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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 530 में से

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पृष्ठ 120

समयग्रहः। गां बधानेत्युक्ते अप्रतीतशब्दार्थस्याप्यभिप्रायमात्र-
प्रतीतौ समयग्रहप्रसङ्गात्। न च विशेषान्तरविनाकृतः कल्प-
नामात्त्रविषयोऽस्य वाच्य इति साम्प्रतम्, घटकूर्मरोमादीनामपि
तदर्थत्वप्रसङ्गात्।
न च सर्वे प्रतिपत्तारः स्वस्ववासनयाऽसदर्थशब्दसंबन्धप्रति-
पत्तिभाज इति साम्प्रतम्, परस्परवार्तानभिज्ञतया अपरार्थत्वप्र-
ङ्गात्। न हि स्वयं कृतं समय^२मग्राहयित्वा परो व्यवहारयितुं
शक्यते। न च व्यवहारोपदेशान्तरेण ग्राहयितुमपि। न च गां
बधानेतिवत् शशविषाणपदार्थे व्यवहारः, न चायमसावश्व इति-
शाब्दबोधमें कोई उपयोग नहीं है। अन्यथा 'गा बधान' ऐसा कहनेपर
जिसे विशेषरूपसे 'गा' और बधान' पदका अर्थ नहीं मालूम है उसे
भी केवल यह जानकर कि ये पद अवश्य ही किसी अर्थके अभिप्रायसे
कहे गये हैं, सङ्केतज्ञान होकर शाब्दबोध हो जाना चाहिये।
यह भी समुचित नहीं है कि—शशविषाण आदि शब्दोंका कोई
विशेष अर्थ नहीं होनेपर भी कल्पनामात्रका विषय जो अलीक अर्थ
वही इस शब्दका वाच्यार्थ है—क्योंकि कोई भी काल्पनिक अर्थ यदि
शशविषाण शब्दका अर्थ माना जाय तो काल्पनिक घटरोम^१ और
कूर्मरोम आदि भी शशविषाणशब्दका अर्थ होने लगेगा।
यह भी ठीक नहीं है कि—बोध करनेवाले सभी व्यक्ति अपनी
अपनी वासनासे ही उपस्थित हुए अलीक अर्थोंमें शशविषाण आदि
शब्दोंका सङ्केत जान लेते हैं—क्योंकि अपनी वासनाके आधारपर
उपस्थित अर्थमे हुआ शब्दका सङ्केतग्रह अपने ही तक रह जायगा,
दूसरे को नहीं हो सकता। इसलिये दूसरे व्यक्तिके प्रति शशशृङ्ग
आदि शब्दोंका व्यवहार असम्भव हो जायगा। कारण, स्वयं कल्पित
किसी अर्थमें किसी शब्दके सङ्केतको बिना दूसरे को बताये उसके
१. यद्वा यन्मते घटस्यापि काल्पनिकत्वं तन्मतमाश्रित्योक्तमिति शक्यमित्रः।
२. स्वयं कृतं सङ्केतं—१ पु० पा०