आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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रेणानुवर्त्तते। स्वार्थपरित्यागे तु पुनरप्यनियमः, असामयिकार्थ-
प्रत्यायनात्। शब्दस्वाभाव्यात् तु नियमे व्युत्पन्नवदव्युत्पन्न-
स्यापि तथाविधविकल्पोदयप्रसङ्गादिति।
वासनाविशेषादिति चेत्, अथासदुल्लेखिनः प्रत्ययस्य वासनैव
कारणम् ? उत वासनापि ? न तावदाद्यः, शशविषाणादिप्रत्य-
यानां सदातनत्वप्रसङ्गात्। कदाचित् प्रबोधादिति चेत्, न,
प्रबोधोऽपि सहकार्यन्तरं वा ? अतिशयपरम्परापरिपाको वा ?
आद्ये वासनैवेति पक्षानुपपत्तिः। द्वितीयेऽपि यद्यर्थान्तरप्रत्या-
सत्तेस्तदा पूर्ववत्।
खरहा और सींगरुप अर्थ भी असत् ही है इसप्रकार असत्ख्याति
सिद्ध हो जाती है—तब तो फिर भी किस शब्दसे कौन अर्थ समझा
जाय इसका कोई नियम नहीं रह गया। इस स्थितिमे घटशब्दसे पटका
भी बोध होना चाहिये। यह कहना तो ठीक नहीं है कि—शब्दका
स्वभाव ही ऐसा है कि कोई खास शब्द किसी खास अर्थको ही बताता
है—क्योंकि तब विद्वान्के समान मूर्खको भी समान रूपसे शब्दोंसे
अर्थबोध होना चाहिये। कारण शब्दका स्वभाव सबके प्रति समान है।
इस दोषसे बचनेके लिये यदि संस्कारविशेषको कारण मानो,
तो बताओ, असत् अर्थका उल्लेख करनेवाले ज्ञानका कारण केवल
संस्कार ही है ? या संस्कार भी एक कारण है ? इनमें प्रथम पक्ष ठीक
नहीं है, क्योंकि संस्कारके सदा होनेसे शशविषाणादिका ज्ञान भी
सदा होते रहना चाहिये।
यदि कहो कि—संस्कारके कभी कभी उद्बुद्ध होनेसे शशशृङ्ग-
ज्ञान भी कभी कभी होगा—तो ठीक नहीं है। क्योंकि संस्कारका
उद्बोध (जागरण) संस्कारसे भिन्न एक अन्य सहायक है ? या उन्हीं
संस्कारोंकी एक परिपक्व अवस्थामात्र है ? प्रथम पक्षमें वासना
(संस्कार) ही कारण है, यह कथन असङ्गत हो जाता है। द्वितीय
पक्षमें भी संस्कारका वह अवस्था यदि दूसरी वस्तुके संसर्गसे हो तो
"वासना ही कारण है" यह कथन फिर असङ्गत हो जाता है। यदि