अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-१११ देवता—अग्नि
सूक्त-१११ देवता—अग्नि
इमं मे अग्ने पुरुषं मुमुग्ध्ययं यो बद्धः सुयतो लालपीति.
अतो ऽ धि ते कृणवद् भागधेयं यदानुन्मदितो ऽ सति.. (१)
हे अग्नि! मेरे इस पुरुष को रोग के आधार पाप से बचाओ. पाप रूपी पाशों से बंधा
हुआ यह पुरुष जो नियमित रूप से प्रलाप करता है, इसीलिए यह तुम्हारे निमित्त हवि रूपी
भाग अधिक मात्रा में दे. इस प्रकार यह उन्माद रहित बने. (१)
अग्निष्टे नि शमयतु यदि ते मन उद्युतम्.
कृणोमि विद्वान् भेषजं यथानुन्मदितो ऽ ससि.. (२)
हे गंधर्व ग्रह से गृहीत पुरुष! यदि तेरा मन गंधर्व ग्रह के विकार से उद्भ्रांत है तो अग्नि
तेरे मन को शांत करें. प्रतिकार को जानता हुआ मैं इस ग्रह विकार की ओषधि करता हूं,
जिस से तू उन्माद रहित बन. (२)
देवैन्सादुन्मदितमुन्मत्तं रक्षसस्परि.
कृणोमि विद्वान् भेषजं यदानुन्मदितो ऽ सति.. (३)
हे पुरुष! तूने देवों के विषय में किए हुए पाप के कारण चित्त का उन्माद पाया है.
राक्षसों अर्थात् ब्रह्मराक्षस आदि ग्रहों के कारण उन्मत्त इस पुरुष के रोग के प्रतिकार को
जानता हुआ मैं इस की ओषधि करता हूं. (३)
पुनस्त्वा दुरप्सरसः पुनरिन्द्रः पुनर्भगः.
पुनस्त्वा दुर्विश्वे देवा यथानुन्मदितो ऽ ससि.. (४)
हे उन्माद से गृहीत पुरुष! अप्सराएं और गंधर्व तेरा उन्माद रोग दूर कर के तुझे हमें पुनः
प्रदान करें. इस के पश्चात इंद्र ने तुझे मेरे लिए दिया है. हवि एवं सभी देवों ने तुम्हें मेरे लिए
इस हेतु दिया है कि तुम उन्माद रहित हो सको. (४)
सूक्त-११२ देवता—अग्नि
मा ज्येष्ठं वधीदयमग्न एषां मूलबर्हणात् परि पाह्येनम्.
स ग्राह्याः पाशान् वि चृत प्रजानन् तुभ्यं देवा अनु जानन्तु विश्वे.. (१)
हे अग्नि! यह वेदना इन पिता, माता, भ्राता आदि के मध्य बड़े भाई का वध न करे. तुम
जड़ उखाड़ने के अर्थात् बड़े भाई से पहले विवाह करने वाले दोष के कारण भी इस की रक्षा
करो. हे अग्नि! तुम इस को छुड़ाने के उपाय जानते हो, इसीलिए इसे पकड़ने वाली पिशाची
के बंधन से छुड़ाओ. इस के बंधन छुड़ाने के लिए सभी देव तुम्हें अनुमति दें. (१)
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उन्मुञ्च पाशांस्त्वमग्न एषां त्रयस्त्रिभिरुत्सिता येभिरासन्.
स ग्राह्याः पाशान् वि चृत प्रजानन् पितापुत्रौ मातरं मुञ्च सर्वान्.. (२)
हे अग्नि! माता, पिता और पुत्र को वेदना के दोष रूपी पाश बंधनों से छुड़ाओ. वेदना
के दोष उत्तम, मध्यम और अधम—तीन प्रकार के हैं. हे अग्नि! तुम इस को छुड़ाने के उपाय
जानते हो, इसलिए पकड़ने वाली पिशाची के बंधन की रस्सियां छुड़ाओ. इस के बंधन छुड़ाने
के लिए तुम्हें सभी देव अनुमति दें. (२)
येभिः पाशैः परिवित्तो विबद्धो ऽ ङ्गेअङ्ग अर्पित उत्सितश्च.
वि ते मुच्यन्तां विमुचो हि सन्ति भ्रूणघ्नि पूषन् दुरितानि मृक्ष्व.. (३)
बड़े भाई से पहले विवाह कराने वाला छोटा भाई जिन पाप रूप पाशों से प्रत्येक अंग में
बंधा, रोगी एवं अशांत स्थिति वाला है; उस के वे पाश छूट जाएं. क्योंकि इंद्र आदि सभी देव
छुड़ाने वाले हैं; हे देव! इस भ्रूण हंता को उन पापों से छुड़ाओ जो इसे बड़े भाई से पहले
विवाह करने से प्राप्त हुए हैं. (३)
सूक्त-११३ देवता—पूषा
त्रिते देवा अमृजतैतदेनस्त्रित एनन्मनुष्येषु ममृजे.
ततो यदि त्वा ग्राहिरानशे तां ते देवा ब्रह्मणा नाशयन्तु.. (१)
अपने बड़े भाई से पहले विवाह करने से संबंधित पाप को प्राचीन काल के देवों ने त्रित
में विसर्जित कर दिया था. त्रित ने अपने में विसर्जित पाप को मनुष्यों में स्थापित कर दिया. हे
बड़े भाई से पहले विवाह करने वाले! इस कारण यदि ग्रहणशील पाप देवता ग्राही ने तुम्हें
प्राप्त किया है, उसे देवगण मंत्र से नष्ट कर दें. (१)
मरीचीर्धूम्रान् प्र विशानु पाप्मन्नुदारान् गच्छोत वा नीहारान्.
नदीनां फेनाँ अनु तान् वि नश्य भ्रूणघ्नि पूषन् दुरितान मृक्ष्व.. (२)
हे बड़े भाई से पहले विवाह करने से उत्पन्न पाप देवता! तू परिवित्ती अर्थात् बड़े भाई से
पहले विवाह करने वाले को त्याग कर अग्नि, सूर्य आदि में, चमस में अथवा अग्नि से उत्पन्न
धुएं में अथवा उस से बने बादलों में प्रवेश कर जा अथवा तू कोहरे में मिल जा. हे पाप देवता!
तू नदियों के जल में प्रवेश कर के विविध प्रकार से गति कर. (२)
द्वादशधा निहितं त्रितस्यापमृष्टं मनुष्यैनसानि.
ततो यदि त्वा ग्राहिरानशे तां ते देवा ब्रह्मणा नाशयन्तु.. (३)
त्रित के पाप को बारह स्थानों पर रखा गया. पहले मनुष्य में, उस के बाद तीन आप्तियों
में, इस के पश्चात सूर्योदय की आठ दिशाओं में—इस प्रकार वह पाप बारह स्थानों पर रखा
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गया है. इस कारण यदि ग्रहणशील पाप देवता ग्राही ने तुम्हें प्राप्त किया है तो उसे देवगण
मंत्र के द्वारा नष्ट कर दें. (३)
सूक्त-११४ देवता—विश्वे देव
यद् देवा देवहेडनं देवासश्चकृमा वयम्.
आदित्यास्तस्मान्नो यूयमृतस्यर्तेन मुञ्चत.. (१)
हे अग्नि आदि देवो! इंद्रियों के वशीभूत हो कर हम ने जो पाप किया है, हे अदिति पुत्र
देवो! तुम यज्ञ संबंधी सत्य के द्वारा उस पाप से हमें बचाओ. (१)
ऋतस्यर्तेनादित्या यजत्रा मुञ्चतेह न:.
यज्ञं यद् यज्ञवाहस: शिक्षन्तो नोपशेकिम.. (२)
हे अदिति पुत्र देवो! तुम यज्ञ के द्वारा प्रसन्न करने योग्य हो. तुम यज्ञ संबंधी सत्य के
द्वारा इस यज्ञ कार्य द्वारा हमें सभी पापों से मुक्त करो. (२)
मेदस्वता यजमाना: सुचाज्यानि जुह्वत:.
अकामा विश्वे वो देवा: शिक्षन्तो नोप शेकिम.. (३)
चरबी वाले पशु से यज्ञ पूर्ण करते हुए यजमान सुच (चमस) के द्वारा यज्ञ में आज्य
डालते हैं. हे विश्वे देव! हम कामना रहित हो कर और पाप से डरते हुए पाप के वश में न हों.
(३)
सूक्त-११५ देवता—विश्वे देव
यद् विद्वांसो यदविद्वांस एनांसि चकृमा वयम्.
यूयं नस्तस्मान्मुञ्चत विश्वे देवा: सजोषस:.. (१)
हे विश्वे देवो! पाप का निमित्त जानते हुए अथवा न जानते हुए हम ने जो पाप किया,
हमारे साथ प्रसन्न होते हुए तुम हमें उस पाप से छुड़ाओ. (१)
यदि जाग्रद् यदि स्वप्नेन एनस्यो ऽ करम्.
भूतं मा तस्माद् भव्यं च द्रुपदादिव मुञ्चताम्.. (२)
पाप को प्रेम करने वाले हम ने जाग्रत अवस्था में अथवा सोते हुए जो पाप किए, उन से
विश्वे देव हमें भूतकाल और भविष्यकाल में काठ के चरण बंधन के समान छुड़ाएं. (२)
द्रुपदादिव मुमुचान: स्विन्न: स्नात्वा मलादिव.
पूतं पवित्रेणेवाज्यं विश्वे शुम्भन्तु मैनस:.. (३)
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