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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-६ देवता—ब्रह्म

हे घाव भरने वाली लाख! तू घोड़े के रंग वाली है एवं वृक्षों को सींचती हैं. तू सरकने
वाली है, इसलिए चिड़िया बन कर हमारे समीप आ. (९)
सूक्त-६ देवता—ब्रह्म
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः.
स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः.. (१)
संपूर्ण सृष्टि का कारण ब्रह्म सृष्टि के आरंभ में सूर्य के रूप में प्रकट हुआ. उस का तेज
सीमा रहित है, जो सभी दिशाओं और लोकों में व्याप्त होता है. वह अनुपम है. सत् इसी से
उत्पन्न हुआ है और असत् इसी में समा जाता है. (१)
अनाप्ता ये वः प्रथमा यानि कर्माणि चक्रिरे.
वीरान् नो अत्र मा दभन् तद् व एतत् पुरो दधे.. (२)
हे मनुष्यो! तुम्हारे विरोधी शत्रुओं ने जो उत्तम कर्म किए हैं, उन कर्मों से वे हमारी
संतानों तथा वीरों का विनाश न करें, इसलिए मैं वह अभिचार कर्म तुम्हारे सामने प्रस्तुत कर
रहा हूं. (२)
सहस्रधार एव ते समस्वरन् दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतः.
तस्य स्पशो न नि मिषन्ति भूर्णयः पदेपदे पाशिनः सन्ति सेतवे.. (३)
आकाश में स्थित एवं हजारों मार्गों वाले स्वर्ग में विनाश करने वाले यह घोषित कर चुके
हैं. जो लोग युद्ध में जाने के लिए आनाकानी करते हैं, उन्हें बांधने के लिए यमदूत पाश लिए
हुए सदा तत्पर रहते हैं एवं अपनी आंखें कभी बंद नहीं करते. (३)
पर्यु षु प्र धन्वा वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः.
द्विषस्तदध्यर्णविनेयसे सनिस्रसो नामासि त्रयोदशो मास इन्द्रस्य गृहः.. (४)
हे सूर्य! तुम अन्न उत्पादन के निमित्त मेघों के समीप जाते हो और उन्हें ताड़ित कर के
सागर के पास पहुंचाते हो. इसी कारण तुम्हारा नाम सनिस्रत है. वर्ष का तेरहवां महीना जो
इंद्र का घर है, तुम उस में भी वर्षा करने को तत्पर हो. (४)
न्वे ३ तेनारात्सीरसौ स्वाहा.
तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृडतं नः.. (५)
इसी अभिचार कर्म द्वारा इस पुरुष ने सिद्धि प्राप्त की थी. यह अभिचार कर्म सुंदर
आहुति वाला हो. हे सोम और रुद्र! तुम तीखे अस्त्रों वाले हो. तुम हमें इस युद्ध में विजयी
बना कर सुख प्रदान करो. (५)
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अवैतेनारातत्सीरसौ स्वाहा.
तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृडतं नः.. (६)
इस अभिचार कर्म के द्वारा ही इस राजा ने सिद्धि प्राप्त की है एवं शत्रुओं का विनाश
किया है. इस की छवि सुंदर आहुति वाली हो. हे सोम एवं रुद्र! तुम तीक्ष्ण शस्त्रों वाले हो. तुम
इस युद्ध में विजय प्रदान करा के हमें सुख दो. (६)
अपैतेनारातत्सीरसौ स्वाहा.
तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृडतं नः.. (७)
इस अभिचार कर्म द्वारा ही इस राजा ने अपने शत्रुओं का विरोध करते हुए उन का
दमन किया तथा सिद्धि प्राप्त की. इस की यह हवि सुंदर आहुति वाली हो. हे सोम और रुद्र!
तुम अत्यधिक तीक्ष्ण आयुधों वाले तथा सुख प्राप्त करने वाले हो. तुम हमें इस युद्ध में
विजयी बना कर सुख प्रदान करो. (७)
मुमुक्तमस्मान्दुरितादवद्याज्जुषेथां यज्ञममृतमस्मासु धत्तम्.. (८)
हे सोम एवं रुद्र देव! हमें ऐसे पाप से बचाओ, जिस का नाम लेने में भी लज्जा आती
है. तुम इस यज्ञ को प्राप्त करो और इस में अमृत धारण करो. (८)
चक्षुषो हेते मनसो हेते ब्रह्मणो हेते तपसश्च हेते.
मेन्या मेनिरस्यमेनयस्ते सन्तु ये३स्मां अभ्यघायन्ति.. (९)
हे नेत्र की, मन की, ब्रह्म की एवं तप की संहारक शक्ति! तुम सभी आयुधों की अपेक्षा
श्रेष्ठ आयुध हो. जो आयुधधारी हमें नष्ट करना चाहते हैं, वे आयुधहीन हो जाएं. (९)
यो ३ स्मांश्चक्षुषा मनसा चित्त्याकूत्या च यो अघायुरभिदासात्.
त्वं तानग्ने मेन्यामेनीन् कृणु स्वाहा.. (१०)
हे अग्नि! हमारी हत्या रूपी पाप करने का इच्छुक जो व्यक्ति हम को चक्षु से, मन से
और चित्तवृत्ति से क्षीण करना चाहता है, उसे अपने आयुध के द्वारा आयुधहीन बनाओ.
हमारी यह आहुति उत्तम हो. (१०)
इन्द्रस्य गृहो ऽ सि.
तं त्वा प्र पद्ये तं त्वा प्र विशामि सर्वगुः सर्वपूरुषः
सर्वात्मा सर्वतनूः सह यन्मेऽस्ति तेन.. (११)
हे अग्नि! तुम इंद्र के गृह हो. तुम सर्वत्र गमन करने वाले, सब के पुरुष, सब की आत्मा
एवं सब के शरीर हो. मैं अपने सभी सहयोगियों सहित आप की शरण में आया हूं. (११)
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इन्द्रस्य शर्मासि.
तं त्वा प्र पद्ये तं त्वा प्र विशामि सर्वगुः सर्वपूरुषः
सर्वात्मा सर्वतनूः सह यन्मेऽस्ति तेन.. (१२)
हे अग्नि! तुम इंद्र के मुख, सर्वत्र गमन करने वाले, सब की आत्मा, सब के शरीर एवं
सब के पुरुष हो. मैं अपने सभी सहयोगियों सहित तुम्हारी शरण में आया हूं. (१२)
इन्द्रस्य वर्मासि.
तं त्वा प्र पद्ये तं त्वा प्र विशामि सर्वगुः सर्वपूरुषः
सर्वात्मा सर्वतनूः सह यन्मे ऽ स्ति तेन.. (१३)
हे अग्नि! तुम इंद्र के कवच, सर्वत्र गमन करने वाले, सब की आत्मा, सब के शरीर और
सब के पुरुष हो. मैं अपने समस्त परिवार और पूरी संपत्ति के साथ तुम्हारी शरण में आता हूं.
(१३)
इन्द्रस्य वरूथमसि.
तं त्वा प्र पद्ये तं त्वा प्र विशामि सर्वगुः सर्वपूरुषः
सर्वात्मा सर्वतनूः सह यन्मे ऽ स्ति तेन.. (१४)
हे अग्नि! तुम इंद्र के सैनिक, सर्वत्र गमन करने वाले, सब के पुरुष, सब की आत्मा और
सब के शरीर हो. मैं अपने सभी सहयोगियों सहित तुम्हारी शरण में आया हूं. (१४)
सूक्त-७ देवता—अराति
आ नो भर मा परि ष्ठा अराते मा नो रक्षीर्दक्षिणां नीयमानाम्.
नमो वीत्सार्या असमृद्धये नमो अस्त्वरातये.. (१)
हे अराति! हम को धन संपन्न बना. तू हमारे चारों ओर स्थित मत हो और हमारे द्वारा
लाई गई दक्षिणा को प्रभावित मत कर. यह हवि हम दान हीनता की अधिष्ठात्री देवी को वृद्धि
न होने की इच्छा से दे रहे हैं. यह तुझे प्राप्त हो. (१)
यमराते पुरोधत्से पुरुषं परिरापिणम्.
नमस्ते तस्मै कृण्मो मा वनिं व्यथयीर्मम.. (२)
हे अराति! हम उस पुरुष को दूर से प्रणाम करते हैं, जो तुम्हारे सम्मुख रहता है एवं
केवल बोलने वाला है, काम नहीं करता. तुम हमारी इस इच्छा को ठुकराना मत. (२)
प्र णो वनिर्देवकृता दिवा नक्तं च कल्पताम्.
अरातिमनुप्रेमो वयं नमो अस्त्वरातये.. (३)

हम में देवों की भक्ति रातदिन बढ़ती रहे. इसीलिए हम अराति की शरण में जाते हैं.
अराति को नमस्कार हो. (३)
सरस्वतीमनुमतिं भगं यन्तो हवामहे.
वाचं जुष्टां मधुमतीमवादिषं देवानां देवहूतिषु.. (४)
मैं देवों का आह्वान करने वाले यज्ञों में उस वाणी का उच्चारण करता हूं, जो उन्हें प्रसन्न
करने वाली है. हम सब सरस्वती, अनुमति और भगदेव की शरण प्राप्त करते हैं और उन्हें
बुलाते हैं. (४)
यं याचाम्यहं वाचा सरस्वत्या मनोयुजा.
श्रद्धा तमद्य विन्दतु दत्ता सोमेन बभ्रुणा.. (५)
मन से उत्पन्न सरस्वती की वाणी के द्वारा मैं जिस वस्तु को पाने की प्रार्थना करता हूं,
वह शक्तिशाली सोमदेव की श्रद्धा द्वारा दी हुई प्राप्त हो. (५)
मा वनिं मा वाचं नो वीत्सीरुभाविन्द्राग्नी आ भरतां नो वसूनि.
सर्वे नो अद्य दित्सन्तो ऽ रातिं प्रति हर्यत.. (६)
हे अराति! तू हमारी वाणी और भक्ति को अवरुद्ध मत कर. इंद्र और अग्नि हमें धन
प्रदान करें तथा वे इस समय हमारे शत्रुओं के अनुकूल न हों. (६)
परो ऽ पेह्यसमृद्धे वि ते हेतिं नयामसि.
वेद त्वाहं निमीवन्तीं नितुदन्तीमराते. (७)
हे अराति! मैं जानता हूं कि तू दुर्बल बनाने वाला और पीड़ा देने वाला है. इस कारण तू
मुझ से दूर रह. मैं तेरी विनाशक शक्ति को दूर कर सकता हूं. (७)
उत नग्ना बोभुवती स्वप्रया सचसे जनम्.
अराते चित्तं वीर्त्सन्त्याकूतिं पुरुषस्य च.. (८)
हे अराति! तू मनुष्यों की कामनाओं को असफल करता है तथा उन्हें सदा प्रभाव के
रूप में प्राप्त होता है. (८)
या महती महोन्माना विश्वा आशा व्यानशे.
तस्यै हिरण्यकेश्यै निर्ऋत्या अकरं नमः.. (९)
असमृद्धि अर्थात् दरिद्रता हमारी सभी आशाओं को सीमित कर रही है. सुनहरे केशों
वाली इस असमृद्धि को मैं नमस्कार करता हूं. (९)
हिरण्यवर्णा सुभगा हिरण्यकशिपुर्मही.
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