अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-१३४
आलिंगन के समय टूटे हुए दांत और रोम सरोवर में है. (६)
सूक्त-१३४
इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् अरालागुदभर्त्सथ.. (१)
यहां चारों दिशाओं से घिरे हुए को भयभीत करो. (१)
इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् वत्साः पुरुषन्त आसते.. (२)
यहां चारों दिशाओं से घिरे स्थान में बालक युवक बनने की इच्छा से बैठे हैं. (२)
इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् स्थालीपाको वि लीयते.. (३)
यहां चारों दिशाओं से घिरे हुए स्थान में स्थालीपाक अर्थात् बटलोई में पकाया हुआ
पदार्थ समाप्त हो जाता है. (३)
इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् स वै पृथु लीयते.. (४)
यहां चारों दिशाओं से घिरे स्थान में वह समाप्त हो जाता है. (४)
इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् आष्टे लाहणि लीशाथी.. (५)
यहां चारों दिशाओं से घिरे स्थान में युवती जीवन धारण करती है. (५)
इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् अक्षिलेली पुच्छिलीयते (६)
चारों दिशाओं से घिरे इस स्थान में व्यावहारिक बुद्धि पूछी जाती है. (६)
सूक्त-१३५
भुगित्यभिगतः शलित्यपक्रान्तः फलित्यभिष्ठितः.
दुन्दुभिमाहननाभ्यां जरितरो ऽ थामो दैव.. (१)
खाने वाला चला गया, गतिशील जीव भाग गया है तथा उसका शरीर रखा है. हे स्तुति
करने वालो! तुम इस के बाद दुंदुभि जिन दो डंडों से बजाई जाती है, उस से खेलो. (१)
कोशबिले रजनि ग्रन्थेर्धानमुपानहि पादम्.
उत्तमां जनिमां जन्यानुत्तमां जनीन् वर्त्मन्यात्.. (२)
पैर के जूते में, धान की कुटिया में तथा उत्तम धरती से उत्पन्न पदार्थों को मार्ग में रखो.
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(२)
अलाबूनि पृषातकान्यश्वत्थपलाशम्.
पिपीलिकावटश्वसो विद्युत्स्वापर्णशफो गोशफो जरितरो ऽ थामो दैव..
(३)
हे स्तोता! पृषातक अर्थात् तुंबी, लौकी, पीपल, ढाक, बरगद, सुंदर पत्तों वाले, कटहल,
विद्युत और गाय के खुर के बाद शक्ति से क्रीड़ा कर. (३)
वी मे देवा अक्रंसताध्वर्यो क्षिप्रं प्रचर. सुसत्यमिद् गवामस्यसि प्रखुदसि..
(४)
हे अध्वर्यु जनो! उन प्रकाश वाले अथवा तेजस्वी देवों के सामने शीघ्र ही मंत्रों का
उच्चारण करो. गायों के लिए तुम सत्य रूप हो. (४)
पत्नी यदृश्यते पत्नी यक्ष्यमाणा जरितरो ऽ थामो दैव.
होता विष्टीमेन जरितरो ऽ थामो दैव.. (५)
पत्नी यज्ञ करती हुई दिखाई दे रही है. इस के बाद तुम भयों पर विजय प्राप्त करने की
इच्छा करना. (५)
आदित्या ह जरितरङ्गिरोभ्यो दक्षिणामनयन्.
तां ह जरितः प्रत्यायंस्तामु ह जरितः प्रत्यायन्.. (६)
हे स्तोता! उस को उन्होंने ग्रहण किया. उसे तुम ने भी ग्रहण किया. हम चेतन प्राणियों
को हानि पहुंचाने वालों को तथा यज्ञ न करने वालों को विशेष चेतन प्राणियों को प्रदान करते
हैं. (६)
तां ह जरितर्नः प्रत्यगृभ्णंस्तामु ह जरितर्नः प्रत्यगृभ्णः.
अहानेतरसं न वि चेतनानि यज्ञानेतरसं न पुरोगवामः.. (७)
तुम श्वेत तथा आशुपत्य वाली ऋचाओं से युवा अवस्था प्राप्त करते हो. यह शीघ्र पूर्ण
करता है. (७)
उत श्वेत आशुपत्वा उतो पद्याभिर्यविष्ठः. उतेमाशु मानं पिपर्ति.. (८)
हे स्तोता! तुम अंगिरागोत्रीय ऋषियों से दक्षिणा लाते थे. उसे वे लाए थे, वे उसे लाए थे.
(८)
आदित्या रुद्रा वसवस्त्वेनु त इदं राधः प्रति गृभ्णीह्याङ्गिरः.
इदं राधो विभु प्रभु इदं राधो बृहत् पृथु.. (९)
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हे अंगिरागोत्रीय ऋषियो! आदित्य, वसु और रुद्र ये सभी तुम पर कृपा करते हैं. तुम
इस धन को ग्रहण करो. यह धन विशाल, बृहत, व्यापक तथा प्रभुता से संपन्न है. (९)
देवा ददत्वासुरं तद् वो अस्तु सुचेतनम्.
युष्मां अस्तु दिवेदिवे प्रत्येव गृभायत.. (१०)
देवता तुझे प्राण, शक्ति एवं चेतना प्रदान करते हुए प्रत्येक अवसर पर प्राप्त होते हैं.
(१०)
त्वमिन्द्र शर्मरिणा हव्यं पारावतेभ्यः.
विप्राय स्तुवते वसुवनिं दुरश्रवसे वह.. (११)
हे इंद्र! तुम इहलोक और परलोक दोनों को पार करने वालों के लिए हवि वहन करो.
जिस स्तोता ब्राह्मण को अन्न प्राप्त करना कठिन है, उसे तुम बल प्रदान करो. (११)
त्वमिन्द्र कपोताय छिन्नपक्षाय वज्चते.
श्यामाकं पक्वं पीलु च वारस्मा अकृणोर्बहुः.. (१२)
हे इंद्र! पंख कटे हुए कबूतर के लिए तुम पके हुए पीलु, अखरोट तथा अधिक मात्रा में
जल प्रदान करो. (१२)
अरंगरो वावदीति त्रेधा बद्धो वरत्रया. इरामह प्रशंसत्यनिरामप सेधति..
(१३)
चमड़े की रस्सी से बंधा हुआ रहट बारबार शब्द करता हुआ ऐसे स्थान को सींचता है,
जहां फसलें हैं. (१३)
सूक्त-१३६
यदस्या अंहुभेद्याः कृधु स्थूलमुपातसत्.
मुष्काविदस्या एजतो गोशफे शकुलाविव.. (१)
पाप का विनाश करने वाली ओषधि को क्रोध हो गया है. इस के सूखे हुए शकुल गाय
के खुर के गड्ढे में भरे पानी में कांपते हैं. (१)
यथा स्थूलेन पससाणौ मुष्का उपावधीत्.
विष्वञ्चा वस्या वर्धतः सिकतास्वेव गर्दभौ.. (२)
जब स्थूल पसस् के द्वारा मनुष्यों में अणु का प्रहार किया गया, तब धूल में लोटने वाले
गधों के समान आच्छादनी अर्थात् छप्पर में मुश्क बढ़ते हैं. (२)
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यदल्पिकास्वल्पिका कर्कन्धूकेवषद्यते.
वासन्तिकमिव तेजनं यन्त्यवाताय वित्पति.. (३)
जो कर्कन्धू अर्थात् बेरी के समान घर को नष्ट करने वाले तथा अल्प से भी अल्प कण
प्राप्त होते हैं, तब वासंतिक तेज आधान के निमित्त उस में गमन करते हैं. (३)
यद् देवासो ललामगुं प्रविष्टिमिनमाविषुः.
सकुला देदिश्यते नारी सत्यस्याक्षिभुवो यथा.. (४)
जब सुंदर गौ में प्रविष्ट देवता हर्षित होते हैं, तब नारी आंखों देखी के समान सत्य से
युक्त हो जाती है. (४)
महानग्न्य तृप्रद्धि मोक्रददस्थानासरन्.
शक्तिकानना स्वचमशकं सक्तु पद्यम.. (५)
महान अग्नि ऊपर खड़े हुए जनों पर आक्रमण न करते हुए तृप्ति प्राप्त करते हैं. हम
तेजस्वी जनों को शक्ति प्राप्त हो. (५)
महानग्न्यु लूखलमतिक्रामन्त्यब्रवीत्.
यथा तव वनस्पते निरघ्नन्ति तथैवति.. (६)
महान अग्नि उलूखल को लांघते हुए कहने लगे—हे बृहस्पति! लोग जिस प्रकार तुझे
कूटते हैं, वैसा होना चाहिए. (६)
महानग्न्युप ब्रूते भ्रष्टो ऽ थाप्यभूभुवः.
तथैव ते वनस्पते पिप्पति तथैवति.. (७)
महान अग्नि ने कहा—तू मिट कर भी बारबार उत्पन्न होती है. हे वनस्पति! जिस भांति
तू पूर्ण होती है, वैसा ही होना चाहिए. (७)
महानग्न्युप ब्रूते भ्रष्टोऽथाप्यभूभुवः.
यथा वयो विदाह्य स्वर्गे नमवदह्यते.. (८)
महान अग्नि ने कहा—तू नष्ट हो कर भी उत्पन्न हो जाती है. जीर्ण अवस्था में होने पर
भी स्वर्ग में तेरा दोहन हवि के समान किया जाता है. (८)
महानग्न्युप ब्रूते स्वसावेशितं पसः.
इत्थं फलस्य वृक्षस्य शूर्पे शूर्पं भजेमहि.. (९)
महान अग्नि का कथन है कि यह पापनाशक ओषधि भलीभांति उत्तेजित की गई है.
हम फल वाले वृक्ष के सूपों में सूप को प्रविष्ट करते हैं. (९)
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महानग्नी कृकवाकं शम्यया परि धावति.
अयं न विद्म यो मृगः शीर्ष्णा हरित धाणिकाम्.. (१०)
महान् अग्नि कृक शब्द करने वाले पर दौड़ते हैं. हमें यह ज्ञात है कि वे मृग के समान
शीश के द्वारा मौन अर्पण का हरण करते हैं. (१०)
महानग्नी महानग्नं धावन्तमनु धावति.
इमास्तदस्य गा रक्ष यभ मामद्ध्रौदनम्.. (११)
महान अग्नि महाअग्नि के पीछे दौड़ते हैं. वे इस की इंद्रियों के रक्षक हो कर ओदन
अर्थात् भात को खाते हैं. (११)
सुदेवस्त्वा महानग्नीर्बबाधते महतः साधु खोदनम्.
कुसं पीवरो नवत्.. (१२)
महान अग्नि उत्पीड़न करने वाले हैं तथा बड़ेबड़ों को कुरेदते हैं. ये स्थूल और कृश
सभी को नष्ट कर देते हैं. (१२)
वशा दग्धामिमाङ्गुलिं प्रसृजतो s ग्रतं परे.
महान् वै भद्रो यभ मामद्ध्रौदनम्.. (१३)
वशा नाम की गाय ने इस जली हुई उंगली की रचना की. अन्य जन उग्र की रचना करते
हैं. यह ओदन अर्थात् भात अत्यधिक कल्याणमय है. इस ओदन अर्थात् भात का भक्षण
करो. (१३)
विदेवस्त्वा महानग्नीर्विबाधते महतः साधु खोदनम्.
कुमारिका पिङ्ग्लिका कार्द भस्मा कु धावति.. (१४)
ये महान अग्नि विशेष पीड़ा देने वाले हैं. ये बड़ों को खोद डालते हैं. पिंगल अर्थात् पीले
रंग की यह कुमारी कार्य करने के बाद भाग जाती हैं. (१४)
महान् वै भद्रो बिल्वो महान् भद्र उदुम्बरः.
महाँ अभिक्त बाधते महतः साधु खोदनम्.. (१५)
बिल्व अर्थात् बेल और उदुंबुर अर्थात् गूलर—ये दोनों ही वृक्ष बड़े भले हैं. जो महान
इन्हें सभी ओर से पीड़ित करता है, वह बड़ों को कुरेदता है. (१५)
यः कुमारी पिङ्ग्लिका वसन्तं पीवरी लभेत्.
तैलकुण्डमिमाङ्गुष्ठं रोदन्तं शुदमुद्धरेत्.. (१६)
पिंगलिका अर्थात् पीले रंग की कुमारी यदि वसंत को प्राप्त करे तो तैलकुंड में से अंगूठे
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