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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-८ देवता—अदिति

यस्या उपस्थ उर्व १ न्तरिक्षं सा नः शर्म त्रिवरूथं नि यच्छात्.. (२)
हम अन्न की उत्पत्ति के लिए, अन्न का निर्माण करने वाली विशाल एवं अखंडनीय
अदिति की स्तुति करते हैं. जिस अदिति की गोद में विस्तृत आकाश है, वही अदिति हमें तीन
मंजिला और तीन कक्षों वाला घर प्रदान करे. (२)
सूक्त-८ देवता—अदिति
दितेः पुत्राणामदितेरकारिषम् अमव देवानां बृहतामनर्मणाम्.
तेषां हि धाम गभिषक् समुद्रियं नैनान् नमसा परो अस्ति कश्चन.. (१)
मैं दिति के पुत्रों अर्थात् दैत्यों का स्थान छीन कर अदिति के पुत्रों अर्थात् देवों को देता
हूं. वे देव गुणों से महान एवं शत्रुओं द्वारा पराजित न होने वाले हैं. उन का सागर अथवा
आकाश में स्थित निवास स्थान दूसरों के लिए दुर्जेय और दुर्गम है. इन देवों से महान कोई भी
नहीं है. (१)
सूक्त-९ देवता—बृहस्पति
भद्रादधि श्रेयः प्रेहि बृहस्पतिः पुरएता ते अस्तु.
अथेममस्या वर आ पृथिव्या आरेषत्रुं कृणुहि सर्ववीरम्.. (१)
हे वस्त्र, धन आदि का लाभ चाहने वाले पुरुष! तू उत्तरोतर कल्याणकारी संपत्ति प्राप्त
कर. लाभ के हेतु जाते हुए तेरे आगेआगे बृहस्पति चलें. हे बृहस्पति! तुम पृथ्वी के उस उत्तम
स्थान पर इस पुरुष को स्थापित करो, जहां धन आदि लाभ प्राप्त हों. इस के सभी पुत्र, पौत्र
आदि वीर हों एवं इस के शत्रु इस से दूर रहें. (१)
सूक्त-१० देवता—पूषा
प्रपथे पथामजनिष्ट पूषा प्रपथे दिवः प्रपथे पृथिव्याः.
उभे अभि प्रियतमे सधस्ते आ च परा च चरति प्रजानन्.. (१)
मार्ग रक्षक सूर्य देव, मार्गों के आरंभ में रक्षा करने के लिए उपस्थित होते हैं. सूर्य देव
पृथ्वी एवं आकाश के प्रवेश द्वार में उपस्थित होते हैं. अत्यधिक प्रेम करने वाले एवं परस्पर
एक साथ स्थित धरती और आकाश दोनों को लक्षित कर के यजमानों द्वारा किए गए कर्म
और उस का फल जानते हुए सूर्य आकाश से पृथ्वी पर आते हैं और पृथ्वी से आकाश पर
जाते हैं. (१)
पूषेमा आशा अनु वेद सर्वाः सो अस्माँ अभयतमेन नेषत्.
स्वस्तिदा आघृणिः सर्ववीरो ऽ प्रयुच्छन् पुर एतु प्रजानन्.. (२)
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सब के पोषक सूर्य देव सभी दिशाओं को जानते हैं. वे हमें भयरहित मार्गों से ले चलें.
कल्याण के दाता, दीप्तिपूर्ण एवं पुत्र, पौत्र आदि वीरों से युक्त तथा प्रमाद न करते हुए और
हमें पूर्ण रूप से जानते हुए आगेआगे चलें. (२)
पूषन् तव व्रते वयं न रिष्येम कदा चन. स्तोतारस्त इह स्मसि.. (३)
हे पूषा! अर्थात् सूर्य देव! तुम्हारे यज्ञरूप कर्म में संलग्न हम कभी भी नष्ट न हों. इस
कर्म में हम सदा तुम्हारे स्तुतिकर्ता बनें. (३)
परि पूषा परस्ताद्धस्तं दधातु दक्षिणम्.
पुनर्नो नष्टमाजतु सं नष्टेन गमेमहि.. (४)
पोषक सूर्य देव अधिक दूर देश से भी धन देने के लिए अपना दाहिना हाथ फैलाएं.
हमारा नष्ट हुआ धन पुनः हमारे पास आए. हम अपने नष्ट हुए धन से पुनः मिल जाएं. (४)
सूक्त-११ देवता—सरस्वती
यस्ते स्तनः शशयर्यो मयोभूर्यः सुम्नयुः सुहवो यः सुदत्रः.
येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे कः.. (१)
हे वाणी की देवी सरस्वती! तेरा जो स्तन शिशु का पोषण करता है, सुख प्रदाता है,
दूसरों को सुख देता है, जो सब के द्वारा आह्वान किया जाता है, जो कल्याण के साधन देता
है और जिस के द्वारा समस्त धनों का पोषण होता है, अपने इस प्रकार के स्तन को इस
जन्मगृहीत करने वाले बालक के पीने योग्य बनाओ. (१)
सूक्त-१२ देवता—सरस्वती
यस्ते पृथु स्तनयित्नुर्य ऋष्वो दैवः केतुर्विश्वमाभूषतीदम्.
मा नो वधीर्विद्युता देव सस्यं मोत वधी रश्मिभिः सूर्यस्य.. (१)
हे देवपर्जन्य! तुम्हारा जो विस्तृत और महान गर्जन करता हुआ वज्र है, जो बाधक, देव
निर्मित एवं अनर्थ ज्ञापक वज्र है, वह इस सारे विश्व को व्याप्त करता है. हे पर्जन्य देव! इस
प्रकार के वज्र से हमारी फसलों का विनाश मत करो, इस के अतिरिक्त सूर्य की किरणों से
हमारी फसलों का विनाश मत होने दो. (१)
सूक्त-१३ देवता—सभा, समिति आदि
सभा च मा समितिश्चावतां प्रजापतेर्दुहितरौ संविदाने.
येना संगच्छा उप मा स शिक्षाच्चारु वदानि पितरः संगतेषु.. (१)
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विद्वानों का समाज एवं संग्राम करने वाले योद्धा जनों का समूह मेरी रक्षा करे. सारे
संसार की सृष्टि करने वाले प्रजापति की वे दोनों पुत्रियां मेरी रक्षा करें. जो मेरी रक्षा के विषय
में एकमत हैं, उन से मैं संगत होऊं तथा विद्वान् मेरे समीप आ कर मुझे शिक्षा दें. हे
सभासदजनो! जो मेरी कही बात का ‘साधुसाधु’ कह कर समर्थन करें, उन के साथ मिल कर
मैं वादविवादों में न्याय युक्त उत्तर दूं. (१)
विद्म ते सभे नाम नरिष्टा नाम वा असि.
ये ते के च सभासदस्ते मे सन्तु सवाचसः.. (२)
हे सभा! मैं तेरे नामों को जानता हूं. तेरा नाम नरिष्टा अर्थात् दूसरों के द्वारा अभिभूत न
होने वाली है. तुझ से संबंधित जो सभासद हैं, वे सब मेरे समान वचन वाले अर्थात् मेरा
अनुमोदन करने वाले हों. (२)
एषामहं समासीनानां वर्चो विज्ञानमा ददे.
अस्याः सर्वस्याः संसदो मामिन्द्र भगिनं कृणु.. (३)
सभा में सामने बैठे हुए इन बोलने वालों के तेज और विज्ञान को मैं स्वीकार करता हूं. हे
इंद्र! मुझे इस समुदाय में स्थित सभा का विजयी बनाओ. (३)
यद् वो मनः परागतं यद् बद्धमिह वेह वा.
तद् व आ वर्तयामसि मयि वो रमतां मनः.. (४)
हे सभासदो! तुम्हारा जो मन हम से हट कर दूर चला गया है तथा जो मन इस विषय से
संबंधित है, मैं तुम्हारे उस मन को अपने अनुकूल करता हूं. तुम्हारा मेरी ओर आया हुआ मन
मेरे अनुकूल चिंतन करे. (४)
सूक्त-१४ देवता—सूर्य
यथा सूर्यो नक्षत्राणामुद्यंस्तेजांस्याददे.
एवा स्त्रीणां च पुंसां च द्विषतां वर्च आ ददे.. (१)
उदय होता हुआ सूर्य जिस प्रकार तारों का प्रकाश छीन लेता है, उसी प्रकार मैं द्वेष
करने वाले स्त्रीपुरुषों के तेज का अपहरण करता हूं. (१)
यावन्तो मा सपत्नानामायन्तं प्रतिपश्यथ.
उद्यन्त्सूर्य इव सुप्तानां द्विषतां वर्च आ ददे.. (२)
शत्रुओं के मध्य में जिन शत्रुओं को मैं युद्ध के लिए आता हुआ देख रहा हूं, उन के तेज
का अपहरण मैं उसी प्रकार करता हूं, जिस प्रकार सूर्य उदय के समय सोने वाले पुरुषों का
तेज छीन लेते हैं. (२)
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