अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-१ देवता—मधु, अश्विनीकुमार
नौवां कांड
सूक्त-१ देवता—मधु, अश्विनीकुमार
दिवस्पृथिव्या अन्तरिक्षात् समुद्रादग्नेर्वातान्मधुकशा हि जज्ञे.
तां चायित्वामृतं वसानां हृद्भिः प्रजाः प्रति नन्दन्ति सर्वाः.. (१)
स्वर्ग, पृथ्वी, अंतरिक्ष, सागर और अग्नि से मधुकशा गौ उत्पन्न हुई. अमृत को धारण
करने वाली उस मधुकशा गौ का सच्चे मन से पूजन करने वाली समस्त प्रजाएं संतुष्ट होती हैं.
(१)
महत् पयो विश्वरूपमस्याः समुद्रस्य त्वोत रेत आहुः.
यत ऐति मधुकशा रराणा तत् प्राणस्तदमृतं निविष्टम्.. (२)
इस मधुकशा गौ के विश्व रूपी महान दूध को सागर का बल कहा गया है. स्तुतियों से
आकर्षित हो कर यह मधुकशा गौ जिधर जाती है, वहां रहने वालों के प्राणों में अमृत स्थापित
हो जाता है. (२)
पश्यन्त्यस्याश्चरितं पृथिव्यां पृथङ्नरो बहुधा मीमांसमानाः.
अग्नेर्वातान्मधुकशा हि जज्ञे मरुतामुग्रा नप्तिः.. (३)
पृथ्वी पर मनुष्य मधुकशा गौ के चरित्रों की अनेक प्रकार से मीमांसा करते हैं एवं इसे
अनेक रूप वाली देखते हुए इसे मरुद्गण की प्रचंड पुत्री अग्नि और वायु से उत्पन्न हुई बताते
हैं. (३)
मातादित्यानां दुहिता वसूनां प्राणः प्रजानाममृतस्य नाभिः.
हिरण्यवर्णा मधुकशा घृताची महान् भर्गश्चरति मर्त्येषु.. (४)
यह मधुकशा गौ आदित्यों की माता, वसुओं की पुत्री, प्रजाओं का प्राण और अमृत की
नाभि हैं. सोने के रंग वाली मधुकशा घृत प्रदान करने वाली है. मनुष्यों में इस का महान तेज
विचरण करता है. (४)
मधोः कशामजनयन्त देवास्तस्या गर्भो अभवद् विश्वरूपः.
तं जातं तरुणं पिपर्ति माता स जातो विश्वा भुवना वि चष्टे.. (५)
देवों ने मधुकशा को जन्म दिया. उस का गर्भ विश्वरूप हुआ. तरुण रूप में उत्पन्न हुए
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विश्वरूप का उस की माता मधुकशा ने भरणपोषण किया. विश्वरूप ने उत्पन्न होते ही सारे
संसार को मोहित कर दिया. (५)
कस्तं प्र वेद क उ तं चिकेत यो अस्या हृदः कलशः सोमधानो अक्षितः.
ब्रह्मा सुमेधाः सो अस्मिन् मदेत.. (६)
उस विश्वरूप को कौन भलीभांति जानता है? उस का हृदय सोम को धारण करने के
लिए कलश रूप में अक्ष अर्थात् विनाश रहित रहता है, इस का साक्षात्कार किस को है?
शोभन बुद्धि वाले ब्रह्मा इस में आनंदित होते हैं. (६)
स तौ प्र वेद स उ तौ चिकेत यावस्याः स्तनौ सहस्रधारावक्षितौ.
ऊर्जं दुहाते अनपस्फुरन्तौ.. (७)
उस के थन कभी दूध से शून्य न होने वाले एवं दूध की हजार धाराएं बहाने वाले हैं. ये
थन सदैव दूध प्रदान करते रहते हैं. इन थनों को वही ब्रह्मा जानते हैं. (७)
हिङ्करिक्रती बृहती वयोधा उच्चैर्घोषा ऽ भ्येति या व्रतम्.
त्रीन् घर्मानभि वावशाना मिमाति मायुं पयते पयोभिः.. (८)
शब्द करने वाली एवं दूध के रूप में हवि धारण करने वाली मधुकशा गौ रंभाती हुई
कर्म क्षेत्र में आती है. वह गौ देवों का आश्रय प्राप्त करने वालों के शब्द को अपने दूध से
सशक्त बनाती है. (८)
यामापीनामुपसीदन्त्यापः शाक्वरा वृषभा ये स्वराजः.
ते वर्षन्ति ते वर्षयन्ति तद्विदे काममूर्जमापः.. (९)
मनोकामना की वर्षा करने वाले उज्ज्वल जल आते हैं, वे जल मधुकशा को जानने के
लिए शक्ति देने वाले अन्न देते हैं एवं अभिलाषा पूर्ण करते हैं. (९)
स्तनयित्नुस्ते वाक् प्रजापते वृषा शुष्मं क्षिपसि भूम्यामधि.
अग्नेर्वातान्मधुकशा हि जज्ञे मरुतामुग्रा नप्तिः.. (१०)
हे वर्षा करने वाले प्रजापति-पति! तुम्हारी वाणी बिजली के समान भड़कने वाली है.
तुम सारी पृथ्वी पर जल को सींचते हो. मरुतों की उग्र पुत्री मधुकशा का जन्म अग्नि और
वायु से हुआ है. (१०)
यथा सोमः प्रातःसवने अश्विनोर्भवति प्रियः.
एवा मे अश्विना वर्च आत्मनि ध्रियताम्.. (११)
जिस प्रकार अश्विनीकुमारों को प्रातः सवन में सोमरस प्रिय लगता है, अश्विनीकुमार
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उस प्रकार मुझ में तेज की स्थापना करें. (११)
यथा सोमो द्वितीये सवन इन्द्राग्न्योर्भवति प्रिय:.
एवा म इन्द्राग्नी वर्च आत्मनि ध्रियताम्.. (१२)
जिस प्रकार सोमरस तीसरे सवन में इंद्र और अग्नि को प्रिय होता है, उसी प्रकार इंद्र
और अग्नि मुझ में तेज की स्थापना करें. (१२)
यथा सोमस्तृतीये सवन ऋभूणां भवति प्रिय:.
एवा म ऋभवो वर्च आत्मनि ध्रियताम्.. (१३)
जिस प्रकार सोमरस तीसरे सवन में शत्रुओं को प्रिय होता है, उसी प्रकार ऋभुगण मुझ
में तेज धारण करें. (१३)
मधु जनिषीय मधु वंसिषीय. पयस्वानग्न आगमं तं मा सं सृज वर्चसा..
(१४)
हे अग्नि! मैं दुग्ध आदि हवि से युक्त हो कर आया हूं. मैं मधु को प्रकट कर के उस के
द्वारा तेजस्वी बनूं. मुझ में अपने वचन से तेज स्थापित करो. (१४)
सं मा ऽ ग्ने वर्चसा सृज सं प्रजया समायुषा.
विद्युर्मे अस्य देवा इन्द्रो विद्यात् सह ऋषिभि:.. (१५)
हे अग्नि! तुम मुझे अपने तेज, संतान एवं आयु से युक्त करो. देवगण और ऋषियों के
साथ इंद्र मुझे तुम्हारी सेवा करने वाला जानें. (१५)
यथा मधु मधुकृत: संभरन्ति मधावधि.
एवा मे अश्विना वर्च आत्मनि ध्रियताम्.. (१६)
जैसे मधु एकत्र करने वाले मुझ पर मधु गिराते हैं, उसी प्रकार अश्विनीकुमार मुझ में तेज
को स्थापित करें. (१६)
यक्षा मक्षा इदं मधु न्यज्जन्ति मधावधि.
एवा मे अश्विना वर्चस्तेजो बलमोजश्च ध्रियताम्.. (१७)
जिस प्रकार मधुमक्खियां मधु के ऊपर मधु रखती है, उसी प्रकार अश्विनीकुमार मुझ
को वर्चस्वी, तेजस्वी, बली और ओज युक्त बनाएं. (१७)
यद् गिरिषु पर्वतेषु गोष्वश्वेषु यन्मधु.
सुरायां सिच्यमानायां यत् तत्र मधु तन्मयि.. (१८)
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पर्वतों में, पहाड़ी प्रदेशों में, गायों में तथा अश्वों में जो मधु है, जो मधु नीचे की ओर
बहने वाले जलों में है, वह मधु मुझ में स्थित हो. (१८)
अश्विना सारघेण मा मधुना ऽ ङ्क्तं शुभस्पती.
यथा वर्चस्वतीं वाचमावदानि जनाँ अनु.. (१९)
हे शोभा के लिए स्वर्ण के आभूषण धारण करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम मुझे
मधुमक्खियों द्वारा एकत्र किए गए मधु से युक्त करो, जिस से मैं मनुष्यों के प्रति ओजपूर्ण
वाणी का उच्चारण कर सकूं. (१९)
स्तनयित्नुस्ते वाक् प्रजापते वृषा शुष्मं क्षिपसि भूम्यां दिवि.
तां पशव उप जीवन्ति सर्वे तेनो सेषमूर्जं पिपर्ति.. (२०)
हे प्रजापति! मेघों का गर्जन ही तुम्हारी वाणी है. हे वर्षा करने वाले प्रजापति! तुम
पृथ्वी और स्वर्ग को जल से सींचते हो. पशु उसी जल से जीवित रहते है तथा वही वर्षा अन्न
और जल का पोषण करती है. (२०)
पृथिवी दण्डो ३ न्तरिक्षं गर्भो द्यौः कशा विद्युत् प्रकशो हिरण्ययो बिन्दुः..
(२१)
पृथ्वी दंड है, अंतरिक्ष गर्भ है, द्यौ ब्रह्म है, विद्युत प्रकाश है और बिंदु हिरण्मय है.
(२१)
यो वै कशायाः सप्त मधूनि वेद मधुमान् भवति.
ब्राह्मणश्च राजा च धेनुश्चानड्वांश्च व्रीहिश्च यवश्च मधु सप्तमम्.. (२२)
निश्चय ही जो ब्रह्म के सात मधुओं को जानता है, वह मधु वाला बन जाता है तथा
ब्राह्मण, राजा, गौ, बैल, धान, जौ के अतिरिक्त दसवां मधु ब्रह्म है. (२२)
मधुमान् भवति मधुमदस्याहार्यं भवति.
मधुमतो लोकाञ्जयति य एवं वेद.. (२३)
जो इस बात को जानता है, वह मधु वाला होता है, मधु पूर्णलोकों पर विजय प्राप्त
करता है तथा मधुमय भोजन का भोग करता है. (२३)
यद् वीध्रे स्तनयति प्रजापतिरेव तत् प्रजाभ्यः प्रादुर्भवति.
तस्मात् प्राचीनोपवीतस्तिष्ठेत् प्रजापते ऽ नु मा बुध्यस्वेति.
अन्वेनं प्रजा अनु प्रजापतिर्बुध्यते य एवं वेद.. (२४)
आकाश में जो मेघ गर्जन होता है, वह प्रजापति है, वह प्रजाओं के लिए ही प्रकट होता
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