अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-५४ देवता—सौमनस्य
बृहस्पति पश्चिम दिशा से, उत्तर दिशा से तथा नीचे वाले स्थान से हिंसा करने वाले पुरुष
से मेरी रक्षा करें. इंद्र पूर्व दिशा से तथा बीच के स्थान से हमारी रक्षा करें. मित्र बने हुए इंद्र
हम स्तोताओं के लिए अधिक धन प्रदान करें. (१)
सूक्त-५४ देवता—सौमनस्य
संज्ञानं नः स्वेभिः संज्ञानमरणेभिः. संज्ञानमश्विना युवमिहास्मासु नि
यच्छतम्.. (१)
अपने लोगों के साथ हमारा एकमत हो तथा अनुकूल न बोलने वाले अर्थात् प्रतिकूल
पुरुषों के साथ हम समान ज्ञान वाले हों. हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों इस समय इस विषय में
अपने और परायों के साथ हमें एकमत बनाओ. (१)
सं जानामहै मनसा सं चिकित्वा मा युष्महि मनसा दैव्येन.
मा घोषा उत्स्थुर्बहुले विनिर्हते मेषुः पप्तदिन्द्रस्याहन्यागते.. (२)
हम अपने मन के साथ दूसरों के मन को संयुक्त करें और जाग कर दूसरों के कार्यों से
संगत बनें. हम देव संबंधी मन अर्थात् देवों के प्रति श्रद्धा रखने वाले मन के कारण दूसरों से
अलग न हों. अधिक कुटिलता संबंधी शब्द न उठें. दिन निकलने पर इंद्र के वज्र के समान
मर्मवेधी वाणी हमें सुनाई न दे. (२)
सूक्त-५५ देवता—आयु
अमुत्रभूयादधि यद् यमस्य बृहस्पतेअभिशस्तेरमुञ्चः.
प्रत्यौहतामश्विना मृत्युमस्मद् देवानाम्ने भिषजा शचीभिः.. (१)
हे बृहस्पति! परलोक में भवन वाले यमराज के शाप से तुम इस ब्रह्मचारी को छुड़ाते
हो. यमराज का शाप मरण का कारण है. हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से अश्विनीकुमार अपनी
क्रियाओं के द्वारा हमारे ब्रह्मचारी को मृत्यु के कारण से छुड़ाएं. (१)
सं क्रामतं मा जहीतं शरीरं प्राणापानौ ते सयुजाविह स्ताम्.
शतं जीव शरदो वर्धमानो ऽ ग्निष्टे गोपा अधिपा वसिष्ठः.. (२)
हे प्राण और अपान वायु! तुम दोनों आयु की कामना करने वाले मनुष्य के शरीर में
संक्रमण करो तथा उस के शरीर का त्याग मत करो. हे आयु की कामना करने वाले पुरुष!
तेरे इस शरीर में प्राण और अपान वायु संयुक्त रहें. इस के पश्चात तू सौ वर्ष तक जीवित रहे.
जीवित रहते हुए तेरे हवि आदि से समृद्ध होते हुए अग्नि देव तेरी रक्षा करने वाले, तुझे अपना
समझने वाले तथा निवास स्थान देने वाले हों. (२)
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आयुर्यत् ते अतिहितं पराचैरपानः प्राणः पुनरा ताविताम्.
अग्निष्टदाहार्निर्ऋतेरुपस्थात् तदात्मनि पुनरा वेशयामि ते.. (३)
हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! तुम्हारा जो जीवन तुम्हें छोड़ कर और तुम्हारा
अतिक्रमण कर के गया है, वह प्राण और अपान वायु की कृपा से पुनः वापस आ जाए. उस
आयु का अग्नि ने निकृष्ट गति वाली मृत्यु के पास से हरण कर लिया है. अग्नि के द्वारा हरण
कर के लाई गई उस आयु को मैं तेरे शरीर में पुनः स्थापित करता हूं. (३)
मेमं प्राणो हासीन्मो अपानो ऽ वहाय परा गात्.
सप्तर्षिभ्य एनं परि ददामि त एनं स्वस्ति जरसे वहन्तु.. (४)
प्राण वायु इस आयु चाहने वाले पुरुष का त्याग न करे तथा अपान वायु भी इसे छोड़
कर न जाए. मैं इस पुरुष को रक्षा के हेतु सप्त ऋषियों के लिए सौंप रहा हूं. वे सात ऋषि
अर्थात् सात प्राण इसे वृद्धावस्था तक ले जाएं. (४)
प्र विशतं प्राणापानावड्वान्वाविव व्रजम्.
अयं जरिम्णः शेवधिररिष्ट इह वर्धताम्.. (५)
हे प्राण और अपान वायु! जिस प्रकार गाड़ी को खींचने वाले बैल गोठ में प्रवेश करते
हैं, उसी प्रकार तुम आयु चाहने वाले पुरुष के शरीर में प्रवेश करो. वह आयु चाहने वाला
पुरुष वृद्धावस्था की निधि बने. वह इस लोक में मृत्यु की बाधा से रहित हो कर जीवित रहे
एवं वृद्धि को प्राप्त करे. (५)
आ ते प्राणं सुवामसि परा यक्ष्मं सुवामि ते.
आयुर्नो विश्वतो दधदयमग्निवरेण्यः.. (६)
हे आयु चाहने वाले पुरुष! हम तेरे प्राण को वापस बुलाते हैं. हम तेरी आयु के
प्रतिबंधक यक्ष्मा रोग को पीछे हटने के लिए प्रेरित करते हैं. वे वरेण्य एवं हवन किए जाते हुए
अग्नि देव हमारे इस यजमान को सभी प्रकार से सौ वर्ष की आयु प्रदान करें. (६)
उद् वयं तमस्परि रोहन्तो नाकमृत्तमम्.
देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्.. (७)
पाप से ऊपर उठे हुए हम उत्तम एवं दुःख रहित स्वर्ग में आरोहण करें. इस के पश्चात
हम उत्तम एवं ज्योतिरूप में प्रकाशित सूर्य देव के समीप जाएं. (७)
सूक्त-५६ देवता—इंद्र
ऋचं साम यजामहे याभ्यां कर्माणि कुर्वते.
एते सदसि राजतो यज्ञं देवेषु यच्छतः.. (१)
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