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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-४६ देवता—इंद्र

सूक्त-४६ देवता—इंद्र
प्रणेतारं वस्यो अच्छा कर्तारं ज्योतिः समत्सु. सासह्वांसं युधा ऽ मित्रान्..
(१)
वे इंद्र नेता, युद्ध क्षेत्र में शत्रुओं को वश में करने वाले और यज्ञों में प्रकाश करने वाले हैं.
(१)
स नः पप्रिः पारयाति स्वस्ति नावा पुरुहूतः. इन्द्रो विश्वा अति द्विषः.. (२)
इंद्र अपनी कल्याणकारिणी नाव के द्वारा हमें पार लगाते हुए शत्रुओं से हमारी रक्षा करें.
(२)
स त्वं न इन्द्र वाजेभिर्दशस्या च गातुया च. अच्छा च नः सुम्नं नेषि.. (३)
हे इंद्र! तुम अपनी दसों उंगलियों से हमारे सामने उस सुख को लाते हो, जो अन्न आदि
से संपन्न है. (३)
सूक्त-४७ देवता—इंद्र
तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे. स वृषा वृषभो भुवत्.. (१)
कामनाओं की वर्षा करने वाले इंद्र सभी देवों से श्रेष्ठ बनें. हम वृत्र राक्षस का नाश करने
के लिए इंद्र को शक्तिशाली बनाते हैं. (१)
इन्द्रः स दामने कृत ओजिष्ठः स मदे हितः. द्युम्नी श्लोकी स सोम्यः.. (२)
इंद्र प्रशंसनीय, सौम्य, तेजस्वी, बलवान तथा दूसरों को प्रसन्न करने वाले हैं. (२)
गिरा वज्रो न संभृतः सबलो अनपच्युतः. ववक्ष ऋष्वो अस्तृतः.. (३)
इंद्र अच्छे लोगों को धन देते हैं. वज्रधारी इंद्र शक्तिशाली एवं अविनाशी हैं. (३)
इन्द्रमिद् गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः. इन्द्रं वाणीरनूषत.. (४)
स्तोताओं की वाणी इंद्र की स्तुति करती हैं, सामगान के इच्छुक किस के यश का गान
करते हैं? पूजा संबंधी मंत्रों के द्वारा इंद्र का ही पूजन किया जाता है. (४)
इन्द्र इद्धर्योः सचा संमिश्ल आ वचोयुजा. इन्द्रो वज्री हिरण्ययः.. (५)
इंद्र के घोड़े सदा उन के साथ रहते हैं. ऋत्विजों के मंत्रों के उच्चारण के साथ ही उन्हें
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रथ में जोड़ा जाता है. वज्र धारण करने वाले इंद्र सोने के समान कांति वाले हैं. (५)
इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्यं रोहयद् दिवि. वि गोभिरद्रिमैरयत्.. (६)
इंद्र ने सूर्य को आकाश में इसलिए स्थापित किया कि सब लोग उन का दर्शन कर सकें.
वे ही इंद्र सूर्य के रूप में मेघों का भेदन करते हैं. (६)
आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम्. इदं बर्हिः सदो मम.. (७)
हे इंद्र! हम ने सोम तैयार कर लिया है. तुम इन बिछी हुई कुशाओं पर बैठ कर सोमरस
पियो. (७)
आ त्वा ब्रह्मयुजा हरी वहतामिन्द्र केशिना. उप ब्रह्माणि नः शृणु.. (८)
हे इंद्र! ऋत्विजों के मंत्रोच्चारण के साथ ही तुम्हारे घोड़े रथ में जोड़े जाते हैं. वे घोड़े
तुम्हें उस स्थान पर ले जाने में समर्थ हैं, जहां तुम जाना चाहते हो. तुम्हारे घोड़े तुम्हें हमारे
यज्ञ में लाएं और तुम हमारे स्तोत्रों को सुनो. (८)
ब्रह्माणस्त्वा वयं युजा सोमपामिन्द्र सोमिनः. सुतावन्तो हवामहे.. (९)
हे इंद्र! हम तुम्हारे उपासक हैं. हम ने सोमपान किया है. तैयार किया हुआ सोमरस
हमारे पास रखा है. इसी कारण हम तुम्हें सोमरस पीने को बुलाते हैं. (९)
युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः. रोचन्ते रोचना दिवि.. (१०)
हे इंद्र! तुम्हारा रथ सभी प्राणियों को लांघता हुआ चलता है. तुम्हारे रथ में जुड़े हुए हरे
रंग अथवा हरि नाम वाले घोड़े आकाश में चमकते हैं. (१०)
युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे. शोणा धृष्णू नृवाहसा.. (११)
इंद्र के सारथी रथ में घोड़ों को जोड़ते हैं. ये घोड़े रथ के दोनों ओर रहते हैं. ये घोड़े
कामना करने योग्य हैं एवं इंद्र की यात्रा पूर्ण करने में समर्थ हैं. (११)
केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे. समुषद्भिरजायथाः.. (१२)
हे मनुष्यो! ये सूर्यरूपी इंद्र अज्ञानियों को ज्ञान देते हैं तथा अंधकार से ढके पदार्थों को
प्रकाशित करते हैं. ये अपनी किरणों के साथ उदय हुए हैं. हे मनुष्यो! इन सूर्यरूपी इंद्र के
दर्शन करो. (१२)
उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्यम्.. (१३)

सूर्य की किरणें सभी प्राणियों को जाग्रत करती हैं. प्राणी सूर्य रूपी इंद्र का दर्शन कर
सकें, इसलिए ये किरणें सूर्य को ऊपर उठाती हैं. (१३)
अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः. सूराय विश्वचक्षसे.. (१४)
जिस प्रकार रात के बीतते ही चोर भाग जाते हैं, उसी प्रकार सूर्य के उदय होते ही
आकाश से तारे भाग जाते हैं. (१४)
अदृश्रन्नस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु. भ्राजन्तो अग्नयो यथा.. (१५)
सूर्य की किरणें ज्ञान देने वाली एवं अग्नि के समान दीप्त हैं. ये किरणें मनुष्यों का
अनुकरण करती हैं. (१५)
तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य. विश्वमा भासि रोचन.. (१६)
हे इंद्र! तुम संसार रूपी नाव के समान हो. तुम सब को देखने वाले हो, सब को ज्योति
प्रदान करते हो और सब के प्रकाशक हो. (१६)
प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषीः. प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे.. (१७)
हे इंद्र! तुम मनुष्यों और देवों के कल्याण के लिए उदय होते हो. तुम सब के सामने
प्रकाशित होते हो. (१७)
येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु. त्वं वरुण पश्यसि.. (१८)
हे पाप का नाश करने वाले इंद्र! जो पुरुष प्राचीन काल के पुण्यात्मा लोगों के मार्ग पर
चलते हैं, तुम उन्हें सदैव कृपा की दृष्टि से देखते हो. (१८)
वि द्योमेषि रजस्पृथ्वहर्मिमानो अक्तुभिः. पश्यंजन्मानि सूर्य.. (१९)
हे इंद्र! तुम सब पर कृपा करते हो तथा उन्हें देखते हुए रात्रि और दिन का निर्माण करते
हो. तुम तीनों लोकों में विचरण करते हो. (१९)
सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य. शोचिष्केशं विचक्षणम्.. (२०)
हे सूर्यरूपी इंद्र! तुम्हारी चमकती हुई सात किरणें घोड़ों के रूप में तुम्हारे रथ में जुड़ी
रहती हैं. वे ही तुम्हारा वहन करती हैं. (२०)
अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्यः. ताभिर्याति स्वयुक्तभिः.. (२१)
इंद्र ने सात घोड़ों को अपने रथ में जोड़ा है. घोड़े इंद्र की इच्छा के अनुसार अपने ढंग से
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