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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-६ देवता—प्राण

युक्त, सभी जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला है इस विधि से जो इस ओदन का सेवन
करना जानता है वह समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर है. (१८)
सूक्त-६ देवता—प्राण
प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे.
यो भूत: सर्वस्येश्वरो यस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम्.. (१)
इस प्राण के लिए नमस्कार है, जिस के वश में यह समस्त चराचर जगत् है. यह प्राण
सब का ईश्वर है और इसी में सारा जगत् स्थित है. (१)
नमस्ते प्राण क्रन्दाय नमस्ते स्तनयित्नवे.
नमस्ते प्राण विद्युते नमस्ते प्राण वर्षते.. (२)
हे ध्वनि करते हुए प्राण! तुम्हारे लिए नमस्कार है, मेघ घटा में घुस कर वर्षा करने वाले
तुम्हारे लिए नमस्कार है. बिजली के रूप में प्रकाशित एवं वर्षा करते हुए तुम्हें नमस्कार है.
(२)
यत् प्राण स्तनयित्नुनाभिक्रन्दत्योषधी:.
प्र वीयन्ते गर्भान् दधतेऽथो बह्वीर्वि जायन्ते.. (३)
जब प्राण अर्थात् सूर्यात्मक देव वर्षा काल में मेघ ध्वनि के द्वारा जौ, गेहूं, एवं जंगली
वृक्षों को लक्ष्य कर के गरजते हैं, तब सभी फसलें गर्भ धारण करती हैं एवं अनेक प्रकार से
उत्पन्न होती हैं. (३)
यत् प्राण ऋतावागते ऽ भिक्रन्दत्योषधी:.
सर्वं तदा प्र मोदते यत् किं च भूम्यामधि.. (४)
जब प्राण अर्थात् सूर्यात्मक देव वर्षा ऋतु आने पर फसलों को लक्ष्य कर के गर्जन
करते हैं, तब भूमि पर जितने भी प्राणी हैं, वे सब प्रसन्न होते हैं. (४)
यदा प्राणो अभ्यवर्षीद् वर्षेण पृथिवीं महीम्.
पशवस्तत् प्र मोदन्ते महो वै नो भविष्यति.. (५)
जिस समय प्राण अर्थात् सूर्य देव, पृथ्वी को वर्षा के जल से सभी ओर गीला कर देते हैं,
उस समय गाय आदि पशु प्रसन्न होते हैं कि घास की अधिकता से हमारे लिए उत्सव होगा.
(५)
अभिवृष्टा ओषधयः प्राणेन समवादिरन्.
आयुर्वै नः प्रातीतरः सर्वा नः सुरभीरकः.. (६)
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प्राण अर्थात् सूर्य देव के द्वारा वर्षा के जल से सींची गई फसलें और जड़ीबूटियां सूर्य से
संभाषण करने लगती हैं—"हे प्राण अर्थात् सूर्य देव! तुम हमारा जीवन बढ़ाओ तथा हमें
शोभन गंध वाली बनाओ.” (६)
नमस्ते अ्रस्त्वायते नमो अस्तु परायते.
नमस्ते प्राण तिष्ठत आसीनायोत ते नमः.. (७)
हे प्राण देव! तुझ आते हुए को नमस्कार है और वापस जाते हुए को नमस्कार है. हे
प्राण देव! तुझ स्थिर रहने वाले को तथा बैठे हुए को नमस्कार है. (७)
नमस्ते प्राण प्राणते नमो अस्त्वपानते.
पराचीनाय ते नमः प्रतीचीनाय ते नमः सर्वस्मै त इंद नमः.. (८)
हे प्राण देव! सांस लेने का व्यापार करने वाले तुम्हें नमस्कार है तथा अपान वायु छोड़ने
वाले तुम्हें नमस्कार है. अधिक कहने से क्या लाभ है, समस्त व्यापार अर्थात् क्रियाएं करने
वाले तुम्हें नमस्कार है. (८)
या ते प्राण प्रिया तनूर्यो ते प्राण प्रेयसी.
अथो यद् भेषजं तव तस्य नो धेहि जीवसे.. (९)
हे प्राण देव! तुम्हारा प्रिय जो शरीर है एवं प्राण, अपान अर्थात् अग्नि और सोम रूपी
तुम्हारी जो दो प्रियाएं हैं तथा जो तुम्हारी अमरता प्रदान करने वाली ओषधि है, इन सब से
हमें जीवन के अमृत का साधन ओषधि प्रदान करो. (९)
प्राणः प्रजा अनु वस्ते पिता पुत्रमिव प्रियम्.
प्राणो ह सर्वस्येश्वरो यच्च प्राणति यच्च न.. (१०)
हे प्राण देव! समस्त प्रजाओं के शरीर में तुम इस प्रकार निवास करते हो, जिस प्रकार
पिता अपने वस्त्र से प्रिय पुत्र को ढकता है. प्राण उन सब के स्वामी हैं, जो सांस लेते हैं
अथवा सांस नहीं लेते हैं. (१०)
प्राणो मृत्युः प्राणस्तक्मा प्राणं देवा उपासते.
प्राणो ह सत्यवादिनमुत्तमे लोक आ दधत्.. (११)
ये प्राण देव ही मृत्यु करने वाले हैं एवं यही जीवन को कष्टमय बनाने वाले ज्वर हैं. शरीर
के मध्य में वर्तमान इन्हीं प्राण की देवगण उपासना करते हैं. (११)
प्राणो विराट् प्राणो देष्ट्री प्राणं सर्व उपासते.
प्राणो ह सूर्यश्चन्द्रमाः प्राणमाहुः प्रजापतिम्.. (१२)
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प्राण अर्थात् स्थूल प्रपंच का अभिमानी देवता ईश्वर प्राण है तथा अपनेअपने व्यापारों में
सब को प्रेरित करने वाला परम देवता प्राण है. अपने मनचाहे फल को पाने के लिए सभी
प्राण की उपासना करते हैं. प्राण सूर्य और चंद्रमा है तथा प्राण को ही ज्ञानी जन सब की
रचना करने वाला प्रजापति कहते हैं. (१२)
प्राणापानौ व्रीहियवावनड्‌वान् प्राण उच्यते.
यवे ह प्राण आहितो ऽ पानो व्रीहिरुच्यते.. (१३)
प्राण और अपान प्रधान प्राण की विशेष वृत्तियां हैं. प्राण ही गेहूं, जौ तथा अपान बैल
कहे जाते हैं. प्राण वायु जौ में आश्रित है तथा अपान वायु को ही गेहूं कहा जाता है. (१३)
अपानति प्राणति पुरुषो गर्भे अन्तरा.
यदा त्वं प्राण जिन्वस्यथ स जायते पुनः.. (१४)
पुरुष स्त्री के गर्भाशय के मध्य सांस लेता और अपान वायु छोड़ता है. हे प्राण! जब तुम
गर्भस्थ भ्रूण को पुष्ट करते हो, तब वह जन्म लेता है. (१४)
प्राणमाहुर्मातरिश्वानं वातो ह प्राण उच्यते.
प्राणे ह भूतं भव्यं च प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्.. (१५)
प्राण को मातरिश्वा अंतरिक्ष का स्वामी वायु कहा जाता है. उसी वायु को प्राण कहा
जाता है. उन दोनों में केवल नाम का भेद है. जगत् के आधार बने हुए उस प्राण में भूतकाल
से संबंधित और भविष्य काल में उत्पन्न होने वाला जगत् आश्रित रहता है. इस प्रकार प्राणों
में ही सब प्रतिष्ठित हैं. (१५)
आथर्वणीराङ्गिरसीर्देवीर्मनुष्यजा उत.
ओषधयः प्र जायन्ते यदा त्वं प्राण जिन्वसि.. (१६)
अथर्वा महर्षि द्वारा, अंगिरा महर्षि द्वारा, देवों द्वारा तथा मनुष्यों द्वारा उत्पन्न अनेक
प्रकार की जड़ीबूटियों और फसलों को हे प्राण! तुम ही वर्षा का जल प्रदान कर के प्रसन्न
करते हो. (१६)
यदा प्राणो अभ्यवर्षीद् वर्षेण पृथिवीं महीम्.
ओषधयः प्र जायन्तेऽथो याः काश्च वीरुधः.. (१७)
प्राण जब वर्षा के रूप में विशाल पृथ्वी पर जल गिराता है, तभी जड़ीबूटियां, फसलें
और जो भी वृक्ष हैं, वे सब उत्पन्न होते हैं. (१७)
यस्ते प्राणेदं वेद यस्मिंश्चासि प्रतिष्ठितः.
सर्वे तस्मै बलिं हरानमुष्मिंल्लोक उत्तमे.. (१८)
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हे प्राण! यह कहा हुआ तुम्हारा माहात्म्य जो जानता है एवं जिस विद्वान् में तुम
प्रतिष्ठित रहते हो, उस के लिए सभी देव स्वर्ग में अमृतमय भाग प्रस्तुत करते हैं. (१८)
यथा प्राण बलिहृतस्तुभ्यं सर्वाः प्रजा इमाः.
एवा तस्मै बलिं हरान् यस्त्वा शृणवत् सुश्रवः.. (१९)
हे प्राण! जिस प्रकार ये सभी प्रजाएं तुम्हारे लिए बलि प्रस्तुत करें. हे सुनने वाले प्राण!
जो तुम्हारा माहात्म्य सुनता है, उस के लिए भी सब बलि प्रस्तुत कर देते हैं. (१९)
अन्तर्गर्भश्चरति देवतास्वाभूतो भूतः स उ जायते पुन:.
स भूतो भव्यं भविष्यत् पिता पुत्रं प्र विवेशा शचीभिः.. (२०)
प्राण गर्भ हो कर देवताओं में विचरण करता है, वही भलीभांति व्याप्त हो कर मनुष्य
आदि के शरीर के रूप में पुनः उत्पन्न होता है. नित्य वर्तमान वह प्राण भूतकाल की वस्तुओं
में तथा भविष्य काल की वस्तुओं के रूप में उत्पन्न होता है. वही अपनी शक्तियों से पिता
और पुत्र में प्रवेश करता है. (२०)
एकं पादं नोत्खिदति सलिलाद्धंस उच्चरन्.
यदङ्ग स तमुत्खिदेन्रैवाद्य
न श्वः स्यान्न रात्री नाहः स्यान्न व्युच्छेत् कदा चन.. (२१)
हंस अर्थात् जगत् के प्राण बने हुए सूर्य जल से उदित होते हुए अपने एक चरण अर्थात्
भाग को जल से ऊपर नहीं उठाते हैं. यदि वे अपने दूसरे चरण को भी ऊपर उठा लें तो काल
विभाजन नहीं हो सकेगा. तब वे कहीं न जा सकेंगे और न दिन और रात हो सकेंगे. (२१)
अष्टाचक्रं वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्र पुरो नि पश्चा.
अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्धं कतमः स केतुः.. (२२)
त्वचा, रक्त आदि आठ धातुएं शरीर का निर्माण करती हैं. उन्हीं का यहां रथ के पहियों
के रूप में निरूपण है—यह शरीर आठ पहियों वाला रथ है. प्राण ही इस की एकमात्र धुरी है.
लोक में रथ के पहिए धुरी को घेरे रहते हैं. प्राण रूपी धुरी एक पहिए से निकल कर दूसरे में
प्रवेश करती है. वह प्राण अपने एक अंश से सारे प्राणियों में प्रवेश कर के आत्मा के रूप में
उत्पन्न होता है. उस का दूसरा भाग असीमित ब्रह्म का झंडा अर्थात् ब्रह्मांड बन जाता है.
(२२)
यो अस्य विश्वजन्मन ईशे विश्वस्य चेष्टतः.
अन्येषु क्षिप्रधन्वने तस्मै प्राण नमो ऽ स्तु ते.. (२३)
जो प्राण नाना रूपों को जन्म देने वाला है, जो इस संसार का स्वामी है तथा नाना
प्राणियों के शरीरों में व्याप्त है, उस तीव्रता से व्याप्त होने वाले हे प्राण! तुम्हारे लिए नमस्कार
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है. (२३)
यो अस्य सर्वजन्मन ईशे सर्वस्य चेष्टतः.
अतन्द्रो ब्रह्मणा धीरः प्राणो मानु तिष्ठतु.. (२४)
वह जगदीश्वर प्राण आलस्य रहित सदा सूर्य के रूप में विचरण करने वाला, ज्ञानवान
एवं सर्वव्यापक होने के कारण मेरा अनुवर्तन करे. (२४)
ऊर्ध्वः सुप्तेषु जागार ननु तिर्यङ्ङ नि पद्यते.
न सुप्तमस्य सुप्तेष्वनु शुश्राव कश्चन.. (२५)
हे प्राण! तुम ऊर्ध्वगामी हो कर निद्रा परवश प्राणियों में जागते रहो. सोने वाला प्राणी
निद्रा के वशीभूत हो जाता है. इसलिए उस की रक्षा हेतु तुम जाग्रत रहो. ऐसा किसी ने नहीं
सुना है कि मनुष्य के निद्रा पर वश होने पर उस का प्राण भी सो गया हो. (२५)
प्राण मा मत् पर्यावृतो न मदन्यो भविष्यसि.
अपां गर्भमिव जीवसे प्राण बध्नामि त्वा मयि.. (२६)
हे प्राण! आप मुझ से न तो विमुख हों तथा न मुझे त्याग कर अन्यत्र जाएं. जल जिस
प्रकार वाडवाग्नि को धारण करते हैं, उसी प्रकार हम अपनी देह में आप को धारण करते हैं.
(२६)
सूक्त-७ देवता—ब्रह्मचारी
ब्रह्मचारीष्णंश्चरति रोदसी उभे तस्मिन् देवाः संमनसो भवन्ति.
स दाधार पृथिवीं दिवं च स आचार्यं १ तपसा पिपर्ति.. (१)
वेदों का अध्ययन करने वाला अपने तप से धरती और आकाश दोनों में व्याप्त होता है.
इंद्र आदि सभी देव इस ब्रह्मचारी के प्रति अनुग्रह करते हैं. यह ब्रह्मचारी अपने तप से धरती
और स्वर्ग को धारण करता है तथा सन्मार्ग पर चलता हुआ अपने आचार्य का पालन करता
है. (१)
ब्रह्मचारिणं पितरो देवजनाः पृथग् देवा अनुसंयन्ति सर्वे.
गन्धर्वा एनमन्वायन् त्रयस्त्रिंशत् त्रिशताः षट्सहस्राः सर्वान्त्स देवांस्तपसा
पिपर्ति.. (२)
पितर, देवजन एवं इंद्र आदि सभी देव ब्रह्मचारी की रक्षा के लिए उस के पीछे चलते हैं.
गंधर्व भी ब्रह्मचारी का अनुगमन करते हैं. ब्रह्मचारी अपने तप से तैंतीस, तीस और छह हजार
संख्या वाले सभी देवों का पालन करता है. (२)
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आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः.
तं रात्रीस्तिस्र उदरे बिभर्ति तं जातं द्रष्टुमभिसंयन्ति देवाः.. (३)
आचार्य ब्रह्मचारी का उपनयन अर्थात् यज्ञोपवीत संस्कार कर के अपने समीप रखता
हुआ उसे विद्या से संपन्न करता है. आचार्य उस ब्रह्मचारी को तीन रात्रियों तक अपने
अत्यधिक समीप रखता है. चौथे दिन विद्यामय शरीर से उत्पन्न उस ब्रह्मचारी को देखने के
लिए देवगण एकत्र हो कर आते हैं. (३)
इयं समित् पृथिवी द्यौर्द्वितीयेातान्तरिक्षं समिधा पृणाति.
ब्रह्मचारी समिधा मेखलया श्रमेण लोकांस्तपसा पिपर्ति.. (४)
यह पृथ्‍वी ब्रह्मचारी की पहली समिधा है. द्युलोक अर्थात् स्वर्ग ब्रह्मचारी की दूसरी
समिधा है. ब्रह्मचारी स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष को अग्नि में डाली गई समिधा
के द्वारा पूर्ण करता है. इस प्रकार ब्रह्मचारी समिधा, मेखला, श्रम और तप के द्वारा लोकों को
पूर्ण करता है अर्थात् भर देता है. (४)
पूर्वो जातो ब्रह्मणो ब्रह्मचारी घर्मं वसानस्तपसोदतिष्ठत्.
तस्माज्जातं ब्राह्मणं ब्रह्म ज्येष्ठं देवाश्च सर्वे अमृतेन साकम्.. (५)
सर्व जगत् के कारण ब्रह्म से सब से पहले ब्रह्मचारी उत्पन्न हुआ. उत्पन्न हुआ ब्रह्मचारी
धर्म से अपनेआप को ढकता हुआ तप के द्वारा उठा. उस ब्रह्मचारी रूपी ब्रह्म से ब्राह्मणों का
धन वेद उत्पन्न हुआ. उस वेद से अमृत के साथ अग्नि आदि देव उत्पन्न हुए. (५)
ब्रह्मचर्येति समिधा समिद्धः कार्ष्णं वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः.
स सद्य एति पूर्वस्मादुत्तरं समुद्रं लोकान्संगृह्य मुहुराचरिक्रत्.. (६)
समिधा से उत्पन्न तेज को धारण करता हुआ, नियमों के द्वारा वश में किया गया, लंबी
दाढ़ी वाला ब्रह्मचारी पूर्व सागर से उत्तर सागर की ओर गया. उस ने पृथ्वी, अंतरिक्ष आदि
लोकों को वश में कर के अपने अभिमुख किया. (६)
ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्मापो लोकं प्रजापतिं परमेष्ठिनं विराजम्.
गर्भो भूत्वा मृतस्य योनाविन्द्रो ह भूत्वा ऽ सुरांस्ततर्ह.. (७)
उस ब्रह्मचारी ने ब्राह्मण जाति के जल अर्थात् गंगा आदि नदियों को, स्वर्ग आदि लोकों
को, प्रजाओं की सृष्टि करने वाले प्रजापति को तथा प्रजापति के बाद सृष्टि की रचना करने
वाले परमेष्ठी को उत्पन्न किया. वह ब्रह्मचारी मृत्यु रहित ब्रह्म की सत्ता, रज, तमोगुण वाली
प्रकृति में गर्भ बन कर सब को जन्म देता है. उस ने तप के बल से इंद्र हो कर देवों के विरोधी
असुरों का विनाश किया. (७)
आचार्य स्ततक्ष नभसी उभे इमे उर्वी गम्भीरे पृथिवीं दिवं च.
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ते रक्षति तपसा ब्रह्मचारी तस्मिन् देवाः संमनसो भवन्ति.. (८)
आचार्य ने उसी क्षण आकाश और धरती दोनों को जन्म दिया. ये दोनों विस्तृत और
गंभीर हैं. पृथ्वी विस्तृत है और आकाश गंभीर है. ब्रह्मचारी अपने तप से दोनों की चर्चा करता
है. उस ब्रह्मचारी से सभी देव प्रसन्न होते हैं. (८)
इमां भूमिं पृथिवीं ब्रह्मचारी भिक्षामा जभार प्रथमो दिवं च.
ते कृत्वा समिधावुपास्ते तयोरर्पिता भुवनानि विश्वा.. (९)
सब से पहले उत्पन्न ब्रह्मचारी ने इस विस्तृत भूमि को पहली भिक्षा के रूप में ग्रहण
किया. इस के बाद स्वर्ग को दूसरी भिक्षा के रूप में ग्रहण किया. वह भिक्षा में प्राप्त उन स्वर्ग
और धरती को समिधा बना कर अग्नि की परिचर्या अर्थात् सेवा करता है. स्वर्ग और पृथ्वी के
मध्य सभी प्राणी स्थापित किए गए हैं. (९)
अर्वागन्यः परो अन्यो दिवस्पृष्ठाद् गुहा निधी निहितौ ब्राह्मणस्य.
तौ रक्षति तपसा ब्रह्मचारी तत् केवलं कृणुते ब्रह्म विद्वान्.. (१०)
स्वर्ग के ऊपरी भाग से तथा उस के नीचे के भाग अर्थात् धरती पर वेद रूपी खजाने को
आचार्य की हृदयरूपी गुफा में छिपा दिया. दूसरा खजाना अर्थात् वेद के द्वारा प्रतिपाद्य देवों
को स्थापित किया. वेद पढ़ने वाले से संबंधित इन दोनों खजानों की रक्षा ब्रह्मचारी अपने तप
से करता है. वह वेद के रूप में उस के विषय ब्रह्म का ही साक्षात्कार करता है. (१०)
अर्वागन्य इतो अन्यः पृथिव्या अग्नी समेतो नभक्षी अन्तरेमे.
तयोः श्रयन्ते रश्मयो ऽ धि दृढास्ताना तिष्ठति तपसा ब्रह्मचारी.. (११)
इस स्वर्ग के नीचे एक सूर्यात्मक अग्नि है और दूसरी पृथ्वी के ऊपर है. इस स्वर्ग और
धरती के मध्य दोनों अग्नियां आपस में मिल कर उदय होती हैं. उन सूर्य और अग्नि से
संबंधित किरणें धरती और स्वर्ग के मध्य आश्रय लेती हैं. ब्रह्मचारी अपने तप की महिमा से
उन का देवता बनता है. (११)
अभिक्रन्दन् स्तनयन्नरुणः शितिङ्गो बृहच्छेपो ऽ नु भूमौ जभार.
ब्रह्मचारी सिञ्चति सानौ रेतः पृथिव्यां तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः.. (१२)
मेघों में गर्जन करता हुआ, जल पूर्ण मेघ को प्राप्त वह ब्रह्मचारी वरुण बन कर अपने
जलरूपी वीर्य को ऊंचे स्थानों पर बरसाता है. उस जल से धरती पर चारों दिशाएं प्राणियों
को धारण करती हैं. (१२)
अग्नौ सूर्ये चन्द्रमसि मातरिश्वन् ब्रह्मचार्य १ प्सु समिधमा दधाति.
तासामर्चींषि पृथगभ्रे चरन्ति तासामाज्यं पुरुषो वर्षमापः.. (१३)
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ब्रह्मचारी अग्नि में, सूर्य में, चंद्रमा में, वायु में और जल में समिधा को धारण करता है.
अग्नि आदि की किरणें अंतरिक्ष अर्थात् आकाश में अलग-अलग विचरण करती हैं. वे किरणें
गायों में घृत को, पुरुष और स्त्री में संतान को तथा वर्षा में जल को उत्पन्न करती हैं. (१३)
आचार्यो मृत्युर्वरुणः सोम ओषधयः पयः.
जीमूता आसन्त्सत्वानस्तैरिदं स्व १ राभृतम्.. (१४)
आचार्य ही मृत्यु, वरुण, सोम, जड़ीबूटियां, फसलें एवं जल है. आचार्य रूपी वरुण के
अनुचर जलपूर्ण मेघ हुए. उन मेघों ने अपने भीतर वर्षा के निमित्त जल धारण किया है. (१४)
अमां घृतं कृणुते केवलमाचार्यो भूत्वा वरुणो यद्यदैच्छत् प्रजापतौ.
तद् ब्रह्मचारी प्रायच्छत् स्वन्मित्रो अध्यात्मनः.. (१५)
वरुण देव आचार्य हो कर जल को ही उत्पन्न करते हैं. वह वरुण अपने जनक प्रजापति
अर्थात् ब्रह्म से जो चाहता है, मित्र देव बन कर अपने ब्रह्मचर्य के माहात्म्य के द्वारा अपने
शरीर से ही प्राप्त कर लेता है. (१५)
आचार्यो ब्रह्मचारी ब्रह्मचारी प्रजापतिः.
प्रजापतिर्वि राजति विराडिन्द्रो ऽ भवद्वशी.. (१६)
आचार्य पहले विद्या का उपदेश कर के ब्रह्मचारी के रूप में उत्पन्न हुआ. ब्रह्मचारी तप
के द्वारा अधिक महिमा को प्राप्त कर के जगत् स्रष्टा प्रजापति हुआ. प्रजापति विराट् हुआ.
बाद में वह स्वतंत्र इंद्र हुआ. (१६)
ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति.
आचार्यो ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते.. (१७)
ब्रह्मचर्य रूपी तप से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है. आचार्य भी ब्रह्मचर्य के नियम के
द्वारा अपने शिष्य को अपने समान बनाना चाहता है. (१७)
ब्रह्मचर्येण कन्या ३ युवानं विन्दते पतिम्.
अनड्वान् ब्रह्मचर्येणाश्वो घासं जिगीर्षति.. (१८)
ब्रह्मचर्य के द्वारा कन्या युवा पति को प्राप्त करती है. ब्रह्मचर्य के द्वारा बैल और घोड़ा
घास खाने की इच्छा करता है. (१८)
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत.
इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्व १ राभरत्.. (१९)
ब्रह्मचर्य रूपी तप के द्वारा देवों ने मृत्यु का हनन कर दिया अर्थात् देव अमर हो गए. इंद्र
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ने ब्रह्मचर्य के द्वारा देवों के लिए स्वर्ग पर अधिकार किया. (१९)
ओषधयो भूतभव्यमहोरात्रे वनस्पतिः.
संवत्सरः सहर्तुभिस्ते जाता ब्रह्मचारिणः... (२०)
जड़ीबूटियां और फसलें, भूतकाल में उत्पन्न और भविष्य में उत्पन्न होने वाला प्राणि
समूह, दिन और रात, ऋतुओं के साथ संवत्सर—ये सब ब्रह्मचर्य से उत्पन्न हुए. (२०)
पार्थिवा दिव्याः पशव आरण्या ग्राम्याश्च ये.
अपक्षाः पक्षिणश्च ये ते जाता ब्रह्मचारिणः... (२१)
पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य, देव, जंगली और ग्रामीण पशु, बिना पंखों के और पंखों
वाले प्राणी सभी ब्रह्मचर्य से उत्पन्न हुए. (२१)
पृथक् सर्वे प्राजापत्याः प्राणानात्मसु बिभ्रति.
तान्सर्वान् ब्रह्म रक्षति ब्रह्मचारिण्याभृतम्.. (२२)
प्रजापति के द्वारा उत्पन्न देव, मनुष्य आदि सभी अपने शरीरों में प्राणों को धारण करते
हैं. उन सभी की रक्षा आचार्य के द्वारा ब्रह्मचारी में धारण किया हुआ अर्थात् पढ़ाया हुआ वेद
करता है. (२२)
देवानामेतत् परिषूत्मनभ्यारूढं चरति रोचमानम्.
तस्माज्जातं ब्राह्मणं ब्रह्म ज्येष्ठं देवाश्च सर्वे अमृतेन साकम्.. (२३)
इस अपरोक्ष ब्रह्म का साक्षात्कार देवों ने किया है. यह ब्रह्म अपने प्रकाश से प्रकाशित
और सब से उत्कृष्ट है. ब्राह्मण से सब से अधिक बढ़ा हुआ और प्रशंसनीय वेद रूपी ब्रह्म
उत्पन्न हुआ है. अग्नि आदि सब देव अपने द्वारा उपभोग किए जाने वाले अमृत के साथ
उत्पन्न हुए. (२३)
ब्रह्मचारी ब्रह्म भ्राजद् बिभर्ति तस्मिन् देवा अधि विश्वे समोताः.
प्राणापानौ जनयन्नाद् व्यानं वाचं मनो हृदयं ब्रह्म मेधाम्.. (२४)
ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला पुरुष दीप्ति वाले वेदरूपी ब्रह्म को धारण करता है. उस
वेद से सभी देव संबंधित हैं. देवों का निवास बना हुआ ब्रह्मचारी प्राण और अपान के बाद
ज्ञान को, मन, वाणी, हृदय और मेधा को उत्पन्न करता है. (२४)
चक्षुः श्रोत्रं यशो अस्मासु धेह्यन्नं रेतो लोहितमुदरम्.. (२५)
हे ब्रह्मचारी रूपी ब्रह्म! हम स्तोत्राओं में चक्षु, क्षेत्र अर्थात् यज्ञ को धारण करो. तुम
अन्न, वीर्य, रक्त तथा संपूर्ण शरीर को हम में धारण करो. (२५)
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