्गवादः ८३
वाक्यस्य¹ सोपाख्येति शेषः । नन्वयमपि क्षणभङ्गस्योद्गारः²,
स च कफोणिगुडायितो वर्तते । भवतु वा निवृत्तिरसमर्था, तथाप्य-
हेतुकत्वे तस्याः किमायातम् ? तुच्छस्य कीदृशं जन्मेति चेत् ?
यादृशः कालदेशनियमः । सोऽपि तस्य कीदृश इति चेदेवं तर्हि न
घटनिवृत्तिः क्वापि कदापि, सर्वत्रैव सदैवेति स्यात् ।
निवृत्तिर्नास्ति” ऐसा परिष्कारकर तदनुसार वस्तुकी निवृत्ति ( विनाश )
भावस्वरूपसे अतिरिक्त निरुपाख्य ( अनिर्वचनीय ) है । अतएव
वैसी निवृत्ति ( विनाश ) के लिए किसी हेतुकी अपेक्षा नहीं होनेसे
उत्पन्न होते ही वस्तुका विनाश स्वतः होता रहेगा और क्षणिकवाद
अनायास सिद्ध हो जायगा ।
( उत्तर ) निश्चित ही यह कथन भी क्षणभंगका उद्गार ( डँकार )
मात्र है । और वह कण्ठके भीतर पहुंचे हुए गुड़के समान है ।
अर्थात् भीतर गये हुए गुड़का जैसे कोई स्वाद नहीं आता, वैसे ही
उक्त परिष्कारसे भी क्षणभङ्गसिद्धिमें कोई लाभ नहीं है । क्योंकि
अनेक प्रकारसे क्षणभङ्गवादको खण्डित किया जा चुका है ।
अथवा वस्तुकी निवृत्ति अनिर्वचनीय भले ही हो, फिर भी “वह
बिना किसी हेतुकी अपेक्षा किये ही होती रहती है” यह तो सिद्ध
नहीं ही हुआ ।
यदि कहो कि-अभाव ( निवृत्ति ) तो मिथ्या है, अतः उसका
हेतुसे जन्म कैसा ? तो ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि जैसे अलीक भी
किसी नियत काल और देशमे ही होता है, वैसे वह किसी नियत
हेतुसे ही होगा ।
यदि कहो कि-अलीकमें देश और कालका सम्बन्ध भी कैसा ?
अर्थात् अलीकमे देशकालका सम्बन्ध भी नहीं होता है-तब तो घटकी
निवृत्ति कहीं भी और कभी भी न हो सकेगी या देशकालका नियम
न होनेसे सब जगह और हमेशा ही होने लगेगी ।
१, नास्तीत्यस्य-२ पु० पा० । निरुपाख्यैव निवृत्तिरस्तीत्याशयः ।
२. स्योद्धार -१ पु० पा०

८४ आत्मतत्त्वविवेके
भवतु¹ प्रथम एवेति चेत्—सोऽयं भावनास्तितास्वरूप-
प्रतिषेधो वा भावप्रतिषेधेन निवृत्तिस्वरूप²निरुक्तिर्वेति ? आद्ये
भावस्यैव सदातनत्वप्रसङ्गः, द्वितीये तु निवृत्तेरेवेति ।
विनाशे प्रतियोगिमात्रकार्यत्वखण्डनम्
अस्तु तर्हि तत्कार्यत्वमेव ध्रुवभावित्वम् , न, तस्यापि कार्य
( शङ्का ) यहाँ प्रथम पक्ष ही रहे । अर्थात् घटकी निवृत्ति किसी
देशकालमें नहीं होगी ।
( उत्तर ) तो बताओ, "भावकी निवृत्ति कहीं और कभी नहीं होती
है" इससे क्या कहना चाहते हो ? यदि इससे भावनिवृत्तिके स्वरूपका
प्रतिरोध करते हो तो भावमें ही शाश्वतिकत्व आने लगेगा । अर्थात्
भाव अविनाशी हो जायगा । यदि तो—"भावकी नास्तिता किसी हेतु
द्वारा नहीं होती है ' यह आशय बताकर निवृत्तिस्वरूपका निर्वचन
करना चाहते हो—तब तो इस द्वितीय आशयके अनुसार भावकी
नास्तिता ( निवृत्ति ) ही शाश्वतिक होने लगेगी । क्योंकि निवृत्तिके
होनेमे किसी हेतुकी अपेक्षा नहीं होनेसे उसके हमेशा होनेमे कोई
रुकावट नहीं है ।
विनाशमें प्रतियोगिमात्रकार्यत्वका खण्डन
( शङ्का ) 'विनाश ध्रुवभावी है' इसका यह अर्थ है कि विनाश
प्रतियोगीका कार्य है । अतः वह प्रतियोगीकी उत्पत्तिके बाद तुरन्त हो
जाता है ।
( उत्तर ) यह नहीं हो सकता । क्योंकि आपके उक्त कथनका
क्या अभिप्राय है ? क्या विनाश प्रतियोगीका भी कार्य है ? या
प्रतियोगीका ही कार्य है ? प्रथम पक्षमे विरोध होगा । क्योकि
'प्रतियोगीका भी कार्य है" ऐसा कहनेसे मालूम पड़ता है कि विनाशके
प्रति प्रतियोगीके अतिरिक्त भी कारण अपेक्षित है । एसी दशामे
उस अपेक्षित कारणान्तरके विलम्बसे विनाश भी विलम्बसे होगा ।
१ . अस्तिवेति व्यावृत्तिरतः पाठः ।
२ प्रतिषेधेन 'नास्तिता' स्वरूप—१ पु० पा०

इति पक्षे विरोधात्, तस्यैव कार्यं इत्यसिद्धेः। यत्किञ्चिदुत्पन्न-
मात्रस्य कार्यं स एव तस्य विनाश इति चेत्, तर्हि यस्याः
सामग्र्या यत् कार्यं तत् तदतिरिक्तानपेक्षमिति साधनार्थः, तमिमं
को नाम नानुमन्यते१? कार्यमेव विनाश इति तु केनानुरोधेन
व्यवहर्त्तव्यम् ? किं तद्विरहवत्त्वात् कार्यस्य ? किं वा तद्विरह-
रूपत्वात् ?
न तावत् पूर्वः, सहकारिष्वपि तथाप्रसङ्गात्, २ विरहस्वरूपा-
निरुक्तेश्च। न द्वितीयः, स हि कार्यकाले कारणस्य योग्यानुप-
अतः प्रतियोगिकार्यत्वरूप ध्रुवभावित्व हेतु वस्तुकी क्षणिकत्वसिद्धिके
विरुद्ध होगा।
यदि—"प्रतियोगीका ही कार्य विनाश है" यह दूसरा पक्ष लो तो
यह हेतु स्वयं असिद्ध है। क्योंकि प्रतियोगीके अलावे मुद्गरादि भी
विनाशके प्रति कारण होते हैं।
यदि कहो कि—उत्पन्न होते ही वह कारण जिस कार्यको पैदा करता
है, वह कार्य ही उसका विनाश है—तो यहाँ कारणका अर्थ कार्य पैदा
करनेवाली सामग्री लो तो उक्त कथनके पूर्वार्ध (साधनभाग) का
यह अर्थ निकला कि "जिस सामग्रीसे जो कार्य होता है, वह कार्य
उससे अतिरिक्तकी अपेक्षा नहीं करता है" तो इसे कौन नहीं स्वीकार
करता है ? क्योंकि सामग्रीसे ही तो कार्य होता है। किन्तु "वह कार्य
ही विनाश है अर्थात् उस प्रतियोगीकी उत्पत्तिके अनन्तर होनेवाला वह
कार्य विनाश ही है" यह बात किस अनुरोधसे मानी जाय ? क्या
कारणसे भिन्न कार्य होता है, इसलिए ? अथवा कारणका अभावरूप
कार्य है, इसलिये ?
इसमें पहला पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि सहकारीमें भी कारण-
विनाशरूप कार्यका व्यवहार होने लगेगा। अर्थात् सूतका सहकारी
१. अनुमनुते—२ पु० पा०।

८६ आत्मतत्त्वविवेके
लम्भनियमाद्वा भवेत् ? व्यवहारानुरोधाद्वा ? अतिरिक्तविनाशे
बाधकानुरोधाद्वेति ?
न प्रथमः, उपलभ्यन्ते हि पटकाले वेमादयः । न ते त
इति चेत्, किमत्र प्रमाणम् ? अभेदेऽपि किं प्रमाणमिति चेत् ,
मा भूत तावत्, सन्देहस्थितावपि अनुपलब्धिबलाल्लम्बनविलयात् ।
जो करघा आदि है, वह भी सूत्ररूप कारणसे भिन्न है, अतः करघामें
भी तन्तुनाशका व्यवहार होने लगेगा । साथ ही कारणविरह (भेद)
के स्वरूपका निर्वाचन भी नहीं हो सकता है । क्योंकि विरहका
अर्थ अभाव लो तो वह आपके मतमें मिथ्या वस्तु है, अतः वह
कार्यमे कैसे रह सकता है ? अर्थात् वह कार्य कारणविरहवान्
अर्थात् कारणभेदवान् अर्थात् कारणसे भिन्न कैसे होगा ? क्योंकि कार्य
सत् और विरह (भेद) अभावरूप होनेसे असत् है । तथा सत्
असत्‌का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं होता । यदि उस कारणविरह
(भेद) को असत् होनेसे बचानेके लिए अधिकरणस्वरूप मानो तो
वह अधिकरण कार्य ही है । इस स्थितिमें जो कार्य कारणभेदरूप है,
वह कारणभिन्न कैसे होगा ? क्योंकि वही आश्रित और वही आश्रय नहीं
होता है । इसलिए भेद ही भिन्न कैसे होगा ?
यदि दूसरा पक्ष लो तो वह भी ठीक नहीं है । क्योंकि कार्यको
कारणका अभावरूप माननेका क्या कारण है ? क्या, इसलिये कि
कार्यकालमें उपलब्धिकी योग्यता रहते हुए भी नियमत कारणकी उप-
लब्धि नहीं होती है ? या लौकिक व्यवहारके अनुरोधसे ? अथवा
कारणके विनाशको (अभावको) कार्यसे अतिरिक्त माननेमें बाधक
होनेसे ?
इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं है । क्योंकि पटकालमें भी वेमा
आदि उसके कारणकी उपलब्धि होती है । यदि कहो कि-पटकालमे
जो वेमा आदि उपलब्ध होते हैं, वे पहलेवाले नहीं हैं किन्तु दूसरे ही
हैं-तो इसमें प्रमाण क्या है ? यदि मुझसे पूछो कि-जो वेमा पट
होनेके पहले था वही पटकालमें भी है, इसमें क्या प्रमाण है ?—तो में

द्वितीय परिच्छेद: बाह्यार्थभंगवाद (विज्ञानाद्वैतवाद) निराकरण

क्षणभङ्गवादः ८७
न द्वितीयः, न हि पटो जात इत्युक्ते तन्तवो नष्टा इति
कश्चिद् व्यवहरति । पटस्यानतिरेकात् तन्तुमात्रजन्मनि भेदाग्रहा-
दव्यवहार इति चेत्, न तर्हि व्यवहारबलमपि १ । विसभागसन्ततौ
तावद् व्यवहारबलमस्तीति चेत्, नैतदेवम् । यदि हि तन्तुमालैव
पटनिवृत्तिः, कथं तदाश्रयस्तदात्मको वा पटः प्राक् ? अन्यैवा-
कहूँगा कि इसमें भी भले ही कोई प्रमाण न हो, तो भी सन्देहके
आधारपर ही तुम्हारा यह कथन कि 'कार्यकालमें कारणकी उपलब्धि
नहीं होती है" विलीन हो जाता है ।
दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि "पट उत्पन्न हो गया"
ऐसा कहनेपर कोई भी यह व्यवहार नहीं करता कि 'तन्तु नष्ट हो गये'।
यदि कहो कि-वैसा व्यवहार न होनेका कारण यह है कि पट तन्तुसे
कोई भिन्न पदार्थ नहीं है, किन्तु विभिन्न प्रकारके तानाबानावाले तन्तु
ही पट कहे जाते हैं, और पूर्व तन्तुओंसे अग्रिम तन्तुओंके भिन्न होनेपर
भी एक जातिके होनेसे यह नहीं मालूम पड़ता कि बुने हुए तन्तु पहलेके
तन्तुओंसे भिन्न हैं । यही कारण है कि "कारणभूत तन्तु नष्ट हो गये"
ऐसा लोकव्यवहार नहीं होता-तब तो यह आया कि तुम्हारे पक्षमें
व्यवहारका बल भी नहीं है ।
यदि कहो कि-कारण-कार्य की सन्तति दो प्रकारकी होती है । एक
सदृश और दूसरी विसदृश । सदृश सन्तति तन्तु-पटकी और विसदृश
सन्तति काष्ठ-अङ्गारकी होती है । यहाँ विसदृश सन्ततिमे देखा जाता
है कि अङ्गार पैदा होनेपर कारणभूत काष्ठका विनाश-व्यवहार होता
है । इस दृष्टान्तसे हम कल्पना कर लेंगे कि सदृश सन्ततिमे भी अग्रिम
कार्य ही कारणका नाश है-
तो यह भी ठीक नहीं है । क्योंकि जहाँ पटनाश होनेपर पुनः
तन्तुमालाकी अवस्था प्राप्त हो गयी, वहाँपर पटरूपकारणका नाश
तुम्हारे कथनानुसार अतिरिक्त वस्तु न होकर उसका अग्रिम कार्य जो
तन्तुमाला, तद्रूप ही होगा । ऐसी दशामें जो तन्तुमाला पटनाश
१. व्यवहारावलम्बनमपि-२ पु० पा० ।

८ आत्मतत्त्वविवेके
भाविति चेत्, न तावज्जातिकृतमन्यत्वमुपलभ्यते¹। व्यक्तिकृतं तु
नाद्यापि सिध्यति । अतएव² तत्सिद्धावितरेतराश्रयत्वम्³ । तथापि
यद्येवं स्यात् कीदृशो दोष इति चेत्, न कश्चित्, केवलं प्रमाणा-
भावो व्यवहाराननुरोधश्च । तदसिद्धावपि सिध्यतस्तस्य निमित्ता-
न्तरापेक्षणात् ।
स्वरूप है, उसीमें पहले पट कैसे था ? अथवा तुम्हारे मतानुसार
वही तन्तुमाला पहले पटस्वरूप कैसे थी ?
यदि कहो कि-पटनाशकालीन तन्तुमाला पटकालीन तन्तुमालासे
भिन्न है, इसलिए पूर्व तन्तुमाला पटरूप होगी और उत्तर तन्तुमाला पट-
नाशरूप होगी, इसमें कोई विरोध नहीं है-तो यह भी ठीक नहीं है।
क्योंकि पूर्व और उत्तर तन्तुमालाओंमें जातिकृत भेदकी उपलब्धि नहीं
होती और व्यक्तिकृत भेद तो बिना क्षणभंग सिद्ध हुए हो नहीं सकता,
जो अभीतक सिद्ध नहीं हो सका है । इसीलिये यहाँ अन्योन्याश्रयदोष
भी हो जाता है । क्योंकि पूर्व तन्तुमालासे उत्तर तन्तुमाला भिन्न
सिद्ध हो तो उत्तर तन्तुमाला पटनिवृत्तिरूप सिद्ध हो और उत्तर तन्तु
मालाके पटनिवृत्तिस्वरूप सिद्ध होनेपर ही वह (उत्तर तन्तुमाला) पट-
स्वरूप पूर्व तन्तुमालासे भिन्न सिद्ध हो सकती है ।
(शङ्का) फिर भी उत्तर तन्तुमालारूप अग्रिम कार्यको ही पटात्मक
पूर्व तन्तुमालास्वरूप कारणका विनाशरूप माननेमें क्या हानि है ?
(उत्तर) कोई हानि नहीं है । केवल इतनी बात है कि प्रमाणका
अभाव है और ऐसा व्यवहार भी नहीं होता । जहाँपर तन्तुनाशसे ही
पट नाश हुआ हो, वहाँपर पटनाश तन्तुमालास्वरूप नहीं सिद्ध हो
सकता, क्योंकि तन्तुमाला भी वहाँ नहीं है । किंतु यहाँपर पटध्वंसरूप
निमित्तान्तरसे ही पटनाशका व्यवहार तुम भी मानोगे ।
१. मान्यदुपलभ्यते—१ पु० पा० ।
२. इत एव—पा० क्वचित् । टीकाकारसम्मततोऽपि ।
३—पूर्वापरतन्तुमाल्योर्भेदे सति निवृत्तिरूपत्व निवृत्तिरूपतायाञ्च सत्यां
भेद इत्य यान्याश्रय इति शङ्करमिश्रः ।

क्षणभङ्गवादः ८९
अपि च तन्तुविनाशः सामान्यतस्तन्तुविरहस्वभावो वा स्यात्
तद्विपरीतो वा । आद्ये कथं तन्त्वन्तरम् ? न हि सामान्यतो
नीलमनीलविरुद्धस्वभावमनीलान्तरम् । द्वितीये कथं तद्विरोधी ?
न हि नीलं सामान्यतोऽपि नीलान्तरविरोधि । विशेषमात्र एवायं
विरोध १ इति चेत्, तत् किं सामान्यतोऽनुभयस्वभाव एव विनाशः ?
ओमिति ब्रुवतोऽन्यतरमुपादाय विनाशव्यवहारानुपपत्तिः । सामा-
एवं तन्तुस्वरूप विनाशको सामान्यरूपसे तन्तुविरहस्वभाववाला
मानते हो ? या तन्तुविरहस्वभाववाला नहीं मानते हो ? यदि पहला
पक्ष रखो तो वह विनाश दूसरे तन्तुका स्वरूप कैसे धारण कर लेगा ?
क्योकि सामान्यरूपसे अनीलका विरोधीस्वभाववाला नील दूसरे
अनीलका स्वरूप नहीं धारण कर लेता है । अर्थात् दूसरा अनील नहीं
बन जाता है ।
यदि दूसरा पक्ष मानो, अर्थात् वह तन्तुरूप विनाश यदि सामान्य-
रूपसे तन्तुविरहस्वभाववाला नहीं है, किन्तु तन्तुस्वभाववाला ही है,
तो फिर वह विनाश तन्तुनिवृत्तिरूप कैसे हो सकता है ? क्योंकि जैसे
सामान्यरूपसे एक नील दूसरे नीलका विरोधी नहीं होता, वैसे एक
तन्तु सामान्यरूपसे दूसरे तन्तुकी निवृत्तिरूप अर्थात् विरोधी नहीं हो
सकता है ।
यदि कहो कि—यह विरोध विशेषमात्रमे है, अर्थात् पूर्वतन्तुकी
निवृत्तिस्वरूप उत्तरतन्तु हो सकता है [जो क्षणिकत्वका साधक होगा]—
तो क्या वह पूर्वोक्त तन्तुरूप विनाश सामान्यरूपसे उक्त दोनों स्वभावोंमे
किसी स्वभावका नहीं है ? अर्थात् उक्त विनाश सामान्यरूपसे न
तन्तुका विरोधी ही है और न अविरोधी ही है ? यहाँ यदि "हाँ" कहो,
तब तो उन दोनों स्वभावोंमें किसीको लेकर सामान्यरूपसे तन्तुविनाशका
व्यवहार नहीं हो सकेगा ।
यदि कहो कि—सामान्यरूपसे विरोधी अविरोधीकी चिन्ता तब हो,
१. विशेष एवात्र विरोध--१ पु० पा०

९० आत्मतत्त्वविवेके
न्यस्यालीकत्वात् तत्र विरोधोऽपि किं करिष्यतीति चेत्, विलीन-
मिदानीं विरुद्धधर्माध्यासेन भेदप्रत्याशया, तस्य तदाश्रयत्वात् ।
नन्वतिरिक्ताभावपक्षे यथा पटः पटान्तराभाववांश्च तज्जाती-
यश्च, अभावो वा पटविरोधी पटान्तरसहवृत्तिश्चेति न कश्चिद्
विरोधः, तथा कार्याभावपक्षेऽपि भविष्यतीति । नैतदेवम्, प्रतियो-
गिना हि तादात्म्यसंसर्गरूजातीयत्वानि१ नेष्यन्ते, अप्रतियोगित्व-
प्रसङ्गात् भिन्नकालत्वात् सामान्यतो विरुद्धधर्मसंसर्गाच्च ।
जब कि सामान्यनामका कोई तत्त्व हो । किन्तु वह तो अलीक
(असत्) है, अतः यहाँ सामान्यरूपसे विरोध अविरोधका प्रश्न ही
नहीं है—तब तो गोत्व और अश्वत्वरूप विरुद्धधर्मोंके भी अलीक हो
जानेसे गौ और अश्वका भी भेद मिट जायगा । क्योंकि वह गौ
और अश्वका भेद गोत्व और अश्वत्वरूप विरुद्ध धर्मोंके कारण ही
होता है ।
(शङ्का) अभावको अतिरिक्त माननेवालेके मतमें जिस प्रकार पट
पटाभाववाला होता हुआ भी पटजातिका है, उसी प्रकार तन्तु भी तन्तु-
निवृत्तिरूप होता हुआ तन्तुजातिका बना रह सकता है । एव, जैसे
पटका विरोधी भी पटाभाव दूसरे पटके साथ रह जाता है, उसी प्रकार
तन्तुविनाश भी तन्तुरूप हो सकता है ।
(उत्तर) ऐसा कहना ठीक नहीं है। क्योंकि अपने प्रतियोगीके
साथ अभावका तादात्म्य नहीं होता, एक जगह रहना नहीं होता और

  • नहीं होती है । क्योंकि तादात्म्य होनेपर वह प्रतियोगित्व
    धर्मसे च्युत हो जायगा । अर्थात् प्रतियोगी नहीं रह जायगा । एव
    जिस कालमे प्रतियोगी रहता है, उस कालमे उसका अभाव नहीं रहता,
    इसलिये प्रतियोगी और उसके अभाव का एक जगह रहना सम्भव नहीं
    है। एव, प्रतियोगी और अभावमे सामान्यरूपसे विरोधी धर्म रहते
    हैं, इसलिये उनमें एकजातीयता नहीं हो सकती है ।
    १. सम्बन्धैकजात म—२ पृ० पा०

क्षणभङ्गवादः ९१

अप्रतियोगिना तु संसर्गे को दोषः ? न हि भेदविजा-
तीयतैककालताः संसर्गविरोधिन्यः। तादात्म्यं हि संसर्गित्वे
विरुद्धं विरोधित्वं च । ते च नेष्येते एव । नापि बाधकानु-
रोधः, तदभावात् ।
ननु घटाभावे घटोऽस्ति न वा ? आद्ये घटवति तद्भावः,
कपाले घटोऽस्तीति तान्यपि तद्वन्ति प्रसज्येरन् । नास्तीति
पक्षेऽनवस्थाप्रसङ्गः । अभावान्तरमन्तरेण तत्र नास्तिताव्यवहारे

अप्रतियोगी के साथ तो अभावका संसर्ग होनेमे कोई दोष नहीं है।
क्योंकि भेद, विजातीयता और एककालता परस्परमे संसर्गके विरोधी
नहीं होते हैं। कारण, तादात्म्य और विरोधी होना ही परस्पर
संसर्गका बाधक होता है। मैं तो अप्रतियोगीभूत पटान्तरमे न अभावका
तादात्म्य मानता हूँ और न उसके साथ अभावका विरोध ही मानता हूँ,
जिससे पटान्तरके साथ पटान्तरका अभाव न रह सके। इसके विपरीत
तुम तो तन्तुनिवृत्ति और तन्तुवन्तरका परस्पर तादात्म्य मानते हो,
इसलिये उनका संसर्ग बाधित है। क्योंकि दो भिन्नोंमे ही संसर्ग
होता है।
(शङ्का) वस्तुका अग्रिम कार्य ही उसका विनाश है, क्योंकि
विनाश को कार्यातिरिक्त मानने मे बाधक है।
(उत्तर) यह भी नहीं कह सकते। क्योंकि विनाशको कार्यसे
अतिरिक्त माननेमे कोई बाधक नहीं है।
(शङ्का) अभावको अतिरिक्त माननेवालेके यहाँ घटाभावमे घट
है कि नहीं ? आद्य पक्षमे, जैसे घटाभावमे घट रहता है, वैसे ही
घटस्थलमे घटाभाव भी रहेगा। ऐसी स्थितिमें जिन कपालोंमें घटका
अस्तित्व है, वे भी घटाभाववाले होने लगेंगे। दूसरे पक्षमे अर्थात्
"घटाभावमे घट नहीं हैं" इस पक्षमे अनवस्थादोषका प्रसङ्ग हो
जायगा। अर्थात् घटाभावमे जो दूसरा घटाभाव है, उसमें भी घटके
नहीं रहने से तीसरा घटाभाव रहेगा, और उस तीसरेमें चौथा घटाभाव
रहेगा, चौथेमे पांचवा और पाँचवेंमे छठा, इस प्रकार अभावकल्पनाका