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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-९ देवता—ब्रह्मगवी

अशिता लोकाञ्छिनत्ति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यमस्माच्चामुष्माच्च.. (११)
यदि ब्राह्मण को हानि पहुंचाई जाए तो ब्राह्मण की गाय इहलोक और परलोक दोनों को
बिगाड़ देती है. (११)
सूक्त-९ देवता—ब्रह्मगवी
तस्या आहननं कृत्या मेनिराशसनं वलग ऊबध्यम्. (१)
ब्राह्मण की गाय को मारना मरणासन्न बन जाता है. इस को हनन करना कृत्या राक्षसी
है. इस का गोबर युक्त आधा पका हुआ चारा शपथ के समान है. (१)
अस्वगता परिहृणुता.. (२)
ब्राह्मण की अपहरण की गई गाय अपने वश में नहीं रहती है. (२)
अग्निः क्रव्याद् भूत्वा ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यं प्रविश्यात्ति. (३)
मारी हुई ब्राह्मण की गाय मांसाहारी पशु बन कर मारने वाले को खाती है. (३)
सर्वास्याङ्ग पर्वा मूलानि वृश्चति. (४)
यदि ब्राह्मण की गाय को कोई मारता है तो यह मारने वाले के शरीर के सभी जोड़ों को
छिन्नभिन्न कर देती है. (४)
छिनत्त्यस्य पितृबन्धु परा भावयति मातृबन्धु. (५)
यह ब्राह्मण की गाय चुराने वाले के पिता के बांधवों का छेदन करती है और माता के
बांधवों को अपमानित करती है. (५)
विवाहां ज्ञातीन्त्सर्वानपि क्षापयति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यस्य
क्षत्रियेणापुनर्दीयमाना. (६)
क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मण की गाय न लौटाई जाने पर उस के सभी बंधुओं को नष्ट कर देती
है. (६)
अवास्तुमेनमस्वगमप्रजसं करोत्यपरावरणो भवति क्षीयते. (७)
ब्राह्मण की गाय को अगर क्षत्रिय न लौटाए तो वह क्षत्रिय को गृहहीन तथा संतानहीन
कर देती है. ब्राह्मण की गाय चुराने वाला क्षत्रिय अपरा रोग से ग्रसित हो कर नष्ट हो जाता है.
(७)
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य एवं विदुषो ब्राह्मणस्य क्षत्रियो गामादत्ते.. (८)
ऊपर बताई गई दशा उस क्षत्रिय की होती है, जो विद्वान् की गौ का अपहरण करता है.
(८)
सूक्त-१० देवता—ब्रह्मगवी
क्षिप्रं वै तस्याहनने गृध्राः कुर्वत ऐलबम्.. (१)
जो क्षत्रिय ब्राह्मण की गाय को ले जाता है, गिद्ध उस के नेत्र निकालते हैं. (१)
क्षिप्रं वै तस्यादहनं परि नृत्यन्ति केशिनीराघ्नानाः.
पाणिनोरसि कुर्वाणाः पापमैलबम्.. (२)
जो क्षत्रिय ब्राह्मण की गाय ले जाता है, उस की चिता भस्म के समीप केशों वाली
स्त्रियां अपनी छाती कूटती हैं और आंसू बहाती हैं. (२)
क्षिप्रं वै तस्य वास्तुषु वृकाः कुर्वत ऐलबम्.. (३)
जो क्षत्रिय ब्राह्मण की गाय ले जाता है उस के घरों में शृगाल शीघ्र ही अपने नेत्र घुमाते
हैं. (३)
क्षिप्रं वै तस्य पृच्छन्ति यत् तदासी ३ दिदं नु ता ३ दिति.. (४)
जो क्षत्रिय ब्राह्मण की गाय ले जाता है, उस के विषय में यह कहा जाने लगता है कि
क्या यह उस का घर है. (४)
छिन्ध्या च्छिन्धि प्र च्छिन्ध्यपि क्षापय क्षापय.. (५)
हे ब्राह्मण की गाय! तू इस चुराने वाले का छेदन कर और उसे नष्ट कर डाल. (५)
आददानमाङ्गिरसि ब्रह्मज्यमुप दासय.. (६)
हे आंगिरस! तू अपहरणकर्ता क्षत्रिय का नाश कर दे. (६)
वैश्वदेवी ह्यु १ च्यसे कृत्या कूल्बजमावृता.. (७)
हे ब्राह्मण की गौ! तू मांस रूपी वज्र से अपने अपहरणकर्ता को नष्ट करने वाली है. (७)
ओषन्ती समोषन्ती ब्रह्मणो वज्रः.. (८)
हे ब्राह्मण की गाय! तू वज्र से ढकी हुई विश्व देवी कृत्या कही जाती है. (८)
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क्षुरपविर्मृत्युर्भूत्वा वि धाव त्वम्.. (९)
हे ब्राह्मण की गौ! तू मृत्यु रूप होती हुई दौड़. (९)
आ दस्ते जिनतां वर्च इष्टं पूर्तं चाशिषः.. (१०)
हे ब्राह्मण की गाय! तू अपहरण करने वाले के तेज, कामना, पूर्त और आशीर्वादात्मक
शब्दों का हरण करती है. (१०)
आदाय जीतं जीताय लोके ३ ऽ मुष्मिन् प्र यच्छसि.. (११)
हे ब्राह्मण की गाय! तू ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले को न्यून आयु वाला करने के लिए
पकड़ कर परलोकगामी बनाती है. (११)
अघ्न्ये पदवीर्भव ब्राह्मणस्याभिशस्त्या.. (१२)
हे अघ्न्या! ब्राह्मण के शाप के कारण तू अपहरण कर्ता के पैरों की बेड़ी बन जाती है.
(१२)
मेनिः शरव्या भवाघादघविषा भव.. (१३)
हे ब्राह्मण की गाय! तू अस्त्ररूप बाणों के समूह को प्राप्त होती हुई उस के पाप के
कारण अधिष्ठाता बन जा. (१३)
अघ्न्ये प्र शिरो जहि ब्रह्मज्यस्य कृतागसो देवपीयोरराधसः.. (१४)
हे अघ्न्या! तू उस देव हिंसक अपराधी के कार्य को विफल करने के लिए उस के शीश
को काट डाल. (१४)
त्वया प्रमूर्णं मृदितमग्निर्दहतु दुश्चितम्.. (१५)
हे ब्राह्मण की गौ! तेरे द्वारा कुचले और मसले हुए उस पाप पूर्ण चित्त वाले को अग्नि
भस्म कर डालें. (१५)
सूक्त-११ देवता—ब्रह्मगवी
वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्रदह सं दह.. (१)
हे ब्राह्मण की गाय! तू अपने अपहरण करने वाले को बारबार काट और जला दे. (१)
ब्रह्मज्यं देव्यघ्न्य आ मूलादनुसंदह.. (२)
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हे अघ्न्या! तू अपहरण करने वाले को समूल नष्ट कर दे. (२)
यथायाद् यमसादनात् पापलोकान् परावतः.. (३)
हे अघ्न्या! तेरा अपहरण करने वाला यम के लोकों और पाप के घरों को प्राप्त हो. (३)
एवा त्वं देव्यघ्न्ये ब्रह्मज्यस्य कृतागसो देवपीयोरराधसः.. (४)
हे अघ्न्या देवी! तू अपराध करने वाले अपहरणकर्ता, देव हिंसक के कंधों और सिर को
काट दे. (४)
वज्रेण शतपर्वणा तीक्ष्णेन क्षुरभृष्टिना.. (५)
हे अघ्न्या! तू सौ पैरों वाले एवं तेज धार वाले वज्र से अपने अपहरणकर्ता का वध कर.
(५)
प्र स्कन्धान् प्र शिरो जहि.. (६)
हे अघ्न्या! तू अपने अपहरणकर्ता को नष्ट कर दे. (६)
लोमान्यस्य सं छिन्धि त्वचमस्य वि वेष्टय.. (७)
हे अघ्न्या! तू अपने अपहरणकर्ता के लोमों को नष्ट कर उस का चमड़ा उधेड़ दे. (७)
मांसान्यस्य शातय स्नावान्यस्य सं वृह.. (८)
हे अघ्न्या! तू अपने अपहरणकर्ता के मांस को काट कर उस की नसों को सुखा दे. (८)
अस्थीन्यस्य पीडय मज्जानमस्य निर्जहि.. (९)
हे अघ्न्या! तू इस अपहरणकर्ता की हड्डियों में दाह और मज्जा में क्षय भर दे. (९)
सर्वास्याङ्गा पर्वाणि वि श्रथय.. (१०)
हे अघ्न्या! इस अपहरणकर्ता के अवयवों और जोड़ों को ढीला कर दे. (१०)
अग्निरेनं क्रव्यात् पृथिव्या नुदतामुदोषतु वायुरन्तरिक्षान्महतो वरिम्र्णः..
(११)
इस अपहरण करने वाले को वायु अंतरिक्ष और पृथ्वी से खदेड़ दे तथा क्रव्याद अग्नि
इसे भस्म कर दे. (११)
सूर्य एनं दिवः प्र णुदतां न्योषतु.. (१२)
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सूर्य भी इस अपहरणकर्ता को स्वर्ग से नीचे ढकेल दे तथा भस्म कर डाले. (१२)