अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-१३७ देवता—अलक्ष्मी नाशन
के द्वारा कुरेदती हुई इस का उद्धार करे. (१६)
सूक्त-१३७ देवता—अलक्ष्मी नाशन
यद्ध प्राचीरजगन्तोरो मण्डूरधाणिकी:.
हता इन्द्रस्य शत्रवः सर्वे बुद्बुदयाशवः.. (१)
जब मंडूधाणकी प्राची दिशा हृदय प्रदेश को प्राप्त हुई, तब इंद्र के सभी शत्रु नष्ट हो गए.
(१)
कपुन्नरः कपृथमुद दधातन चोदयत खुदत वाजसातये.
निष्टिग्र्यः पुत्रमा च्यावयोतय इन्द्रं सबाध इह सोमपीतये.. (२)
हे कर्मशील मनुष्यो! तुम सुखद इंद्र को हृदय में ग्रहण करो, तुम अन्न प्राप्ति के लिए
प्रेरणा करो. तुम अपनी रक्षा के लिए पुत्र को उत्पन्न करो तथा सोमरस पीने के लिए इंद्र का
आह्वान करो. (२)
दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः.
सुरभि नो मुखा करत् प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (३)
इंद्र की सवारी के लिए मैं वेगवान अर्थात् तेज दौड़ने वाले घोड़े का पूजन कर चुका हूं.
वे इंद्र हमें सुरभि अर्थात् गाय का स्वामी बनाएं तथा हमें श्रेष्ठ बनाते हुए हमारा जीवन उत्तम
बनाएं. (३)
सुतासो मधुमत्तमाः सोमा इन्द्राय मन्दिनः.
पवित्रवन्तो अक्षरन् देवान् गच्छन्तु वो मदाः.. (४)
हर्ष प्रदान करने वाला सोमरस इंद्र के लिए तैयार किया जा चुका है. सोमरस छन्ने
अर्थात् छानने के लिए प्रयोग किए गए कपड़े से टपक रहा है. हे सोम! तुम्हारी शक्ति
देवताओं को हर्षित करे. (४)
इन्दुरिन्द्राय पवत इति देवासो अब्रुवन्.
वाचस्पतिर्मखस्यते विश्वस्येशान ओजसा.. (५)
इंद्र के लिए सोमरस का शोधन किया जा चुका है. संसार के स्वामी वाचस्पति अपने
ओज से प्रशंसित होते हैं. (५)
सहस्रधारः पवते समुद्रो वाचमीङ्खयः.
सोमः पती रयीणां सखेन्द्रस्य दिवेदिवे.. (६)
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हजारों धाराओं वाला गमनशील सोमरस तैयार किया जा रहा है. धन का स्वामी यह
सोमरस प्रत्येक स्तोत्र में इंद्र का सखा होता है. (६)
अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः.
आवत् तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त.. (७)
दस हजार किरणों से आकर्षित करने वाले सूर्य पृथ्वी पर आ कर अपने ओज से खड़े
हुए तथा अपनी शक्ति से पृथ्वी की हिंसा करने लगे. तब इंद्र ने अपने बल से सूर्य को हटा कर
पृथ्वी की रक्षा की तथा अपनी शक्ति से ही इंद्र ने पृथ्वी पर जल वाली शक्तियों की स्थापना
की. (७)
द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः.
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ.. (८)
विषम और विचरण करने वाले शुकु अर्थात् काले असुर को अंशुमती के पास घूमते हुए
देखा है. वे भी सूर्य के समान ही आकाश में निवास करते हैं. मैं उन का आश्रित हूं. कामनाओं
की वर्षा करने वाले इंद्र युद्ध में तुम्हारा साथ दें. (८)
अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थे ऽ धारयत् तन्वं तित्त्विषाणः.
विशो अदेवीरभ्या ३ चरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे.. (९)
इस के बाद शुकु ने अपने शरीर को सूक्ष्म बना कर अंशुमती की गोद में रखा. बृहस्पति
की सहायता से इंद्र ने देवों की सत्ता स्वीकार न करने वाली प्रजाओं का वध कर दिया. (९)
त्वं ह त्यत् सप्तभ्यो जायमानो ऽ शत्रुभ्यो अभवः शत्रुरिन्द्र.
गूह्ळे द्यावापृथिवी अन्वविन्दो विभुमद्भ्यो भुवनेभ्यो रणं धाः.. (१०)
हे इंद्र! तुम ने आकाश और पृथ्वी का स्पर्श किया तथा उन्हें प्राप्त कर लिया. सात मित्रों
से उत्पन्न हुए तुम बाद में उन के शत्रु बन जाते हो. तुम ने विस्तृत भुवनों से युद्ध किया. (१०)
त्वं ह त्यदप्रतिमानमोजो वज्रेण वज्रिन् धृषितो जघन्थ.
त्वं शुष्णस्यावातिरो वधैस्त्रैस्त्वं गा इन्द्र शच्येदाविन्दः.. (११)
हे वज्रधारी इंद्र! तुम ने अपने वज्र से बल नाम के असुर का वध किया. तुम ने अपने
हिंसात्मक साधनों से उसे दूर कर दिया और गाएं प्राप्त कर लीं. (११)
तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे. स वृषा वृषभो भुवत्.. (१२)
विशाल शरीर वाले वृत्र असुर को नष्ट करने के कारण हम इंद्र की प्रशंसा करते हैं.
कामनाओं की वर्षा करने वाले इंद्र सर्वश्रेष्ठ बनें. (१२)
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इन्द्रः स दामने कृत ओजिष्ठः स मदे हितः.
द्युम्नी श्लोकी स सोम्यः.. (१३)
पापियों को वश में करने के लिए तुम ने शक्तिशाली का रस्सी के समान प्रयोग किया. वे
प्रसन्नता देने वाले यज्ञ में प्रतिष्ठित होते हैं. वे इंद्र सभ्य, प्रसिद्ध और तेजस्वी हैं. (१३)
गिरा वज्रो न संभृतः सबलो अनपच्युतः. ववक्ष ऋष्वो अस्तुतः.. (१४)
इंद्र पर्वत से प्राप्य वज्र के समान शक्तिशाली हैं. वे कभी पतित नहीं होते हैं. वे श्रेष्ठ
यजमानों के लिए शत्रु का धन प्राप्त करते हैं. (१४)
सूक्त-१३८ देवता—इंद्र
महाँ इन्द्रो य ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमाँ इव. स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे.. (१)
इंद्र महान हैं. वे वर्षा के जल से पूर्ण मेघ के समान वत्स के स्तोम अर्थात् मंत्र समूह
द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हैं. (१)
प्रजामृतस्य पिप्रतः प्र यद् भरन्त वह्नयः. विप्रा ऋतस्य वाहसा.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम उस प्रजा का पालन करो जो सत्य को धारण करती है. अग्नियां
उस प्रजा को पुष्ट करती हैं तथा ब्राह्मण यज्ञ का वहन करने वाले अग्नि देव के द्वारा उस प्रजा
की रक्षा करते हैं. (२)
कण्वा इन्द्रं यदक्रत स्तोमैर्यज्ञस्य साधनम्. जामि ब्रुवत आयुधम्.. (३)
कण्व ने अपने स्तोमों अर्थात् मंत्रों के समूहों के द्वारा इंद्र के यज्ञ को पूर्ण किया. जामि
उसी को आयुध कहती है. (३)
सूक्त-१३९ देवता—अश्विनीकुमार
आ नूनमश्विना युवं वत्सस्य गन्तमवसे.
प्रास्मै यच्छतमवृकं पृथु च्छर्दिर्युयुतं या अरातयः.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! इस के बालक के घूमने के हेतु एवं रक्षा के लिए इसे ऐसा घर दो,
जहां सियार न पहुंच सके. इस के शत्रुओं को उस से दूर करो. (१)
यदन्तरिक्षे यद् दिवि यत् पञ्च मानुषाँ अनु. नृम्णं तद् धत्तमश्विना.. (२)
हे अश्विनीकुमारो अंतरिक्ष तथा स्वर्ग में जो धन है तथा निषाद नाम की पांचवीं जाति
दासों के पास जो धन है, उसे हमें दे दो. (२)
ये वां दंसांस्यश्विना विप्रासः परिमामृशुः. एवेत् काण्वस्य बोधतम्.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! ब्राह्मण तुम्हारे कर्मों का वर्णन करते हैं. वे सब कर्म तुम महर्षि कण्व
के द्वारा किए हुए समझो. (३)
अयं वां घर्मो अश्विना स्तोमेन परि षिच्यते.
अयं सोमो मधुमान् वाजिनीवसू येन वृत्रं चिकेतथः.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! यह हवि धन सहित है. यह स्तोम अर्थात् मंत्र समूह धर्म के द्वारा
संचित है. यह सोम मधुरता से पूर्ण है. तुम इसी सोमरस के द्वारा आवश्यक शत्रु को जानो.
(४)
यदप्सु यद् वनस्पतौ यदोषधीषु पुरुदंससा कृतम्. तेन माविष्टमश्विना..
(५)
हे अश्विनीकुमारो! जल में, ओषधियों तथा वनस्पतियों में जो कर्म छिपे हुए हैं, उन से
मुझे संपन्न बनाओ. (५)
सूक्त-१४० देवता—अश्विनीकुमार
यन्नासत्या भुरण्यथो यद् वा देव भिषज्यथः.
अयं वां वत्सो मतिभिर्न विन्धते हविष्मन्तं हि गच्छथः.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम शीघ्र गमन करने वाले तथा चिकित्सा करने में कुशल हो. तुम्हारा
यह वत्स मोतियों के द्वारा नहीं बांधा जाता है. तुम उस के समीप जाते हो, जिस के पास हवि
है. (१)
आ नूनमश्विनोर्ऋषि स्तोमं चिकेत वामया.
आ सोमं मधुमत्तमं घर्मं सिञ्चादथर्वणि.. (२)
उपासना के योग्य अपनी बुद्धियों के द्वारा ऋषियों ने अश्विनी कुमारों के स्तोत्र को जान
लिया. इस लिए तुम मधुरता वाले सोमरस को अथर्व से सिंचित करो. (२)
आ नूनं रघुवर्तनिं रथं तिष्ठाथो अश्विना.
आ वां स्तोमा इमे मम नभो न चुच्यवीरत.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम तेज चलने वाले रथ पर बैठने वाले हो. तुम्हारे लिए जो स्तुति की
जाती है, वह आकाश के समान स्थिर रहे. (३)
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यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में लिप्यंतरण दिया गया है:
यदद्य वां नासत्योक्थैराचुच्युवीमहि.
यद् वा वाणीभिरविनेवेत् काण्वस्य बोधतम्.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! हम उक्थों अर्थात् मंत्र समूहों के द्वारा तुम्हारा आश्रय लेते हैं. यह
कण्व ऋषि की कृपा है कि हम वाणी के द्वारा तुम्हारी सेवा कर रहे हैं. (४)
यद् वां कक्षीवाँ उत यद् व्यश्व ऋषीर्यद् वां दीर्घतमा जुहाव.
पृथी यद् वां वैन्यः सादनेष्वेवेदतो अश्विना चेतयेथाम्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! कक्षीवान, दीर्घतमा और व्यश्व ऋषियों ने तुम्हें आहुति दी है. वेन का
पुत्र पृथु तुम्हारे सब सदनों में है. इसलिए तुम चैतन्य हो जाओ. (५)
सूक्त-१४१ देवता—इंद्र
यातं छर्दिष्पा उत नः परस्पा भूतं जगत्या उत नस्तनूपा.
वर्तिस्तोकाय तनयाय यातं.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे रक्षक के रूप में आओ. तुम हमारे घर की रक्षा करते हुए
हमें मिलो. तुम हमारे पुत्र, पौत्र आदि के रूप में हमें प्राप्त होओ तथा संसार की रक्षा करने
वाले हो कर हम से मिलो. (१)
यदिन्द्रेण सरथं याथो अश्विना यद् वा वायुना भवथः समोकसा.
यदादित्येभिर्ऋभुभिः सजोषसा यद् वा विष्णोर्विक्रमणेषु तिष्ठथः.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम इंद्र के रथ में उन के साथ बैठ कर चलते हो. तुम वायु के साथ
चलने वाले, आदित्य और ऋभुओं, स्नेही तथा विष्णु के विक्रमणों अर्थात् डगों से भी युक्त
हो. (२)
यदद्याश्विनावहं हुवेय वाजसातये.
यत् पृत्सु तुर्वणे सहस्तच्छ्रेष्ठमश्विनोरवः.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम यजमानों को शीघ्रता से प्राप्त होते ही युद्ध में अपनी उत्तम रक्षण
शक्ति से शत्रु का वध करते हो. मैं तुम्हें अन्न प्राप्त करने के लिए बुलाता हूं. (३)
आ नूनं यात्माश्विनेमा हव्यानि वां हिता.
इमे सोमासो अधि तुर्वशे यदाविमे कण्वेषु वामथ.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! यह हव्य तुम्हारे लिए हितकारी है. यह सोमरस तुवर्श, यदु तथा कण्व
ऋषि का है. तुम यहां अवश्य आगमन करो. (४)