अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-१ देवता—वरुण
पांचवां कांड
सूक्त-१ देवता—वरुण
ऋधङ्मन्त्रो योनिं य आबभूवामृतासुर्वर्धमानः सुजन्मा.
अदब्धासुभ्राजमानो ऽ हेव त्रितो धर्ता दाधार त्रीणि (१)
जिस के प्राण मरण रहित हैं, जो जन्म ले कर बढ़ता है, कोई भी जिस की हिंसा नहीं
कर सकता, जो दिन के समान प्रकाश वाला है, जो तीनों लोकों का धारणकर्ता और पालक
है, वह योनि से उत्पन्न हुआ है. (१)
आ यो धर्माणि प्रथमः ससाद ततो वपूंषि कृणुषे पुरूणि.
धास्युर्योनिं प्रथम आ विवेशा यो वाचमनुदितां चिकेत.. (२)
जो जीवात्मा सब से पहले धर्म का पालन करता है तथा इसी हेतु अनेक शरीरों को
धारण करता है, जो संज्ञाओं के द्वारा आकृष्ट वाणी का निर्माण करता है, वह अन्न की इच्छा
से योनि में सब से पहले प्रवेश करता है. (२)
यस्ते शोकाय तन्वं रिरेच क्षरद्धिरण्यं शुचयो ऽ नु स्वाः.
अत्रा दधेते अमृतानि नामास्मे वस्त्राणि विश एरयन्ताम्.. (३)
हे वरुण! जो जीवात्मा तुम्हारे निमित्त धर्म पालन हेतु कष्ट सहता हुआ सुवर्ण के समान
अपनी कीर्ति फैलाने के लिए शरीर में आया है, उसे द्यावा पृथ्वी अमरत्व प्रदान करते हैं तथा
प्रजाएं वस्त्र देती हैं. (३)
प्र यदेते प्रतरं पूर्व्यं गुः सदःसद अतिष्ठन्तो अजूर्यम्.
कविः शुषस्य मातरा रिहाणे जाम्यै धुर्यं पतिमेरयेथाम्.. (४)
जो उत्तम स्थान पर बैठ कर उस परमात्मा का चिंतन करते हैं, जो ब्राह्मण के हितैषी हैं
तथा उसे प्राप्त कर चुके हैं, वे लोक परमात्मा की उपासना करके उस स्त्री को भी ईश्वर के
दर्शन कराएं, जो प्रजा को अपनी बहन समझ कर उस का भार वहन करती है. (४)
तदू षु ते महत् पृथुज्मन् नमः कविः काव्येना कृणोमि.
यत् सम्यञ्चावभियन्तावभि क्षामत्रा मही रोधचक्रे वावृधेते.. (५)
पृथ्वी को स्थिर रखने वाले दो राजा पहिए के समान तेज चाल से आगे बढ़ रहे हैं. हे
पृथ्वी! मैं अथर्ववेद का ज्ञाता ब्राह्मण हूं और तुम्हारे लिए अन्न भेंट करता हूं. (५)
सप्त मर्यादाः कवयस्ततक्षुस्तासामिदेकामभ्यं हुरो गात्.
आयोर्ह स्कम्भ उपमस्य नीडे पथां विसर्गे धरुणेषु तस्थौ.. (६)
मनु आदि ऋषियों ने चोरी, गुरुपत्नीगमन, ब्रह्महत्या, भ्रूणहत्या, मद्यपान, मिथ्याभाषण
एवं पापकर्म — इन सात कर्मों के रूप में धार्मिक, मर्यादा निश्चित की है. जो इस मर्यादा को
नहीं मानता, वह पापी है. इन सात मर्यादाओं का पालन करने वाला पुरुष मृत्यु के पश्चात सूर्य
मंडल में स्थित आदित्य को प्राप्त करता है और प्रलय काल तक वहीं स्थित रहता है. (६)
उतामृतासुर्व्रत एमि कृण्वन्नसुरात्मा तन्व १ स्तत् समुद्गुः.
उत वा शक्रो रत्नं दधात्यूर्जया वा यत् सचते हविर्दाः.. (७)
शरीर से संबंधित जो स्वयं प्रकाश उभरता है, मैं उसी का व्रती हूं. मैं अपने बल के सहारे
आ रहा हूं. जो व्यक्ति इंद्र को शक्ति वाला हवि देता है, इंद्र उसे रत्न आदि धन प्रदान करते हैं.
(७)
उत पुत्रः पितरं क्षत्रमीडे ज्येष्ठं मर्यादमह्वयन्त्स्वस्तये.
दर्शन् नु ता वरुण यास्ते विष्ठा आवर्व्रततः कुणवो वपूंषि.. (८)
क्षत्रिय जाति का पुत्र अपने पिता की पूजा करे तथा उत्तम कल्याण पाने के लिए धर्म
पालन में प्रवृत्त हो. हे वरुण! अनेक स्थानों को दिखाते हुए तुम सांसारिक जीवों की रचना
करते हो. (८)
अर्धमर्धेन पयसा पृणक्ष्यर्धेन शुष्म वर्धसे अमुर.
अविं वृधाम शग्मियं सखायं वरुणं पुत्रमदित्या इषिरम्.
कविशस्तान्यस्मै वपूंष्यवोचाम रोदसी सत्यवाचा.. (९)
मित्र और वरुण अदिति के पुत्र हैं. हम इन दोनों की वृद्धि करते हैं. हे वरुण! तुम आधे
दूध, घृत आदि से इस सेना का बल बढ़ाते हो और आधे से अपनी वृद्धि करते हो. हे आकाश
और पृथ्वी के देवो! विद्वान् ऋषियों ने जिन शरीरों का वर्णन किया है, हम अपनी सत्य वाणी
से उन्हीं का वर्णन करते हैं. (९)
सूक्त-२ देवता—वरुण
तदिदास भुवनेषु ज्येष्ठं यतो जज्ञ उग्रस्त्वेष्णृम्णः.
सद्यो जज्ञानो नि रिणाति शत्रूननु यदेनं मदन्ति विश्व ऊमाः.. (१)
इंद्र संसार में धनवान एवं बली होने के कारण श्रेष्ठ माने जाते हैं. इंद्र ने जन्म लेते ही
शत्रु का संहार करना आरंभ कर दिया था, इसीलिए इन के सैनिक इन की रक्षा करते हैं एवं
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प्रसन्न रहते हैं. (१)
वावृधानः शवसा भूर्योजाः शत्रुर्मासाय भियसं दधाति.
अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि सं ते नवन्त प्रभृता मदेषु.. (२)
बढ़ता, शक्तिशाली एवं ओजस्वी शत्रु अपने दासों को भयभीत करता है. चर और अचर
सारा विश्व हम में लीन हो जाता है. वेतन पाने वाले सच्चे वीर युद्ध में परमात्मा की प्रार्थना
करते हैं. (२)
त्वे क्रतुमपि पृञ्चन्ति भूरि द्विर्यद्ते त्रिर्भवन्त्यूमाः.
स्वादोः स्वादीयः स्वादुना सृजा समदः सु मधु मधुनाभि योधीः.. (३)
हे इंद्र! जन्म, संस्कार और युद्ध की दीक्षा से तीन बातें मनुष्य के जन्म के साथ ही
निश्चित हो जाती हैं एवं विशाल यज्ञ को तुम तक पहुंचाती हैं. तुम सभी पदार्थों को उत्तम
स्वाद वाला बनाने वाले हो तुम हमारे पदार्थों को भी स्वादिष्ट बनाओ एवं सुंदर रीति से युक्त
करो. (३)
यदि चिन्नु त्वा धना जयन्तं रणेरणे अनुमदन्ति विप्राः.
ओजीयः शुष्मिन्त्स्थिरमा तनुष्व मा त्वा दभन् दुरेवासः कशोकाः.. (४)
हे बलशाली इंद्र! तुम सभी युद्धों में विजय प्राप्त करते हो. यदि ब्राह्मण तुम्हारी स्तुति
करें तो तुम उन्हें स्थिर रहने वाला बल प्रदान करो. जो मुख्य सुखमय वातावरण को दुःखमय
बना देते हैं अथवा जिन की गति बुरी है, वे तुम तक न आ सकें. (४)
त्वया वयं शाशदमहे रणेषु प्रपश्यन्तो यधेन्यानि भूरि.
चोदयामि त आयुधा वचोभिः सं ते शिशामि ब्रह्मणा वयांसि.. (५)
हे इंद्र! तुम्हारी सहायता से हम युद्ध में अपने सभी विरोधियों को समाप्त कर देते हैं. मैं
तपस्या द्वारा सिद्ध अपनी वाणी से तुम्हारे शस्त्रों को प्रेरणा प्रदान करता हूं तथा तुम्हारी
गतिशील वाणी को तीखा बनाता हूं. (५)
नि तद् दधिषेऽवरे परे च यस्मिन्नाविथावसा दुरोणे.
आ स्थापयत मातरं जिगत्नुमत इन्वत कर्वराणि भूरि.. (६)
जिस घर में उत्तम एवं साधारण प्राणियों का पालन हुआ तथा जिस घर में अन्न द्वारा
उन की रक्षा की गई, उस घर में कालिका माता की गतिशील शक्ति की स्थापना करो. इस
प्रकार वह घर अद्भुत पदार्थों से पूर्ण हो जाएगा. (६)
स्तुष्व वर्मन् पुरुवर्त्मानं समृभ्वाणमिनतममाप्तमाप्त्यानाम्.
आ दर्शति शवसा भूर्योजाः प्र सक्षति प्रतिमानं पृथिव्याः.. (७)
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हे शरीरधारी पुरुष! तू उस राजा की स्तुति कर जो विचरण करने वाला, तेजस्वी, स्वामी
एवं उन गुणों से युक्त है, जो आप्त जनों में होते हैं. राजा पृथ्वी का प्रतिरूप है एवं युद्ध में
जुटा हुआ है. (७)
इमा ब्रह्म बृहद्दिवः कृणवदिन्द्राय शूषमग्रियः स्वर्षाः.
महो गोत्रस्य क्षयति स्वराजा तुरश्चिद् विश्वमर्णवत् तपस्वान्.. (८)
यह राजा स्वर्ग प्राप्ति की अभिलाषा से महान स्तोत्रों द्वारा इंद्र को प्रसन्न कर रहा है.
स्वर्ग के स्वामी इंद्र मेघों के द्वारा जल वर्षा कर के विश्व को जल से पूर्ण करते हैं. (८)
एवा महान् बृहद्दिवो अथर्वावोचत् स्वां तन्व १ मिन्द्रमेव.
स्वसारौ मातरिश्वरी अरिप्रे हिन्वन्ति चैने शवसा वर्धयन्ति च.. (९)
अपने शरीर को इंद्र मान कर महर्षि अथर्वा ने कहा था कि पाप रहित भगिनियां इसे
बल के द्वारा बढ़ाती हुई प्रसन्न करती हैं. (९)
सूक्त-३ देवता—अग्नि
ममाग्ने वर्चो विहवेष्वस्तु वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम.
मह्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रस्त्वयाध्यक्षेण पृतना जयेम.. (१)
हे अग्नि देव! युद्धों में हम वर्चस्वी बनें. हम तुम्हें प्रकट करते हुए अपने शरीर को
शक्तिशाली बनाएं. चारों दिशाएं और प्रदिशाएं हमारे सामने तथा आप के संरक्षण में शत्रुओं
की इस सेना पर विजय प्राप्त करें. (१)
अग्ने मन्युं प्रतिनुदन् परेषां त्वं नो गोपाः परि पाहि विश्वतः.
अपाञ्चो यन्तु निवता दुरस्यवो ऽ मैषां चित्तं प्रबुधां वि नेशत्.. (२)
हे अग्नि देव! तुम हजारों शत्रुओं का क्रोध समाप्त करते हुए सभी ओर से हमारी रक्षा
करो. हमें दुःख देने के इच्छुक लोग हमारे सामने नम्र बनें तथा हमारे सामने से चले जाएं. (२)
मम देवा विहवे सन्तु सर्व इन्द्रवन्तो मरुतो विष्णुरग्निः.
ममान्तरिक्षमुरुलोकमस्तु मह्यं वातः पवतां कामायास्मै.. (३)
इंद्र के साथ मरुत्, विष्णु और अग्नि आदि सभी देव युद्ध भूमि में मेरे अनुकूल बनें.
अंतरिक्ष में मेरा यशोगान गूंजे तथा वायु की गति मेरे अनुकूल हो. (३)
मह्यं यजन्तां मम यानीष्टाकूतिः सत्या मनसो मे अस्तु.
एनो मा नि गां कतमच्चनाहं विश्वे देवा अभि रक्षन्तु मेह.. (४)
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मैं जो इच्छा और संकल्प करता हूं, वह सत्य हो. मैं सभी प्रकार के पापों से दूर रहूं तथा
विश्वे देव मेरी रक्षा करें. (४)
मयि देवा द्रविणमा यजन्तां मय्याशीरस्तु मयि देवहूतिः.
दैवा होतारः सनिषन् न एतदरिष्टाः स्याम तन्वा सुवीराः.. (५)
मैं जिन देवों को बुलाता हूं, वे मुझे अन्न से संपन्न बनाएं. यज्ञ में देवों के होता हमारे
समीप बैठें, जिस से हम रोगरहित और शक्तिशाली बन सकें. (५)
दैवीः षडुर्वीरुरु नः कृणोत विश्वे देवास इह मादयध्वम्.
मा नो विददभिभा मो अशस्तिर्मा नो विदद् वृजिना द्वेष्या या.. (६)
हे विश्वे देव! आप सब हमारे लिए पृथ्वी, आकाश, जल, ओषधि, दिन और रात—इन
छह दिव्य शक्तियों को बढ़ाइए. आप प्रसन्न हों, जिस से कोई न हमारा तिरस्कार करे और न
हमारी निंदा करे. हमें पाप न लगे. (६)
तिस्रो देवीर्महि नः शर्म यच्छत प्रजायै नस्तन्वे ३ यच्च पुष्टम्.
मा हास्महि प्रजया मा तनूभिर्मा रधाम द्विषते सोम राजन्.. (७)
भारती, सरस्वती और पृथ्वी—ये तीन देवियां हमारा कल्याण करें. हमारी प्रजाएं पोषक
पदार्थ पा कर पुण्य शरीर वाली हों. हे तेजस्वी सोम! हम संतान एवं पशुओं से हीन न हों तथा
शत्रु हमें दुःख न दें. (७)
उरुव्यचा नो महिषः शर्म यच्छत्वस्मिन् हवे पुरुहूतः पुरुक्षु.
स नः प्रजायै हर्यश्व मृडेन्द्र मा नो रीरिषो मा परा दाः.. (८)
हे इंद्र! तुम नदी के समान गतिशील, गुणसंपन्न एवं अन्न के स्वामी हो. तुम हमें इस यज्ञ
के कारण सुख प्रदान करो. तुम हमारी संतान का नाश मत करो तथा हमारा त्याग मत करो.
(८)
धाता विधाता भुवनस्य यस्पतिर्देवः सविताभिमातिषाहः.
आदित्या रुद्रा अश्विनोभा देवाः पान्तु यजमानं निर्ऋथात्.. (९)
धाता, विधाता, संसार के स्वामी एवं शत्रुहंता सविता देव, आदित्य, रुद्र तथा दोनों
अश्विनीकुमार यजमान को पाप से बचाएं और उग्र शत्रुओं से रक्षा करें. (९)
ये नः सपत्ना अप ते भवन्त्विन्द्राग्निभ्यामव बाधामह एनान्.
आदित्या रुद्रा उपरिस्पृशो न उग्रं चेत्तारमधिराजमक्रत.. (१०)
जो हमारे शत्रु हैं, वे हम से दूर भाग जाएं. हम इंद्र और अग्नि के द्वारा अपने शत्रुओं को
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