आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 119, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें७०
सङ्केतो गृह्यताम् । न च सङ्केतयितुरेव वचनात् तदवगतिः,
तद्विषयाणां सर्वेषां वचनानामप्रतीतविषयत्वेनागृहीतसमयतया
अप्रतिपादकत्वात् ।
न च शशविषाणमुच्चारयतः कश्चिदभिप्रायो वृत्त इति तद्वि-
षयोऽस्य वाच्य इति सुग्रहः समय इति वाच्यम्, न ह्येवमाकारः
होनेसे शशविषाणशब्दका प्रयोग करनेवाला व्यक्ति उस शब्दका
किस अर्थके साथ सम्बन्ध जानकर प्रयोग करता है, इसका ज्ञान श्रोताको
नहीं हो सकता है । एवं शशशृङ्गशब्दके प्रयोगके बाद किसी
वस्तुका लाना या ले जाना भी नहीं दीख पडता, जिससे उस
वस्तुविशेषको जानकर उसमें शशशृङ्गशब्दका संकेत (सम्बन्ध)
जाना जाय ।
यह भी नहीं कह सकते कि—जैसे, 'पिक' शब्दका अर्थ 'कोकिल'
होता है, संकेतकर्त्ताके इस वचनसे हम पिकशब्दके अर्थको जान
जाते हैं, वैसे ही शशशृङ्ग शब्दका अर्थ भी संकेतकर्त्ताके वचनसे ही
जाना जा सकता है—क्योंकि वहाँ कोकिलशब्दके द्वारा कोयलरूप
वस्तुको पहलेसे ही हम जानते हैं और उसीकी सहायतासे पिकशब्दका
भी कोयलअर्थके साथ सम्बन्ध जाने जाते हैं । किन्तु यहाँपर शश-
शृङ्गशब्दका अर्थ जाननेके लिए संकेतकर्त्ता जितने भी शब्दोंका प्रयोग
करेगा, वे सभी शब्द शशशृङ्गशब्दके समान ही श्रोताके लिए
अपरिचित अर्थवाले ही होंगे । इस प्रकार जब स्वयं उन्हीं शब्दोंका
उस असत् अर्थके साथ सम्बन्ध नहीं जाना गया है, तब उनकी
सहायतासे शशशृङ्गशब्दका अर्थ कैसे जाना जा सकता है ? अर्थात्
जब वह अर्थ ही असत् है तो किसी भी कल्पित शब्दसे उस अर्थकी
उपस्थिति श्रोताके मनमे नहीं हो सकती है । कोयल तो सत् वस्तु है
और वह सबको प्रत्यक्ष है ।
यह कहना भी ठीक नहीं है कि—शशविषाणशब्दका उच्चारण
करनेवाला व्यक्ति अवश्य ही किसी अर्थके अभिप्रायसे उच्चारण करता
है, अत वही अर्थ शशविषाणशब्दका वाच्य है, ऐसा संकेतग्रह
आसानी से हो सकता है—क्योंकि सामान्यरूपसे हुए ऐसे सङ्केतग्रहका