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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 530 में से

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पृष्ठ 114

क्षणभङ्गवादः ६५
तस्मात् प्रमाणमेव सीमा व्यवहारनियमस्य तदतिक्रमे त्वनियम
एवेति ।
न ह्यप्रतीते देवदत्तादौ 'स किं गौरः कृष्णो वेति' वैयात्यं
विना प्रश्नः । तत्रापि यद्येकोऽप्रतीतपरामर्शविषय¹ एवोत्तरं
ददाति न गौर इति, अपरोऽपि किं न दद्यान्न कृष्ण इति ।
न चैवं सति काचिदर्थसिद्धिः, प्रमाणाभावविरोधयोरुभयत्रापि
तुल्यत्वादिति ।
नन्वप्रतीतेर्व्यवहाराभाव इति युक्तं, कूर्मरोमादयस्तु प्रतीयन्त
तथा यह भी कैसे सिद्ध होगा कि वन्ध्यासुतमे अवक्तृत्वादि है, अर्थात्
यह वक्ता आदि नहीं हो सकता ।
इसलिये किसी भी व्यवहारका नियामक प्रमाण ही है । उसके
बिना तो कोई नियम ही नहीं रह जायगा । क्योंकि प्रमाणसे देवदत्त
आदिको जाने बिना “क्या वह गोरा या काला है ?” ऐसा प्रश्न
धृष्टताके बिना नहीं हो सकता है । अर्थात् जिस वस्तुको जानते नहीं
उसके गोरा काला होनेका प्रश्न ही नहीं होता है । साथ ही वैसा प्रश्न
होनेपर भी यदि कोई उसके गोरापन कालापनको बिना जाने ही उत्तर
देता है कि वह गोरा नहीं है तो दूसरा भी यह उत्तर क्यों न दे कि वह
काला नहीं है । ऐसी स्थितिमें काला या गोरा किसीका निर्णय नहीं
हो सकता है । क्योंकि प्रमाणाभाव और विरोध दोनों ही उत्तरोंमे
समान हैं ।
यहाँ प्रमाणका अभाव इसलिये है कि दोनोंमे किसीने प्रमाणके
साथ उत्तर नहीं दिया । और विरोध इसलिए है कि प्रमाणके द्वारा
जिस वस्तुको जाना ही नहीं उसका गोरा न होना या काला न होना
कैसे जान सकता है ? और उत्तर भी कैसे दे सकता है ?
( शङ्का ) यह ठीक है कि अज्ञात विषयके सम्बन्धमे किसी प्रकार
का व्यवहार नहीं होता, किन्तु कछुएके रोम या बन्ध्याका पुत्र आदि तो
१. अविदितपरामर्श विषय इति म० ठक्कुरसम्मत पाठ. ।
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