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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-८ देवता—अग्नि

तानि कल्पद् ब्रह्मचारी सलिलस्य पृष्ठे तपो ऽ तिष्ठत् तप्यमानः समुद्रे.
स स्नातो बभ्रुः पिङ्गलः पृथिव्यां बहु रोचते.. (२६)
ब्रह्मचारी उन अन्न आदि को उत्पन्न करता हुआ, जल के ऊपर तपस्या करता हुआ
सागर पर वर्तमान रहता है. स्नान से पवित्र हुआ एवं कबरे रंग के साथ पीले रंग का होता
हुआ पृथ्वी पर अधिक दीप्त होता है. अर्थात् अधिक चमकता है (२६)
सूक्त-८ देवता—अग्नि
अग्निं ब्रूमो वनस्पतीनोषधीरुत वीरुधः.
इन्द्रं बृहस्पतिं सूर्यं ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१)
हम अग्नि की, वनस्पतियों की, जड़ीबूटियों और फसलों की, वृक्षों की, इंद्र की,
बृहस्पति की तथा सूर्य की स्तुति करते हैं. वे हमें सभी पापों से मुक्त करें. (१)
ब्रूमो राजानं वरुणं मित्रं विष्णुमथो भगम्.
अंशं विवस्वन्तं ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (२)
हम तेजस्वी वरुण की, मित्र की, विष्णु की, भग की, अंश और विवस्वान् अर्थात् सूर्य
की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (२)
ब्रूमो देवं सवितारं धातारमुत पूषणम्.
त्वष्टारमग्रियं ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (३)
हम दानादि गुणों से युक्त सविता, धाता, पूषा, त्वष्टा और अग्नि की स्तुति करते हैं. वे
हमें पाप से मुक्त करें. (३)
गन्धर्वाप्सरसो ब्रूमो अश्विना ब्रह्मणस्पतिम्.
अर्यमा नाम यो देवस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (४)
हम प्रथम गिने जाने वाले गंधर्वों की, अप्सराओं की, अश्विनीकुमारों की, त्वष्टा की
स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (४)
अहोरात्रे इदं ब्रूमः सूर्याचन्द्रमसावुभा.
विश्वानदित्यान् ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (५)
हम दिनरात तथा सूर्य चंद्रमा दोनों की स्तुति करते हैं. हम सभी आदित्यों की स्तुति
करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (५)
वातं ब्रूमः पर्जन्यमन्तरिक्षमथो दिशः.

आशाश्च सर्वा ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (६)
हम वायु की, मेघ की, आकाश की तथा दिशाओं की स्तुति करते हैं. हम सभी
विदिशाओं अर्थात् दिशाओं के कोनों की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (६)
मुञ्चन्तु मा शपथ्यादहोरात्रे अथो उषाः.
सोमो मा देवो मुञ्चतु यमाहुश्चन्द्रमा इति.. (७)
दिन, रात और उषाएं शपथ से उत्पन्न पाप से हमारी रक्षा करें. वे सोम देव मुझे पाप से
मुक्त करें, जिन्हें लोग चंद्रमा कहते हैं. (७)
पार्थिवा दिव्याः पशव आरण्या उत ये मृगाः.
शकुन्तान् पक्षिणो ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (८)
हम पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों, देवों, ग्रामीण पशुओं और सिंह आदि जंगली पशुओं
की स्तुति करते हैं. हम शकुन बने हुए पक्षियों की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें.
(८)
भवाशर्वाविदं ब्रूमो रुद्रं पशुपतिश्च यः.
इषूर्या एषां संविद्म ता नः सन्तु सदा शिवाः.. (९)
हम उन भव, शर्व, रुद्र और पशुपति की स्तुति करते हैं. हम इन देवों के बाणों को
जानते हैं. वे सदा हमारे लिए कल्याणकारी हों. (९)
दिवं ब्रूमो नक्षत्राणि भूमिं यक्षाणि पर्वतान्.
समुद्रा नद्यो वेशन्तास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१०)
हम स्वर्ग की, नक्षत्रों अर्थात् तारों की, भूमि की, यक्षों और पर्वतों की स्तुति करते हैं. जो
सागर, नदियां और सरोवर हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (१०)
सप्तर्षीन् वा इदं ब्रूमो ऽ पो देवीः प्रजापतिम्.
पितॄन् यमश्रेष्ठान् ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (११)
हम उन सप्तर्षियों की, जल देवियों की और प्रजापति की स्तुति करते हैं. हम ऐसे
पितरों की स्तुति करते हैं, जिन में यमराज श्रेष्ठ हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (११)
ये देवा दिविषदो अन्तरिक्षसदश्च ये.
पृथिव्यां शक्रा ये श्रितास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१२)
जो देव स्वर्ग में निवास करते हैं और अंतरिक्ष अर्थात् धरती और आकाश के मध्य
निवास करते हैं, जो देव पृथ्वी पर आश्रित हैं, वे हमें पाप से मुक्त करें. (१२)
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आदित्या रुद्रा वसवो दिवि देवा अथर्वाणः.
अङ्गिरसो मनीषिणस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१३)
आदित्य, रुद्र और वसु देव स्वर्ग में निवास करते हैं. जो देव पृथ्वी पर शक्तिशाली हैं, वे
हमें पाप से मुक्त करें. वेद मंत्रों के दृष्टा अंगिरा गोत्रीय ऋषि तथा मनीषी पाप से हमारी रक्षा
करें. (१३)
यज्ञं ब्रूमो यजमानमृचः सामानि भेषजा.
यजूंषि होत्रा ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१४)
हम यज्ञ की, यजमान की, ऋचाओं की, सामवेद के मंत्रों की, यजुर्वेद के मंत्रों तथा इन
वेदों में बताई गई ओषधियों एवं होताओं की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (१४)
पञ्च राज्यानि वीरुधां सोमश्रेष्ठानि ब्रूमः.
दर्भो भङ्गो यवः सहस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१५)
फल पकने पर उन्नत होने वाली जड़ीबूटियों और फसलों में जो पांच श्रेष्ठ हैं और इन के
राजा हैं, हम उन की स्तुति करते हैं. दर्भ भाग, जौ और सह नाम की विशेष ओषधि की स्तुति
करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (१५)
अरायान् ब्रूमो रक्षांसि सर्पान् पुण्यजनान् पितॄन्.
मृत्यूनेकशतं ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१६)
हम दान के प्रतिबंधक हिंसकों, राक्षसों, सर्पों, यातुधानों और पितरों की स्तुति करते हैं.
मैं एक से एक मृत्युओं की स्तुति करता हूं. वे मुझे पाप से मुक्त करें. (१६)
ऋतून्र् ब्रूम ऋतुपतीनार्तवानुत हायनान्.
समाः संवत्सरान् मासांस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१७)
हम ऋतुओं की, ऋतुओं के स्वामियों की, ऋतुओं से संबंधित पदार्थों की, अर्थात् चंद्र
वर्षों की, सूर्य वर्षों की, संवत्सरों की तथा मासों की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें.
(१७)
एत देवा दक्षिणतः पश्चात् प्राञ्च उदेत.
पुरस्तादुत्तराच्चक्रा विश्वे देवाः समेत्य ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१८)
हे दक्षिण दिशा में स्थित देवो! तुम आओ. चारों दिशाओं में स्थित सभी देव यहां यज्ञ में
आ कर हमें पाप से मुक्त करें. (१८)
विश्वान् देवानिदं ब्रूमः सत्यसंधानृतावधः.

विश्वाभिः पत्नीभिः सह ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१९)
हम सच्ची प्रतिज्ञा वाले, सत्य अथवा यज्ञ की वृद्धि करने वाले सभी देवों की स्तुति
करते हैं. वे अपनी पत्नियों के साथ यहां हमारे यज्ञ में आएं और हमें पाप से मुक्त करें. (१९)
सर्वान् देवानिदं ब्रूमः सत्यसंधानृतावृधः.
सर्वाभिः पत्नीभिः सह ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (२०)
हम कहे गए और न कहे गए सच्ची प्रतिज्ञा वाले और यज्ञ अथवा सत्य की रक्षा करने
वाले सभी देवों की स्तुति करते हैं. वे सभी अपनी पत्नियों के साथ आएं और हमें पाप से
मुक्त करें. (२०)
भूतं ब्रूमो भूतपतिं भूतानामुत यो वशी.
भूतानि सर्वा संगत्य ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (२१)
हम भूत की, भूतों के स्वामी की तथा भूतों को वश में करने वाले की स्तुति करते हैं.
सभी भूत मिल कर हमें पाप से मुक्त करें. (२१)
या देवीः पञ्च प्रदिशो ये देवा द्वादशर्तवः.
संवत्सरस्य ये दंष्ट्रास्ते नः सन्तु सदा शिवाः.. (२२)
पांच प्रधान दिशाओं की जो देवियां हैं तथा बारह मासों के स्वामी जो देव हैं और स्वतंत्र
रूप प्रजापति की जो दाढ़ें अर्थात् पक्ष, सप्ताह आदि हैं, वे हमें पाप से मुक्त करें. (२२)
यन्मातली रथक्रीतममृतं वेद भेषजम्.
तदिन्द्रो अप्सु प्रावेशयत् तदापो दत्त भेषजम्.. (२३)
इंद्र का सारथी मातलि रथ के बदले में खरीदी हुई मृत्यु का नाश करने वाली ओषधि को
जानता है. इंद्र ने उस ओषधि को जल में डुबा दिया है. जल हमें वह ओषधि प्रदान करे.
(२३)
सूक्त-९ देवता—हवन से बचा भात
उच्छिष्टे नाम रूपं चोच्छिष्टे लोक आहितः.
उच्छिष्ट इन्द्रश्चाग्निश्च विश्वमन्तः समाहितम्.. (१)
उच्छिष्ट अर्थात् होम के बाद बचे हुए भात में नाम और रूप वाला विश्व स्थित है. इस
उच्छिष्ट में पृथ्वी आदि सभी लोक स्थित हैं. उच्छिष्ट ही इंद्र और अग्नि हैं. होम के बाद शेष
बचे हुए इस भात में ईश्वर ने सारा जगत् स्थापित किया है. (१)
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उच्छिष्टे द्यावापृथिवी विश्वं भूतं समाहितम्.
आपः समुद्र उच्छिष्टे चन्द्रमा वात आहितः.. (२)
उच्छिष्ट अर्थात् होम करने के बाद बचे हुए भात में स्वर्ग, पृथ्वी तथा उन में स्थित प्राणी
आश्रित हैं. इस उच्छिष्ट में जल, सागर, चंद्रमा और वायु स्थित हैं. (२)
सन्नुच्छिष्टे असंश्चोभौ मृत्युर्वाजः प्रजापतिः.
लौक्या उच्छिष्ट आयत्ता वश्र द्रश्चापि श्रीमंयि.. (३)
उच्छिष्ट अर्थात् होम करने के बाद शेष बचे भात में सत् और असत् दोनों के अतिरिक्त
मृत्यु, मृत्यु का बल, प्रजापति तथा प्रजाएं स्थापित हैं. वरुण और सोम भी इस में स्थित हैं.
उन की कृपा से मुझ में भी श्री स्थित हो. (३)
दृढो दृंहस्थिरो न्यो ब्रह्म विश्वसृजो दश.
नाभिमिव सर्वतश्चक्रमुच्छिष्टे देवताः श्रिताः.. (४)
दृढ़ अंग वाला देव, दृढ़ होने के कारण स्थिर किया हुआ लोम, सभी प्राणी, जगत् का
कारण ब्रह्म, दस प्राण एवं सभी देवता हुतशिष्ट अर्थात् हवन करने के बाद शेष बचे भात में
उसी प्रकार आश्रित हैं, जिस प्रकार रथ का पहिया धुरी पर आश्रित रहता है. (४)
ऋक् साम यजुरुच्छिष्ट उद्गीथः प्रस्तुतं स्तुतम्.
हिङ्कार उच्छिष्टे स्वरः साम्नो मेडिश्च तन्मयि.. (५)
ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद के मंत्र, इन का गाया हुआ भाग एवं प्रस्तुत स्तुतियां
उच्छिष्ट अर्थात् होम के बाद बचे हुए भात में आश्रित हैं. सभी उद्गाताओं के द्वारा प्रयोग
किया जाता हुआ ‘हि’ शब्द, सामवेद के स्वर, सामवेद संबंधित वाणी—ये सब यज्ञ शेष के
लिए मुझ में स्थित हैं. (५)
ऐन्द्राग्नं पावमानं महानाम्नीर्महाव्रतम्.
उच्छिष्टे यज्ञस्याङ्गान्यन्तर्गर्भइव मातरि.. (६)
इंद्र और अग्नि की स्तुति से संबंधित सामवेद के मंत्र, तीनों में सोम देवता से संबंधित
सामवेद के मंत्र, महानाम्नी और महाव्रत नाम के स्तोत्र तथा यज्ञ के अंग होम के बाद बचे
भात में उसी प्रकार स्थित हैं, जिस प्रकार गर्भ माता के पेट में स्थित रहता है. (६)
राजसूयं वाजपेयमग्निष्टोमस्तदध्वरः.
अर्काश्वमेधावुच्छिष्टे जीवबर्हिर्मदिन्तमः.. (७)
राजसूय, वाजपेय और अग्निष्टोम नाम के यज्ञ हिंसा रहित हैं. अर्क, अश्वमेध, जीवबर्हि
तथा मादक सोमयाग—ये सभी उच्छिष्ट अर्थात् होम से शेष बचे भात में आश्रित हैं. (७)
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अग्न्याधेयमथो दीक्षा कामप्रश्छन्दसा सह.
उत्सन्ना यज्ञा: सत्राण्युच्छिष्टे ऽ धि समाहिता:.. (८)
अग्नि के आधान के पश्चात सोम याग की दीक्षा, यजमान की इच्छाएं पूर्ण करने वाले
मंत्रों के साथ लुप्तप्राय यज्ञ एवं सोमयाग उच्छिष्ट रूपी ब्रह्म में आश्रित हैं. (८)
अग्निहोत्रं च श्रद्धा च वषट्कारो व्रतं तप:.
दक्षिणेष्टं पूर्तं चोच्छिष्टे ऽ धि समाहिता:.. (९)
अग्नि होम, श्रद्धा, वषट शब्द, व्रत, तप, दक्षिणा, वेदों में बताए गए याग, होमादि कर्म
तथा स्मृतियों और पुराणों में बताए गए बावड़ी, कुआं आदि बनवाने के कर्म उच्छिष्ट अर्थात्
यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (९)
एकरात्रो द्विरात्र: सद्य: क्री: प्रक्रीरुक्थ्य:.
ओतं निहितमुच्छिष्टे यज्ञस्याणूनि विद्यया.. (१०)
एक रात्रि वाला सोमयाग, दो रात्रियों तक चलने वाला सोमयाग, एक दिन में होने वाले
क्री और प्रक्री नाम के सोमयाग, उक्थों वाला सोमयाग, यज्ञ से संबंधित सूक्ष्म रूप, भावना
के साथ यज्ञ शेष अर्थात् यज्ञ के पश्चात बचे हुए भातरूपी ब्रह्म में स्थित है. (१०)
चतूरात्र: पञ्चरात्र: षड्रात्रश्चोभय: सह.
षोडशी सप्तरात्रश्चोच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे ये यज्ञा अमृते हिता:.. (११)
चार रात्रियों वाला, पांच रात्रियों वाला, छह रात्रियों वाला तथा इन से दूनी रात्रियों वाले
सोमयाग, सोलह रात्रियों वाले, सात रात्रियों वाले सोमयाग तथा अमृत का फल देने वाले जो
यज्ञ हैं, वे सब उच्छिष्ट अर्थात् यज्ञशेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (११)
प्रतीहारो निधनं विश्वजिच्चाभिजित्च य:.
साह्नातिरात्रावुच्छिष्टे द्वादशाहो ऽ पि तन्मयि.. (१२)
उद्गीथ के बाद गाए जाने वाले सामवेद के मंत्र, प्रतीहार तथा सोमयागों की समाप्ति के
मंत्र, विश्वजित और अभिजित नाम के यज्ञ, एक दिन में होने वाला सोमयाग साह्न, अतिरात्र
नाम के जो सोमयाग यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं, वे सब मुझ में हों अर्थात् मेरे द्वारा किए
जाएं. (१२)
सूनृता संनति: क्षेम: स्वधोर्जामृतं सह:.
उच्छिष्टे सर्वे प्रत्यञ्च: कामा: कामेन तात्पु:.. (१३)
सूनृता, विनम्र भाव, क्षेम, स्वधा, अमृत, बल तथा सामने उपस्थित सभी कामनाएं
यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. ये सभी कामना करने वाले यजमान को तृप्त करते हैं. (१३)
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नव भूमीः समुद्रा उच्छिष्टे ऽ धि श्रिता दिवः.
आ सूर्यो भात्युच्छिष्टे ऽ होरात्रे अपि तन्मयि.. (१४)
नौ खंडों वाली पृथ्वी, सात सागर तथा स्वर्ग यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित है. सूर्य और
रात दिन भी उच्छिष्ट अर्थात् यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. ये सभी मेरे द्वारा हों. (१४)
उपहव्यं विषूवन्तं ये च यज्ञा गुहा हिताः.
बिभर्ति भर्ता विश्वस्योच्छिष्टो जनितुः पिता.. (१५)
उपहव्य, विषूवान नाम के सोमयाग तथा जो सोमयाग ज्ञात नहीं है, विश्व का
भरणपोषण करने वाला तथा सवनयज्ञ का अनुष्ठान करने वाले का पालनकर्ता यज्ञशेष रूपी
ब्रह्म है. (१५)
पिता जनितुरुच्छिष्टो ऽ सोः पौत्रः पितामहः.
स क्षियति विश्वस्येशानो वृषा भूम्यामत्तिघ्न्यः.. (१६)
यज्ञशेष रूपी ब्रह्म अपने को उत्पन्न करने वाले का पिता है. यह भात प्राण वायु का पौत्र
और पितामह है. विश्व का स्वामी और कामनाएं पूर्ण करने वाला वह सब को अतिक्रमण कर
के भूमि पर निवास करता है. (१६)
ऋतं सत्यं तपो राष्ट्रं श्रमो धर्मश्च कर्म च.
भूतं भविष्यदुच्छिष्टे वीर्यं लक्ष्मीर्बलं बले.. (१७)
ऋत, सत्य, तप, राष्ट्र, श्रम, धर्म, कर्म, भूतकाल, भविष्यकाल, वीर्य, लक्ष्मी और बल
यज्ञशेष रूपी बल में आश्रित है. (१७)
समृद्धिदोज आकूतिः क्षत्रं राष्ट्रं षडुर्व्यः.
संवत्सरो ऽ ध्युच्छिष्ट इडा प्रैषा ग्रहा हविः.. (१८)
समृद्धि, ओज, आकूति अर्थात् मन चाहे फल संबंधी संकल्प, क्षत्रिय का तेज, राष्ट्र, छह
पृथिवियां, संवत्सर, इडा नाम की देवी, यज्ञ कर्मों में ऋत्विजों के प्रेरक मंत्र, गृह और हवि ये
सभी यज्ञ शेषरूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (१८)
चतुर्होतार आप्रियश्चातुर्मास्यानि नीविदः.
उच्छिष्टे यज्ञा होत्राः पशुबन्धास्तदिष्टयः.. (१९)
चतुर्होत्र नाम के मंत्र, पशुयाग संबंधी मंत्र, चार मासों में किए जाने वाले चार पर्व, स्तुति
संबंधी देव के उत्कर्ष को बताने वाले मंत्र, नीविद, यज्ञ, होता, इष्टियां—ये सब यज्ञशेष रूपी
ब्रह्म में स्थित हैं. (१९)
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अर्धमासाश्च मासाश्चार्तवा ऋतुभिः सह.
उच्छिष्टे घोषिणीरापः स्तनयित्नुः श्रुतिर्मही.. (२०)
आधा महीना अर्थात् पक्ष, महीने, ऋतुओं के साथ उन में उत्पन्न होने वाले पदार्थ, शब्द
करने वाले जल, गर्जन करते हुए मेघ और पवित्र भूमि—ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित
हैं. (२०)
शर्कराः सिकता अश्मान ओषधयो वीरुधस्तृणा.
अभ्राणि विद्युतो वर्षमुच्छिष्टे संश्रिता श्रिता.. (२१)
पत्थरों के छोटे टुकड़े, बालू, पत्थर, जड़ीबूटी और फसलें, लताएं, तिनके, मेघ,
बिजलियां और वर्षा ये सब यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (२१)
राद्धिः प्राप्तिः समाप्तिर्व्याप्तिर्मह एधतुः.
अत्याप्तिरुच्छिष्टे भूतिश्चाहिता निहिता हिता.. (२२)
सिद्धि, प्राप्ति, समाप्ति, व्याप्ति, तेज, वृद्धि, अत्यधिक प्राप्ति, समृद्धि तथा सामने
स्थित हितकारी पदार्थ यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित है. (२२)
यच्च प्राणति प्राणेन यच्च पश्यति चक्षुषा.
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२३)
जो प्राण वायु के द्वारा जीवित रहता है, जो आंखों से देखता है, स्वर्ग में स्थित देव और
स्वर्ग—ये सभी यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न है. (२३)
ऋचः सामानि च्छन्दांसि पुराणं यजुषा सह.
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२४)
ऋग्वेद और सामवेद के मंत्र, छंद, यजुर्वेद के सहित प्राचीन मंत्र, स्वर्ग और स्वर्ग में
स्थित देव—ये सभी यज्ञ रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (२४)
प्राणापानौ चक्षुः श्रोत्रमक्षितिश्च क्षितिश्च या.
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२५)
प्राण और अपान वायु, नेत्र, कान, विनाश का अभाव और विनाश, स्वर्ग और स्वर्ग में
स्थित देव—ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (२५)
आनन्दा मोदाः प्रमुदोऽभीमोदमुश्च ये.
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२६)
विषयों के उपभोग से उत्पन्न आनंद नाम के विशेष सुख, हर्ष, अधिक प्रसन्नता एवं इन्हें
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देने वाले पदार्थ, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव—ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए.
(२६)
देवाः पितरो मनुष्या गन्धर्वाप्सरसश्च ये.
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२७)
देव, पितर, मनुष्य, गंधर्व, अप्सराएं, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव—ये सभी यज्ञ शेष
रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए. (२७)
सूक्त-१० देवता—मन्यु
यन्मन्युर्जायामावहत् संकल्पस्य गृहादधि.
क आसं जन्याः के वराः क उ ज्येष्ठवरो ऽ भवत्.. (१)
ब्रह्म माया के अभिमुख उसी प्रकार प्राप्त हुआ, जिस प्रकार पति पत्नी के सामने जाता
है. ब्रह्म ने माया को उसी प्रकार प्राप्त किया, जिस प्रकार पति अपनी पत्नी को घर से प्राप्त
करता है. ब्रह्मा की सृष्टि रचना की इच्छा में वधू पक्ष के बंधन कौन थे? कन्या का वरण करने
वाले कौन थे? उस समय प्रधान वर अर्थात् विवाह करने वाला कौन था? (१)
तपश्चैवास्तां कर्म चान्तर्महत्यर्णवे.
त आसं जन्यास्ते वरा ब्रह्म ज्येष्ठवरो ऽ भवत्.. (२)
उस सृष्टि रचना के समय सृष्टि की रचना करने वाले परमेश्वर का तप और कर्म ही उस
समय स्थित थे. यह तप और कर्म प्रलय काल के सागर का मंत्र था. विवाह के मुहूर्त पर जो
कन्या पक्ष वाले बंधन थे, वे ही विवाह करने वाले थे. ब्रह्म उन में सब से बड़ा वर था. (२)
दश साकमजायन्त देवा देवेभ्यः पुरा.
यो वै तान् विद्यात् प्रत्यक्षं स वा अद्य महद् वदेत्.. (३)
अग्नि आदि देवों की उत्पत्ति से पहले ही ज्ञानेंद्रियां और कर्मेंद्रियां उत्पन्न हुईं. जो
उपासक उन देवों को जान सकेगा, वह प्रत्यक्ष ही ब्रह्म का उपदेश करेगा. (३)
प्राणापानौ चक्षुः श्रोत्रमक्षितिश्च क्षितिश्च या.
व्यानोदानौ वाङ्मनस्ते वा आकूतिमावहन्.. (४)
प्राण और अपान वायु, नयन, कान, क्षीण होने वाली क्रिया शक्ति, क्षय रहित ब्रह्म,
व्यान और उदान वायुएं, वाणी और मन ने देवकृत संकल्प को धारण किया. (४)
अजाता आसन्नृतवो ऽ थो धाता बृहस्पतिः.
इन्द्राग्नी अश्विना तर्हि कं ते ज्येष्ठमुपासत.. (५)
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सृष्टि रचना के समय वसंत आदि ऋतुएं उत्पन्न नहीं हुई थीं. धाता, बृहस्पति, इंद्र, अग्नि
तथा दो अश्विनीकुमार भी उस समय उत्पन्न नहीं हुए थे. धाता आदि वे देव अपने जन्मदाता
ब्रह्म की उपासना कर रहे थे. (५)
तपश्चैवास्तां कर्म चान्तर्महत्यर्णवे.
तपो ह जज्ञे कर्मणस्तत् ते ज्येष्ठमुपासत.. (६)
प्रलय काल के महासागर में तप और कर्म ही थे. तप कर्म से उत्पन्न हुआ था. वे धाता
आदि सृष्टि के कारण बने हुए ब्रह्म की उपासना कर रहे थे. (६)
येत आसीद् भूमिः पूर्वा यामद्धात्तय इद् विदुः.
यो वै तां विद्यान्नामथा स मन्येत पुराणवित्.. (७)
सामने वर्तमान इस भूमि से पहले जो भूमि थी. उसे तप के प्रभाव से शक्ति प्राप्त करने
वाले ऋषि जानते थे. जो अतीत काल के कल्प में स्थित उस भूमि को जो जानेगा, वह
प्राचीन अर्थ को जानने वाला माना जाएगा. (७)
कुत इन्द्रः कुतः सोमः कुतो अग्निरजायत.
कुतस्त्वष्टा समभवत् कुतो धाताजायत.. (८)
कहां से इंद्र, कहां से सोम और कहां से अग्नि उत्पन्न हुई? त्वष्टा कहां से उत्पन्न हुआ
तथा धाता की उत्पत्ति कहां से हुई? (८)
इन्द्रादिन्द्रः सोमात् सोमो अग्नेरग्निरजायत.
त्वष्टा ह जज्ञे त्वष्टुर्धातुर्धाताजायत.. (९)
पूर्व काल में जो इंद्र थे, उन से इन वर्तमान काल के इंद्र की उत्पत्ति हुई. इसी सोम से
सोम, अग्नि से अग्नि, त्वष्टा से त्वष्टा और धाता से धाता उत्पन्न हुए. (९)
ये त आसन् दश जाता देवा देवेभ्यः पुरा.
पुत्रेभ्यो लोकं दत्त्वा कस्मिंस्ते लोक आसते.. (१०)
प्राचीन काल में देवों से जो दस देव उत्पन्न हुए, वे अपने पुत्रों को यह लोक दे कर भी
स्वयं किस लोक में निवास करते हैं? (१०)
यदा केशानस्थि स्नाव मांसं मज्जानमाभरत्.
शरीरं कृत्वा पादवत् कं लोकमनुप्राविशत्.. (११)
जिस सृष्टि रचना के समय रचना करने वाले ने केशों को, अस्थियों को, स्नायुओं अर्थात्
नसों को, मांस को और मज्जा अर्थात् चरबी को एकत्र किया. हाथपैरों वाले शरीर की रचना
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