अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-३३ देवता—जल
सारा संसार आकाश से चारों ओर से घिरा हुआ है. यह संसार पृथ्वी पर आश्रित है. मैं
संसार के धन के रूप में स्थित द्युलोक को तथा पृथ्वी को नमस्कार करता हूं. (४)
सूक्त-३३ देवता—जल
हिरण्यवर्णाः शुचयः पावका यासु जातः सविता यास्वाग्निः.
या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु.. (१)
सोने के रंग की शुद्ध अग्नियां एवं सविता जिन जलों से उत्पन्न हुए हैं, बादलों में स्थित
जिन जलों में विद्युत रूपी अग्नि तथा सागर में स्थित जिन जलों में वाडवाग्नि उत्पन्न हुई है,
जिन शोभन रंग वाले जलों ने अग्नि को गर्भ के रूप में धारण किया है, वे जल हमारे लिए
रोग नाशक और सुखकारक हों. (१)
यासां राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यन् जनानाम्.
या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु.. (२)
राजा वरुण जिन जलों के मध्य में स्थित हो कर मनुष्यों के सत्य और असत्य को जानते
हुए चलते हैं, जिन शोभन वर्ण वाले जलों ने अग्नि को गर्भ के रूप में धारण किया है, वे जल
हमारे लिए रोग के नाशक और सुखकारक हों. (२)
यासां देवा दिवि कृण्वन्ति भक्षं या अन्तरिक्षे बहुधा भवन्ति.
या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु.. (३)
इंद्र आदि देव जिन जलों के सार रूप अमृत को द्युलोक में भक्षण करते हैं तथा जो जल
अनेक प्रकार से स्थित रहते हैं, जिन शोभन वर्ण वाले जलों ने अग्नि को गर्भ के रूप में धारण
किया है, वे जल हमारे लिए रोग के नाशक और सुखकारक हों. (३)
शिवेन मा चक्षुषा पश्यतापः शिवया तन्वोप स्पृशत त्वचं मे.
घृतश्चुतः शुचयो याः पावकास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु.. (४)
हे जल के अभिमानी देव! मुझे सुखकर दृष्टि से देखो तथा अपने कल्याणकारी शरीर से
मेरी देह का स्पर्श करो. जो जल अमृत को टपकाने वाले तथा पवित्र करने वाले हैं, वे हमारे
लिए रोग विनाशक और सुखकारी हों. (४)
सूक्त-३४ देवता—मधु, वनस्पति
इयं वीरुन्मधुजाता मधुना वा खनामसि.
मधोरधि प्रजातासि सा नो मधुमतस्कृधि.. (१)
यह सामने वर्तमान लता मधुर रस से युक्त भूमि में उत्पन्न हुई है. मैं इसे मधुर रूप वाले
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फावड़े आदि की सहायता से खोदता हूं. तू मुझ से उत्पन्न हुई है. तू हमें भी मधु रस से युक्त
बना. (१)
जिह्वाया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम्.
ममेदह क्रतावसो मम चित्तमुपायसि.. (२)
हे मधु लता! तू मेरी जीभ के अग्र भाग पर शहद के समान स्थित हो तथा जीभ की जड़
में मधु रस वाले मधु नामक जल वृक्ष के फूल के रूप में वर्तमान रह. तू केवल मेरे शरीर
व्यापार में लग तथा मेरे चित्त में आ. (२)
मधुन्मे निष्क्रमणं मधुन्मे परायणम्.
वाचा वदामि मधुमद् भूयासं मधुसन्दृशः.. (३)
हे मधु लता! तुम्हें धारण करने से मेरा निकट गमन दूसरों को प्रसन्न करने वाला हो तथा
मेरा दूर गमन दूसरों को प्रसन्न करे. मैं वाणी से मधुयुक्त हो कर तथा समस्त कार्यों के द्वारा
मधु के समान बन कर सब के प्रेम का पात्र बनूं. (३)
मधोरस्मि मधुत्तरो मदुघान्मधुमत्तरः.
मामित् किल त्वं वनाः शाखां मधुमतीमिव.. (४)
हे मधु लता! मैं तुझ से उत्पन्न होने वाले शहद से भी अधिक मधुर हूं. मैं शहद टपकाने
वाले पदार्थ से भी अधिक मधुर हूं. तुम निश्चय ही केवल मुझे उसी प्रकार प्राप्त हो जाओ,
जिस प्रकार शहद वाली डाल के पास लोग पहुंच जाते हैं. (४)
परि त्वा परितन्तुनेक्षुणागामविद्विषे.
यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः.. (५)
हे पत्नी! मैं तुझे सभी ओर व्याप्त एवं ईख के समान मधुर मधु के द्वारा आपस में प्रेम
के लिए प्राप्त हुआ हूं. (५)
सूक्त-३५ देवता—हिरण्य
यदाबध्नन् दाक्षायणा हिरण्यं शतानीकाय सुमनस्यमानाः.
तत् ते बध्नाम्यायुषे वर्चसे बलाय दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.. (१)
हे यजमान! दक्ष की संतान महर्षियों ने सौमनस्य को प्राप्त हो कर राजा शतानीक के
लिए जिस निर्दोष स्वर्ण को बांधा था, वही स्वर्ण मैं तेरी दीर्घ आयु, तेज, बल, एवं सौ वर्ष की
आयु पाने के लिए तुझे बांधता हूं. (१)
नैनं रक्षांसि न पिशाचाः सहन्ते देवानामोजः प्रथमजं ह्ये ३ तत्.
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यो बिभर्ति दाक्षायणं हिरण्यं स जीवेषु कृणुते दीर्घमायुः.. (२)
स्वर्ण बंधे हुए इस पुरुष को राक्षस और पिशाच पराजित नहीं कर सकते, क्योंकि यह
देवों का प्रथम उत्पन्न हुआ ओज है. दक्ष पुत्रों से संबंधित इस स्वर्ण को जो बांधता है, वह
प्राणियों के मध्य सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है. (२)
अपां तेजो ज्योतिरोजो बलं च वनस्पतीनामृत वीर्याणि.
इन्द्र इवेन्द्रियाण्यधि धारयामो अस्मिन् तद् दक्षमाणो बिभरद्धिरण्यम्..
(३)
मैं जलों के तेज, ज्योति, ओज और बल तथा वनस्पतियों का वीर्य उसी प्रकार धारण
करता हूं, जिस प्रकार इंद्र में इंद्रियों के असाधारण चिह्न वर्तमान हैं. इसीलिए वृद्धि प्राप्त
करता हुआ यह पुरुष हिरण्य धारण करे. (३)
समानां मासामृतुभिष्ट्वा वयं संवत्सरस्य पयसा पिपर्मि.
इन्द्राग्नी विश्वे देवास्ते ऽ नु मन्यन्तामहृणीयमानाः.. (४)
हे संपत्ति चाहने वाले पुरुष! मैं तुझे संवत्सरों की, महीनों की, ऋतुओं की एवं काल
संबंधी दूध की धार से पूर्ण करता हूं. इंद्र और अग्नि तथा समस्त देव क्रोध न करते हुए तुझे
संपन्नता की अनुमति दें. (४)