आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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अवक्तृत्वमपि कथं तत्र ? तस्य वचनेतरकर्त्तृत्वलक्षणत्वादिति ।
सर्वसामर्थ्यविरहे वचनसामर्थ्यविरहो न विरुद्ध इति चेत्, अथ
सर्वसामर्थ्यविरहो बन्ध्यासुतस्य कुतः प्रमाणात् सिद्धः ? आवस्तु-
त्त्वादेवेति चेत्, नन्वेतदपि कुतः सिद्धम् ? सर्वसामर्थ्यविरहादिति
चेत्, सोऽयमितस्ततः केवलैर्वचनैर्निर्धनाधमर्णिक इव साधून्
भ्रामयन् परस्पराश्रयदोषमपि न पश्यति ।
क्रमयौगपद्यविरहादिति चेन्न, तद्विरहसिद्धावपि प्रमाणानुयो-
गस्यानुवृत्तेः । सुतत्वे च परामृश्यमाणे तदविनाभूतसकलवक्तृत्त्वा-
दिधर्मप्रसक्तौ कुतः क्रमयौगपद्यविरहसाधनस्यावकाशः ? कुतस्तरां
चावस्तुत्वसाधनस्य ? कुतस्तमां चावक्तृत्त्वादिसाधनानाम् ?
बताओ, तूने किस प्रमाणसे जाना कि बन्ध्यासुतमें हर प्रकारकी सामर्थ्य
का अभाव है ?
यदि कहो कि—उसके मिथ्या होनेसे—तो यही कैसे जाना कि
बन्ध्यासुत मिथ्या है। यदि कहो कि—उसमें हर प्रकारकी सामर्थ्यका
अभाव है, अर्थात् वह कुछ भी नहीं कर सकता है, इसलिये जानते हैं
कि वह मिथ्या है—तब तो निर्धन सद्दुकके समान तू भी केवल
बातोंसे ही सज्जनों को इधर उधर भरमाते हो और अन्योन्याश्रय
दोषको भी नहीं देखते ।
यह कहना कि—हर प्रकारकी असामर्थ्यका कारण क्रम और यौग-
पद्यका अभाव है। अर्थात् जो किन्हीं कार्यों के करनेमे सामर्थ्यवान् होता
है, वह या तो क्रमश करता है या युगपत् ( एक साथ ) करता है।
बन्ध्यासुत तो न क्रमसे कुछ करता है और न एक साथ । इसीलिए वह
सर्वसामर्थ्यसे रहित है—ठीक नहीं है। क्योंकि क्रम और यौगपद्यके
अभावकी भी सिद्धिके लिए प्रमाणकी अपेक्षा ज्यों की त्यों है। क्योंकि
जब उसे सुत कहते हो तो सुतोंमे रहनेवाले वक्तृत्व आदि सम्पूर्ण धर्म
उसमें भी होने ही लगेंगे । इस स्थितिमें बन्ध्यासुतमे क्रमयौगपद्या-
भावकी सिद्धि कैसे होगी ? और वह मिथ्या भी कैसे सिद्ध होगा ?