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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-२७ देवता—विष्णु

अपनेअपने कार्यों का फल देखता है. इस के अतिरिक्त जगत् को प्रकाशित करने वाले विष्णु
और वरुण के धारक कर्म और बलों के साथ प्राचीन काल में चेष्टा करता था. इस प्रकार के
विष्णु और वरुण को फल चाहने वाले लोग अपने प्रथम आह्वान से जोड़ें. (२)
सूक्त-२७ देवता—विष्णु
विष्णोर्नु कं प्र वोचं वीर्याणि यः पार्थिवानि विममे रजांसि.
यो अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः.. (१)
मैं उन विष्णु के किन वीरतापूर्ण कर्मों का वर्णन करूं, जिन्होंने पृथ्वी के रूप में लोकों
का निर्माण किया है. विष्णु ने इस से भी ऊंचे स्तर के स्थान स्वर्ग को धारण किया है.
महापुरुषों द्वारा स्तुति किए गए विष्णु ने पृथ्वी, अंतरिक्ष और आकाश में चरण रखते हुए यह
निर्माण किया है. (१)
प्र तद् स्तवते वीर्याणि मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः.
परावत आ जगम्यात् परस्याः.. (२)
वीरतापूर्ण कर्मों के कारण विष्णु की स्तुति की जाती है. विष्णु सिंह के समान भयानक,
भूमि पर विचरण करने वाले एवं पर्वत में स्थित हैं. वे विष्णु मेरी स्तुति सुन कर दूर देश से भी
यहां आएं. (२)
यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वाधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा.
उरु विष्णो वि क्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि.
घृतं घृतयोने पिब प्रप्र यज्ञपतिं तिर.. (३)
उन विष्णु के तीन विस्तृत चरण विक्षेपों में सभी भुवन एवं प्राणी निवास करते हैं. हे
व्यापक विष्णु! तीनों लोकों में अपने तीन चरण रखने का पराक्रम करो तथा हमारे निवास
स्थान को धन संयुक्त बनाओ. हे घृत के कारण रूप विष्णु! यह हवन किया जाता हुआ घृत
पियो तथा यज्ञ के स्वामी यजमान की वृद्धि करो. विष्णु ने इस विश्व में विक्रम का प्रदर्शन
किया है. उन्होंने तीन बार अपने चरण स्थापित किए हैं. इन विष्णु के तीन चरण विक्षेपों में
सारा विश्व स्थापित है. (३)
इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदा. समूढमस्य पांसुरे.. (४)
सब के रक्षक और दूसरों के द्वारा पराजित न होने वाले विष्णु ने इस पृथ्वीलोक से
आरंभ कर के प्राणियों को धारण करने वाले तीनों लोक धारण किए. (४)
त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः. इतो धर्माणि धारयन्.. (५)

हे स्तोताओ! सर्व व्यापक विष्णु देव के उन कर्मों को देखो, जिन कर्मों के द्वारा उन्होंने
तुम्हारे कर्मों का स्पर्श किया. ये विष्णु इंद्र देव के योग्य सखा हैं. (५)
विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (६)
व्यापक विष्णु देव के उत्तम स्थान को मेधावी लोग देखते हैं. उन का स्थान आकाश में
सूर्य मंडल के समान विस्तृत है. (६)
तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः. दिवीव चक्षुराततम्.. (७)
हे विष्णु देव! पृथ्‍वी एवं द्युलोक से भी महान किसी अन्य लोक से अर्थात् विस्तीर्ण
अंतरिक्ष से लाए हुए बहुत से धनों से अपने हाथों को पूर्ण करो. इस के पश्चात हमारे सामने
आ कर अपने दाहिने और बाएं हाथों से हमें अधिक धनराशि प्रदान करो. (७)
दिवो विष्ण उत वा पृथिव्या महो विष्ण उरोरन्तरिक्षात्.
हस्तौ पृणस्व बहुभिर्वसव्यैराप्रयच्छ दक्षिणादोत सव्यात्.. (८)
हे विष्णु देव! आप अपने दोनों हाथों के द्वारा द्युलोक, भूलोक और अंतरिक्ष लोक से
हमें बहुत से साधन प्रदान करो. (८)
सूक्त-२८ देवता—इडा
इडैवास्मां अनु वस्तां व्रतेन यस्याः पदे पुनते देवयन्तः.
घृतपदी शक्वरी सोमपृष्ठोप यज्ञमस्थित वैश्वदेवी.. (१)
गहन रूपा इडा ही हमारे द्वारा किए जाते हुए यह कर्मों को फल देने वाला बनाएं. उस
इडा के चरणों में देवों की कामना करने वाले यजमान अपनेआप को पवित्र करते हैं. हम
जहांजहां चरण रखें वहांवहां घृत टपकाने वाली, फल देने में समर्थ एवं पीठ पर सोम लिए
हुए इडा नाम की बहन हमारे यज्ञ को विस्तृत करें. (१)
सूक्त-२९ देवता—झंडा
वेदः स्वस्तिर्दुघणः स्वस्तिः परशुर्वेदिः परशुर्नः स्वस्ति.
हविष्कृतो यज्ञिया यज्ञकामास्ते देवासो यज्ञमिमं जुषन्ताम्.. (१)
वेद (दर्भ समूह) हमारे लिए अविनाश का कारण बने. पेड़ काटने के काम आने वाली
कुल्हाड़ी हमारा कल्याण करे. घास काटने का साधन वेदि अर्थात् खुरपी तथा परशु हमारा
कल्याण करे. हवि का निर्माण करने वाले, यज्ञ के योग्य एवं यज्ञ की कामना करते हुए मुझ
यजमान का यज्ञ वे देव स्वीकार करें. (१)
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