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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-३० देवता—दर्भमणि

सूक्त-३० देवता—दर्भमणि
यत् ते दर्भ जरामृत्युः शतं वर्मसु वर्म ते.
तेनेमं वर्मिणं कृत्वा सपत्नाञ्जहि वीर्यैः.. (१)
हे दर्भ! तेरी गांठों में सैकड़ों वृद्धावस्थाएं और मृत्यु व्याप्त हैं. तेरे पास वृद्धावस्था और
मृत्यु से बचाने वाला कवच है. उस कवच से रक्षा, जय आदि की कामना करने वाले पुरुष को
सुरक्षित कर के अपनी शक्तियों से इस राजा के शत्रुओं को मारो. (१)
शतं ते दर्भ वर्मणि सहस्रं वीर्याणि ते.
तमस्मै विश्वे त्वां देवा जरसे भर्त्वा अदुः.. (२)
हे दर्भमणि! तुम्हारी गांठों में सैकड़ों सुरक्षा कवच और शक्तियां विद्यमान हैं. सभी देवों
से रक्षा की कामना करने वाले इस राजा को वृद्धावस्था दूर करने के लिए तुम्हें दिया है. (२)
त्वामाहुर्देववर्म त्वां दर्भ ब्रह्मणस्पतिम्.
त्वामिन्द्रस्याहुर्वर्म त्वं राष्ट्राणि रक्षसि.. (३)
हे दर्भमणि! तुम्हें देवों का कवच और वेदों का रक्षक कहा गया है. तुम्हें इंद्रक कवच
बताया गया है. तुम राष्ट्रों की रक्षा करते हो. (३)
सपत्नाक्षयणं दर्भ द्विषतस्तपनं हृदः.
मणिं क्षत्रस्य वर्धनं तनूपानं कृणोमि ते.. (४)
हे दर्भमणि! तुम शत्रुओं का विनाश करने वाले तथा द्वेष करने वालों के हृदय को
संतप्त करने वाले हो. हे राजन्! मैं दर्भमणि को तुम्हारा रक्षक एवं शक्ति बढ़ाने वाला बनाता
हूं. (४)
यत् समुद्रो अभ्यक्रन्दत् पर्जन्यो विद्युता सह.
ततो हिरण्ययो बिन्दुस्ततो दर्भो अजायत.. (५)
जिस मेघ से जल बरसता है, उस से बिजली की गड़गड़ाहट के साथ हिरण्यमय बूंद
प्रकट हुई, उन्हीं से दर्भ उत्पन्न हुआ है. (५)
सूक्त-३१ देवता—औदुंबरमणि
औदुम्बरेण मणिना पुष्टिकाम्याय वेधसा.
पशूनां सर्वेषां स्फातिं गोष्ठे मे सविता करत्.. (१)
विधाता ने पशु, पुत्र, धन, शरीर आदि की कामना करने वाले पुरुष के लिए प्राचीन
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काल में उदुंबर अर्थात् गूलर की मणि के द्वारा इन्हें प्रदान करने का प्रयोग किया है. मैं उसी
उदुंबर मणि के द्वारा तेरी रक्षा करता हूं. सविता देव मेरी गोशाला में दो पैरों वाले मनुष्यों और
चार पैरों वाले पशुओं की वृद्धि करें. (१)
यो नो अग्निर्गार्हपत्यः पशूनामधिपा असत्.
औदुम्बरो वृषा मणिः सं मा सृजतु पुष्ट्या.. (२)
जो गार्हपत्य अग्नि है, वह हमारे पशुओं का पालनकर्ता है. मनचाहा फल देने वाली
उदुंबर मणि मेरे शरीर की वृद्धि तथा सभी प्रकार से पशुओं का पोषण करे. (२)
करीषिणीं फलवतीं स्वधामिरां च नो गृहे.
औदुम्बरस्य तेजसा धाता पुष्टिं दधातु मे.. (३)
विधाता देव गूलर की मणि के तेज के द्वारा मेरे शरीर की पुष्टि करें तथा मेरे घर में अन्न
तथा गोबर करने वाली गाएं प्रदान करें. (३)
यद् द्विपाच्च चतुष्पाच्च यान्यन्नानि ये रसाः.
गृहे ३ हं त्वेषां भूमानं बिभ्रदौदुम्बरं मणिम्.. (४)
उदुंबर मणि को धारण करता हुआ मैं दो पैरों वाले पुरुषों, चार पैरों वाले पशुओं, सभी
प्रकार के अन्नों तथा शहद, दूध आदि रसों की अधिकता को स्वीकार करूं. (४)
पुष्टिं पशूनां परि जग्रभाहं चतुष्पदां द्विपदां यच्च धान्यम्.
पयः पशूनां रसमोषधीनां बृहस्पतिः सविता मे नि यच्छात्.. (५)
उदुंबर मणि के तेज से तथा बृहस्पति और सविता देव की कृपा से मैं दो पैरों वाले
मनुष्यों, चार पैरों वाले पशुओं तथा गेहूं, जौ आदि अन्नों की अधिकता स्वीकार करूं. ये देव
मुझे पशुओं का दूध और ओषधियां अर्थात् जड़ीबूटियों का रस प्रदान करें. (५)
अहं पशूनामधिपा असानि मयि पुष्टं पुष्टपतिर्दधातु.
मह्यमौदुम्बरो मणिर्द्रविणानि नि यच्छतु.. (६)
पुष्टि की कामना करने वाला मैं दो पैरों वाले मनुष्यों तथा चार पैरों वाले पशुओं का
स्वामी बनूं. पशु आदि की पुष्टि की स्वामिनी उदुम्बर मणि मुझे स्वर्ण आदि धन प्रदान करे.
(६)
उप मौदुम्बरो मणिः प्रजया च धनेन च.
इन्द्रेण जिन्वितो मणिरा मागन्त्सह वर्चसा.. (७)
उदुंबर मणि मुझ को पुत्र, पौत्र आदि प्रजा और सोना, चांदी रूप धन से संपन्न करे. इंद्र
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के द्वारा प्रेरित उदुंबर मणि विशेष तेज के साथ मेरे समीप आए. (७)
देवो मणिः सपत्नहा धनसा धनसातये.
पशोरन्नस्य भूमानं गवां स्फातिं नि यच्छतु.. (८)
प्रकाश युक्त उदुंबर मणि शत्रुओं का हनन करने वाली, धनों का लाभ कराने वाली हो.
वह मणि मुझे पशुओं तथा अन्न की अधिकता तथा गायों की अधिकता प्रदान करे. (८)
यथाग्रे त्वं वनस्पते पुष्ट्या सह जज्ञिषे.
एवा धनस्य मे स्फातिमा दधातु सरस्वती.. (९)
हे वन का पालन करने वाली उदुंबर मणि! तुम जिस प्रकार ओषधियों और वनस्पतियों
की रचना के समय पुष्टि के साथ उत्पन्न हुई हो, उसी प्रकार तुम्हारे साधन से सरस्वती देवी
मुझे धन की अधिकता प्रदान करें. (९)
आ मे धनं सरस्वती पयस्फातिं च धान्यम्.
सिनीवाल्यु १ पा वहादयं चौदुम्बरो मणिः.. (१०)
सरस्वती देवी मेरे धन की, दूध की तथा अन्न की वृद्धि करें. अमावस्या की देवी
सिनीवाली तथा यह उदुंबर मणि धन आदि प्रदान करें. (१०)
त्वं मणीनामधिपा वृषासि त्वयि पुष्टं पुष्टपतिर्जजान.
त्वयी मे वाजा द्रविणानि सर्वौदुम्बरः स त्वमस्मत् सहस्वारादरातिममतिं
क्षुधं च.. (११)
हे उदुंबर मणि! तुम अन्य रक्षा साधनों की स्वामिनी हो. प्रजापति ने तुम को गाय, घोड़ा
आदि की पुष्टि की क्षमता प्रदान की है. तुम में ये सभी घोड़े और अन्न व्याप्त हैं. तुम इन सब
को पराजित करो. तुम शत्रु तथा दरिद्रता को हम से दूर करो. तुम बुद्धि के अभाव और भूख
को हम से दूर करो. (११)
ग्रामणीरसि ग्रामणीरुत्थायाभिषिक्तो ऽ भि मा सिञ्च वर्चसा.
तेजो ऽ सि तेजो मयि धारयाधि रयिरसि रयिं मे धेहि.. (१२)
हे उदुंबर मणि! तुम गाय की स्वामिनी हो. तुम हमारी सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करो.
तुम तेज से अभिषिक्त हो, उठ कर मुझे भी तेज से सिंचित करो. तुम तेज रूप हो, मुझ में भी
तेज धारण करो. तुम धन प्राप्त करने वाली हो, मुझे भी धन प्राप्त कराओ. (१२)
पुष्टिरसि पुष्ट्या मा समङ्ग्धि गृहमेधी गृहपतिं मा कृणु.
औदुम्बरः स त्वमस्मासु धेहि रयिं च नः सर्ववीरं नि यच्छ रायस्पोषाय प्रति
मुञ्चे अहं त्वाम्.. (१३)
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हे उदुंबर मणि! तुम पुष्टि हो, मुझे भी पुष्टि से युक्त करो. तुम गृहमेधी हो, मुझे गृहपति
बनाओ. तुम हमें धन प्रदान करो. तुम हमें ऐसा धन प्रदान करो, जिस से हमारे पुत्र, पौत्र,
सेवक आदि पुष्ट हों. हे मणि! मैं तुझे धनों की वृद्धि के लिए बांधता हूं. (१३)
अयमौदुम्बरो मणिवीरो वीराय बध्यते.
स नः सनिं मधुमतीं कृणोतु रयिं च नः सर्ववीरं नि यच्छात्.. (१४)
अमित्रों का विनाश करने वाली यह उदुंबर मणि वीरता को प्राप्त करने के लिए बांधी
जाती है. यह मणि हमारी उपलब्धि को मधुमती करे. यह हमारे सभी वीरों अर्थात् पुत्र, पौत्र
आदि को धन प्रदान करे. (१४)
सूक्त-३२ देवता—दर्भ
शतकाण्डो दुश्च्यवनः सहस्रपर्ण उत्तिरः.
दर्भो य उग्र ओषधिस्तं ते बध्नाम्यायायुषे... (१)
हे मृत्यु के भय से दुःखी पुरुष! मैं सौ गांठों वाली, दुःख में चबाने योग्य, हजार पुत्रों
वाली एवं उत्तम दर्भ उग्र ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी है, उसे मैं दीर्घ आयु प्राप्त करने के लिए
बांधता हूं. (१)
नास्य केशान् प्र वपन्ति नोरसि ताडमा घ्नते.
यस्मा अच्छिन्नपर्णेन दर्भेण शर्म यच्छति.. (२)
उस के केशों को मृत्यु दूत नहीं खींचते हैं तथा राक्षस, पिशाच आदि हृदय में चोट पहुंचा
कर उसी की हिंसा नहीं करते, जिसे प्रयोक्ता बिना कटे हुए पत्तों वाले दर्भ से बनी मणि सुख
पहुंचाती है. (२)
दिवि ते तूलमोधधे पृथिव्यामसि निष्ठितः.
त्वया सहस्रकाण्डेनायुः प्र वर्धयामहे.. (३)
हे सौ गांठों वाली दर्भ नामक ओषधि! तेरा ऊपर वाला भाग द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में है
तथा तू पृथ्वी पर स्थित है. इस प्रकार पृथ्वी से स्वर्ग तक व्याप्त होने वाली तथा हजार गांठों
वाली दर्भ नाम की ओषधि के द्वारा मैं तेरी आयु को बढ़ाता हूं. (३)
तिस्रो दिवो अत्यतृणत् तिस्र इमाः पृथिवीरुत.
त्वयाहं दुर्हार्दो जिह्वां नि तृणद्मि वचांसि.. (४)
हे हजार गांठों वाली ओषधि दर्भ! तू तीन स्वर्गों का अतिक्रमण गई है तथा तूने इन तीन
पृथ्वियों का अतिक्रमण किया है. मैं तेरे द्वारा उस की जीभ को लपेटता हूं जो मेरे प्रति
दुर्भावना रखता है तथा उस के वचनों को बांधता हूं. (४)
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त्वमसि सहमानो ऽ हमस्मि सहस्वान्.
उभौ सहस्वन्तौ भूत्वा सपत्नान्सहिषीवहि.. (५)
हे सौ गांठों वाली ओषधि दर्भ! तुम शत्रुओं को वश में करने वाली हो तथा मैं शत्रु की
हिंसा के साधन और बल से युक्त हूं. हम दोनों शत्रु को दबा के स्वभाव वाले हो कर अपने
शत्रुओं को पराजित करें. (५)
सहस्व नो अभिमातिं सहस्व पृतनायतः.
सहस्व सर्वान् दुर्हर्दः सुहार्दो मे बहून् कृधि.. (६)
हे सौ गांठों वाली ओषधि दर्भ! हमारे शत्रुओं अथवा पापों को पराजित करो. जो लोग
हमारे विरुद्ध सेना एकत्र कर रहे हैं, उन को भी पराजित करो. मेरे प्रति दुर्भावना रखने वाले
व्यक्तियों का विनाश करो और मेरे मित्रों की संख्या बढ़ाओ. (६)
दर्भेण देवजातेन दिवि ष्टम्भेन शश्वदित्.
तेनाहं शश्वतो जनाँ असनं सनवानि च.. (७)
देवों के समीप से उत्पन्न, द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में स्थित रहने वाले दर्भ के द्वारा मैं सर्वदा
दीर्घजीवी जनों को प्राप्त करूं. (७)
प्रियं मा दर्भ कृणु ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च.
यस्मै च कामयामहे सर्वस्मै च विपश्यते.. (८)
हे दर्भ! मुझ धारणकर्ता को ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र तथा श्रेष्ठ जनों का प्रिय बनाओ.
अनुलोम और प्रतिलोम जाति के मध्य जिन लोगों को मैं अपना प्रिय बनाना चाहूं, पाप
अन्वेषण करने वाले उस पुरुष को मेरा प्रिय बनाओ. (८)
यो जायमानः पृथिवीमदृंहद् यो अस्तभ्नादन्तरिक्षं दिवं च.
यं बिभ्रतं ननु पाप्मा विवेद् स नो ऽ यं दर्भो वरुणो दिवा कः.. (९)
जिस दर्भ ने उत्पन्न होते ही पृथ्वी को दृढ़ किया था तथा जिस ने अंतरिक्ष और द्युलोक
अर्थात् स्वर्ग को स्थिर किया, उस दर्भ को जानने वाले को पाप स्पर्श नहीं करता. इस प्रकार
का अंधकार निवारक दर्भ हमें प्रकाश दे. (९)
सपत्नहा शतकाण्डः सहस्वानोषधीनां प्रथमः सं बभूव.
स नोऽयं दर्भः परि पातु विश्वतस्तेन साक्षीय पृतनाः पृतन्यतः.. (१०)
शत्रुओं का विनाश करने वाला, सौ गांठों से युक्त एवं शक्तिशाली दर्भ सभी ओषधियों
अर्थात् जड़ीबूटियों से पहले उत्पन्न हुआ है. इस प्रकार का दर्भ सभी दिशाओं के भयों से
हमारी रक्षा करें. उस दर्भमणि की सहायता से मैं उस सेना को पराजित करूं, जिसे मेरा शत्रु
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