अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-६९ देवता—इंद्र
आ त्वेता नि षीदतेन्द्रमभि प्र गायत. सखाय स्तोमवाहस:.. (११)
हे मेरे मित्र स्तोताओ! तुम यहां यज्ञशाला में विराजो और इंद्र का गुणगान करो. (११)
पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम्. इन्द्र सोमे सचा सुते.. (१२)
हे स्तोताओ! वरण करने वालों के स्वामी इंद्र अत्यधिक महान हैं. सोमरस निचोड़ दिए
जाने पर उन्हें यहां बुलाओ. (१२)
सूक्त-६९ देवता—इंद्र
स घा नो योग आ भुवत् स राये स पुरंध्याम्. गमद् वाजेभिरा स न:.. (१)
जब हमें कोई चिंता होती है अथवा हम इंद्र का चिंतन करते हैं, उस समय इंद्र हमारे
सामने प्रकट होते हैं. इंद्र अन्नों को साथ में ले कर हमारे पास आएं. (१)
यस्य संस्थे न वृण्वते हरी समत्सु शत्रव:. तस्मा इन्द्राय गायत.. (२)
हे स्तोताओ! जब इंद्र युद्ध में लगे होते हैं, तब शत्रु उन के घोड़ों को नहीं घेर पाते ऐसे
समय इंद्र की स्तुति करो. (२)
सुतपाव्ने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये. सोमासो दध्याशिर:.. (३)
दही से मिला हुआ सोमरस पवित्र है. यह सोमरस सोम पीने वाले इंद्र के लिए तैयार हो
रहा है. (३)
त्वं सुतस्य पीतये सद्यो वृद्धो अजायथा:. इन्द्र ज्यैष्ठ्याय सुक्रतो.. (४)
हे इंद्र! तुम सोमरस का पान करने के लिए शीघ्र ही अपने शरीर का विस्तार कर लेते
हो. (४)
आ त्वा विशन्त्वाशव: सोमास इन्द्र गिर्वण: शं ते सन्तु प्रचेतसे.. (५)
हे इंद्र! तुम्हें स्फूर्ति देने वाला सोमरस तुम्हारे शरीर में प्रवेश करे तथा तुम्हें तृप्त बनाए.
(५)
त्वां स्तोमा अवीवृधन् त्वामुक्था शतक्रतो. त्वां वर्धन्तु नो गिर:.. (६)
हे इंद्र! स्तोम, उक्थ और हमारी वाणी रूपी स्तुतियां तुम्हारी वृद्धि करें. (६)
अक्षितोति: सनेदिमं वाजमिन्द्र: सहस्रिणम्. यस्मिन् विश्वानि पौंस्या.. (७)
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यज्ञ कर्म की रक्षा करने वाले इंद्र में सैकड़ों पराक्रम व्याप्त हैं. हमें उन्हीं की सेवा करनी
चाहिए. (७)
मा नो मर्ता अभि द्रुहन् तनूनामिन्द्र गिर्वणः. ईशानो यवया वधम्.. (८)
हे इंद्र! हमारे शत्रु हमारी देह के प्रति हिंसा की भावना न रखें. हे स्वामी इंद्र! तुम हमारे
वध रूप कारण को हम से दूर हटाओ. (८)
युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः. रोचन्ते रोचना दिवि.. (९)
इंद्र के रथ में हरे रंग के अथवा हरि नाम के घोड़े जोते जाते हैं. आकाश में चमकते हुए
वे घोड़े स्थावर और जंगम दोनों प्रकार के प्राणियों को लांघते हैं. (९)
युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे. शोणा धृष्णू नृवाहसा.. (१०)
सारथी इंद्र के रथ में हरि नाम के अथवा हरित वर्ण के घोड़ों को जोड़ते हैं. इंद्र के रथ
के दोनों ओर रहने वाले घोड़े ऐसी सवारी हैं, जिस की कामना की जाती है. वे घोड़े सब को
वश में करते हैं. (१०)
केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे. समुषद्भिरजायथाः.. (११)
हे मरणधर्मा मनुष्यो! सूर्य रूप इंद्र अज्ञानी को अन्न और अंधकार में छिपे हुए पदार्थ
को रूप देते हैं. सूर्य रूप इंद्र अपनी किरणों से उदय हुए हैं. इन के दर्शन करो. (११)
आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे. दधाना नाम यज्ञियम्.. (१२)
मरुद्गण हवि देने वाले की गर्भ में स्थित संतान की रक्षा करने के कारण यज्ञिय नाम
धारण करते हैं. (१२)
सूक्त-७० देवता—इंद्र
वीळु चिदारुजत्नुभिर्गुहा चिदिन्द्र वह्निभिः. अविन्द उस्रिया अनु.. (१)
हे इंद्र! तुम ने उषा काल के बाद ही अपनी ज्योति वाली शक्तियों के द्वारा गुफा में छिपे
धन को प्राप्त किया था. (१)
देवयन्तो यथा मतिमच्छा विदद् वसुं गिरः. महामनूषत श्रुतम्.. (२)
हे स्तुतियो! हम स्तोता देवताओं की इच्छा करते हैं. हम इंद्र के सामने अपनी उत्तम
बुद्धि को प्रस्तुत करेंगे. इस प्रकार उन महिमा वाले इंद्र की स्तुति की जाएगी. (२)
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इन्द्रेण सं हि दृक्षसे संजग्मानो अबिभ्युषा. मन्दू समानवर्चसा.. (३)
हे इंद्र! तुम सदा ही मरुतों के साथ देखे जाते हो, वे मरुत् भय रहित हैं. तुम्हारा और
मरुतों का तेज समान है, इसलिए तुम सदा मरुतों के साथ देखे जाते हो. (३)
अनवद्यैरभिद्युभिर्मखः सहस्वदर्चति. गणैरिन्द्रस्य काम्यैः.. (४)
इंद्र की कामना करने वालों से यज्ञ की शोभा बढ़ती है. (४)
अतः परिज्मन्ना गहि दिवो वा रोचनादधि. समस्मिन्नृञ्जते गिरः.. (५)
हे इंद्र! तुम ज्योतिर्मान स्वर्ग से हमारे यज्ञ में आओ. हमारी स्तुतियां इंद्र के साथ ही
संयोग करती हैं. (५)
इतो वा सातिमीमहे दिवो वा पार्थिवादधि. इन्द्रं महो वा रजसः.. (६)
इंद्र पृथ्वीलोक में, इहलोक में अथवा स्वर्गलोक में तात्पर्य यह कि जहां कहीं भी हों, हम
वहीं से उन्हें बुलाने की इच्छा करते हैं. (६)
इन्द्रमिद् गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः. इन्द्रं वाणीरनूषत.. (७)
पूजा करने वाले यजमान इंद्र की पूजा करते हैं तथा स्तोता इंद्र के ही यश का गान करते
हैं. (७)
इन्द्र इद्धर्योः सचा संमिश्ल आ वचोयुजा. इन्द्रो वज्री हिरण्ययः.. (८)
इंद्र के साथ रहने वाले घोड़े हमारे मंत्रोच्चारण के साथ ही रथ में जोड़ दिए जाते हैं.
मनुष्यों के हितैषी इंद्र वज्र धारण करते हैं. (८)
इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्यं रोहयद् दिवि. वि गोभिरद्रिमैरयत्.. (९)
इंद्र ने ही सूर्य को स्वर्ग में इसलिए स्थापित किया है कि सब लोग उन्हें देख सकें तथा
इंद्र ने ही अपनी सूर्यरूपी किरणों के द्वारा मेघ का भेदन किया है. (९)
इन्द्र वाजेषु नो ऽ व सहस्रप्रधनेषु च. उग्र उग्राभिरूतिभिः.. (१०)
हे इंद्र! जो युद्ध श्रेष्ठ धन प्राप्त कराने वाला है, उस युद्ध में तुम अपने अतिरिक्त रक्षा
साधनों से हमारी रक्षा करो. (१०)
इन्द्रं वयं महाधन इन्द्रमर्भे हवामहे. युजं वृत्रेषु वज्रिणम्.. (११)
अधिक अथवा थोड़ा धन पाने के लिए हम इंद्र को ही बुलाते हैं. इंद्र ने वृत्र असुर पर
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अपने वज्र का प्रहार किया था. (११)
स नो वृषन्नमुं चरुं सत्रादावन्नपा वृधि. अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः.. (१२)
हे इंद्र! यह सत्य है कि तुम धन देने वाले और फलों की वर्षा करने वाले हो. तुम किसी
के हटाने से हटते नहीं हो. तुम हमारे इस चरु का भक्षण करो तथा हमारा सुख बढ़ाओ. (१२)
तुज्जेतुज्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः. न विन्धे अस्य सुष्टुतिम्..
(१३)
मैं धन प्राप्ति के प्रत्येक अवसर पर तथा सदैव धन प्राप्त करने पर धन से संतुष्ट होता
हूं. मैं जिन स्तोत्रों का स्मरण करता हूं, उन में इंद्र की महिमा की कोई सीमा नहीं होती. (१३)
वृषा यूथेव वंसगः कृष्टीरियर्त्योजसा. ईशानो अप्रतिष्कुतः.. (१४)
हे इंद्र! तुम कृषियों को संपन्न करने वाली शक्ति से जलों की वर्षा करते हो. ईशान नाम
वाले इंद्र का तिरस्कार कोई नहीं कर सकता. (१४)
य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति. इन्द्रः पञ्च क्षितीनाम्.. (१५)
इंद्र पांच भूमियों, मनुष्यों तथा ऐश्वर्यों के भी स्वामी हैं. (१५)
इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः. अस्माकमस्तु केवलः.. (१६)
इंद्र का ध्यान यदि दूसरे स्तोताओं की ओर हो, तब भी हम इंद्र को बुलाते हैं. वे इंद्र
हमारे ही हैं. (१६)
एन्द्र सानसिं रयिं सजित्वानं सदासहम्. वर्षिष्ठमूतये भर.. (१७)
हे इंद्र! तुम सदा प्रसन्नता देने वाले धन तथा फलों की वर्षा करने वाले बल को हमारी
रक्षा करने के लिए धारण करो. (१७)
नि येन मुष्टिहत्यया नि वृत्रा रुणधामहै. त्वोतासो न्यर्वता.. (१८)
हे इंद्र! हम तुम्हारे द्वारा रक्षित हो कर घोड़ों के स्वामी बनें तथा वृत्र के समान शक्ति
वाले शत्रुओं को भी नष्ट कर डालें. (१८)
इन्द्र त्वोतास आ वयं वज्रं घना ददीमहि. जयेम सं युधि स्पृधः.. (१९)
हे इंद्र! हम तुम्हारे द्वारा रक्षित हैं. हम तुम्हारे विकराल बल को धारण करते हुए अपने
शत्रुओं को नष्ट कर डालें. (१९)
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