आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः ६७
ख्यातिजनकत्वे शशविषाणादिशब्दात् कूर्मरोमादिविकल्पानामप्यु-
त्पत्तिप्रसङ्गात्, नियामकाभावात् ।
स हि सङ्केतो वा स्यात् ? शब्दस्वाभाव्यं वा ? आद्यस्ता-
वत् सङ्केतविषयाप्रतीतेरेव पराहतः । तत एव१ तत्प्रतीतावितरेतरा-
श्रयत्वम्, पदसङ्केतबलेनैव प्रतीतौ स्वार्थापरित्यागात् । तथा
चानन्विताः पदार्था एवान्विततया परिस्फुरन्तीति विपरीतख्याति-
अर्थात् गलत हेतु और मिथ्यावादीके शब्दसे भी उसी अर्थकी प्रतीति होती
है, जो कहीं सत् है । जिस हेतुका अपने साध्यके साथ और जिस शब्द-
का अपने अर्थके साथ कहीं भी सम्बन्ध न हो और वह असत् अर्थकी
प्रतीति करावे तो शशशृङ्ग आदि शब्दसे कूर्मरोम आदि अर्थका ज्ञान भी
होने लगेगा । क्योंकि ऐसा न होने देनेवाला कोई नियामक नहीं है ।
क्योंकि यह नियमन करने वाला सङ्केत होगा ? अथवा शब्द-
का स्वभाव ? प्रथम पक्षमें 'शशविषाण' इस पदसमूहका सङ्केत
मानो तो असंभव है । क्योंकि सङ्केतका विषय जो अखण्ड शशविषाण
उसकी कहीं प्रतीति ही नहीं है तो उसमें 'शशविषाण' इस पदसमूहका
सङ्केत कैसे हो सकता है ? यदि इसी सङ्केतके बलपे उसकी प्रतीति
मानो तो अन्योन्याश्रय दोष हो जाता है “सङ्केतसे प्रतीति और प्रतीति
होनेपर सङ्केत” ।
यदि कहो कि—शश और विषाण इन प्रत्येक पदोंके सङ्केतबलसे
ही “शशविषाण' इस अखण्ड अर्थकी प्रतीति हो जायगी—तब तो
शशपदका खरहारूप अपना अर्थ और विषाणपदका सींगरुप अपना अर्थ
कहीं सत् ही है न कि असत् । इस प्रकार पृथक् पृथक् लोकमें प्रसिद्ध
खरहा और सींगरुप अर्थ केवल परस्पर मे असम्बद्ध है, और 'शशशृङ्ग'
शब्दसे सम्बद्धरूपमें भासित होते हैं, यह अन्यथाख्याति ही तो हो
रही है न कि असत्ख्याति ।
यदि कहो कि—शश और विषाण पदोंका भी पृथक्-पृथक् अपने-
अपने अर्थोंके साथ भी कोई सम्बन्ध नहीं है, अर्थात् उन पदोंका
१ '०एवेति भ० ठक्कुरसम्मतः पाठः ।