सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

द्वितीय विश्राम: गायत्री-साधर्म्य, कामकला-स्वरूप एवं कुण्डलिनी सामरस्य

दीप्त है । पृथ्वी तक सभी तत्व, भुवन शक्ति के ही विस्तार है । शक्तितत्व ही
‘निरालम्बपुरी’ या अनाश्रित भुवन है । अनाश्रित भुवन के चतुर्दिक चार शक्तियाँ
हैं—मध्य में अनाश्रित शक्ति अवस्थित है । शिवरूपी अनाश्रित देव के उत्सङ्ग में
अनाश्रिता शक्ति प्रतिष्ठित है । शक्ति में आनन्दमय स्पर्श की अनुभूति होती है ।
‘ब्रह्मरन्ध्र’ सुषुम्ना के ऊपर है जबकि ‘शक्ति’ ब्रह्मरन्ध्र के भी ऊपर स्थित है।
यहीं ऊर्ध्वकुण्डलिनी प्रसुप्त, सर्पाकार एवं ऊर्णान्तन्तु सन्निभ प्रकाश करती हुई स्थित
है । समस्त अनुन्मिषित विश्व इन्हीं के गर्भ में स्थित है और इस प्रकार वे विश्वाधार
हैं । समस्त तत्व एवं भुवन इन्हीं का आश्रय लेकर स्थित हैं । इस भूमि में एक
अव्यक्त आनन्द की अनुभूति होती है । पृथ्वीपर्यन्त तत्व जो कुछ भी प्रसृत है—
अस्तित्व में है—सब ‘शक्ति तत्व’ का विस्तार है ।
शक्ति की कलायें = सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, अमृता, अमृतसंभवा और व्यापिनी—
ये ही शक्ति की कलायें हैं—
'सूक्ष्मा चैव सुसू

होता है । समना के अनन्तर जो 'उन्मना' है वही`

  • Line 21: 'अमावस्या' है । 'बिन्दु' को पूर्णिमा कहने पर भी उसे पूर्णरूप से पूर्णिमा नहीं
  • Line 22: कहा जा सकता क्योंकि प्रकृत पूर्णिमा षोडशी है पञ्चदशी नहीं । ठीक पूर्णिमा होने
  • Line 23: पर पूर्णता अखण्ड रहती है और उसके अनन्तर कृष्णपक्ष नहीं आता । बिन्दु में
  • Line 24: १५ कलाएँ हैं किन्तु एक कला नहीं है यही कला 'अमृतकला' या 'षोडशी' है ।
  • Line 25: समना अनाश्रित भुवन के ऊपर स्थित है । 'समना' ब्रह्मविल के बाहर अतीत मन
  • Line 26: की भूमि है । इस भूमि में मन है भी और नहीं भी है । नादान्त से इस मन की
  • Line 27: सूचना प्राप्त होती है । 'सूक्ष्म समष्टि मन' नाद में लय हो जाता है—समाप्त हो
  • Line 28: जाता है उसके परे 'अतिमानस' है । 'समना' समस्त कारणों की कारणभूता एवं
  • Line 29: महेश्वर की पराशक्ति है ब्रह्म की चिद्रूप ईसरमशक्ति 'समना' के रूप में अवतरित

१०६ वरिवस्यारहस्ये
बिन्दु का, निरोधिका में अर्धचन्द्र का अर्धांश है और यही क्रम 'समना' तक
चलता है । मात्रा का सूक्ष्म अंश केवल 'समना' तक ही है । 'उन्मना' अमात्र हैं
क्योंकि वहाँ मात्रा नहीं है क्योंकि वहाँ मन ही नहीं है और मन की ही तो मात्रायें
होती है ।
उन्मना तो कालशून्य है किन्तु समना में काल है । 'समना' से जो काल है
उसकी संज्ञा है एकाणुर्लव 'समनायां पुनःकाल एकाणुर्लव संज्ञकः ।'¹ वस्तुतः
'समना' ही सृष्टिव्यापारा है—
“समनासौ निविर्दिष्टा शक्तिः सर्वाध्ववर्तिनी ।
क्रीडीकरोति या विश्वं सहृत्य सृजते पुनः ॥” (नेत्र तन्त्र) ॥
समना की कलायें निम्नांकित हैं—
सर्वज्ञा सर्वगा दुर्गा सवना स्पृहणा धृतिः ।
समना चेति विख्याता एताः शिवकलाः स्मृताः ।
इच्छाशक्तिमधिष्ठाय इच्छासिद्धिप्रदायिकाः ॥
शिव तत्वं समाश्रित्य सुसम्पूर्णार्णवप्रभा ।
अनन्त शक्तिसंस्थानाः सूक्ष्माश्चात्यन्तनिर्मलाः ॥²
'समना' की कलायें—सर्वज्ञा, सर्वगा, दुर्गा, सवना, स्पृहणा, धृति ॥
समना व्योमरूपात्मिका है । इससे शून्य नाम्नी व्यापिनी शक्ति का उदय होता
है । सदाशिव अनाश्रित पदात्मक सम्पूर्ण भावाभासों की भित्ति रूप अशेष मनन,
मन्तव्य मात्रात्मक 'समना' है जो कि उन्मना की स्वस्वरूपगोपन क्रीड़ा के
परिणामस्वरूप स्फुरित होती है ।³ 'समना' का प्रकाश द्वादश आदित्यों के समतुल्य
है । एक सीधी रेखा के ऊपर एवं नीचे बिन्दु स्थापित कर देने से निर्मित होने
वाला आकार ही 'समना' का आकार है इसका उच्चारण-काल २५६वाँ भाग मात्र
है ।
'समना' की आकृति रेखा के ऊपर नीचे स्थित दो बिन्दुओं के समान होती
है—
'ऊर्ध्वाधोबिन्दुद्वयसंयुतरेखाकृतिः समना ॥'³
'बिन्दुद्वयान्तरालस्थऋजुरेखामयी पुनः समना ॥'⁴
'समना' और 'उन्मना' में अन्तर यह है कि ऊपर वाले बिन्दु के बिना
उपर्युक्त समना ही 'उन्मना' है ।⁵ भास्करराय कहते हैं—'सैवोर्ध्वबिन्दुहीनोन्मना'⁶ इसी
उन्मना के ऊपर 'महाबिन्दु' है—'तदूर्ध्व महाबिन्दु ॥'⁷
१. नेत्रतन्त्र २. स्वच्छन्दोद्योत
३. 'वरिवस्यारहस्यम्' ४. प्रकाश
५-७. 'वरिवस्यारहस्यम्'

प्रथमोऽंशः १०७
'उन्मना'—'समना' की ऊर्ध्ववर्ती भूमि ही 'उन्मना' है । उन्मना की मात्रा
१/५१२ है । अन्य आचार्यों की दृष्टि से इसके उच्चारण का काल नहीं है । यहीं
शब्दब्रह्मरूपी परम नाद का अन्त है । यही पञ्चम शून्य भी है और नव नादों में
नवम भूमि है । यह भूमि मन के अतीत है । मन के नहीं रहने से नाद भी नहीं
रहता एवं नाद के नहीं रहने से मन भी नहीं रहता । जब तक नाद का अन्त नहीं
होता तब तक तत्वबोध नहीं होता । उन्मना में नाद का अन्त नहीं होता । उन्मना
में काल नहीं है किन्तु फिर भी उन्मना परम तत्व नहीं है क्योंकि उन्मना में भी
नाद का आत्यन्तिक लय नहीं है । उन्मना में कला का अभाव है तथापि नहीं
रहते हुए भी रहती है । इसकी स्थिति इसी प्रकार की है यथा—असम्प्रज्ञात समाधि
में चित्त वृत्ति रूप में नहीं रहता किन्तु तो भी रहता है । अर्थात् संस्कार रूप में
रहता है । समना में सूक्ष्ममन की विद्यमानता है किन्तु उन्मना में नहीं है, केवल
संस्कार है ।
नाद-श्रवण की दृष्टि से स्थिति इस प्रकार है—
(क) आवरणवशात् नाद न सुनाई देने पर-क्षिप्त, विक्षिप्त या मूढ़ दशा ।
(ख) नाद का श्रुतिगोचर होने पर-एकाग्रावस्था या ज्ञानावस्था ।
(ग) नाद-श्रवण के स्थगित होने पर-चित्त की निरोधावस्था ।
(इस अवस्था में मन की वृत्ति नहीं रहती संस्कारमात्र रूप में मन विद्यमान
रहता है । जब यह संस्कार भी नहीं रहता तब चिन्मात्र या शुद्ध आत्मा की
रूपस्थिति हुआ करती है ।)
जब तक नाद का अन्त नहीं होता तब तक तत्त्व बोध नहीं होता । नादान्त
ही नहीं शक्ति एवं समना में भी नाद का अन्त नहीं होता । शाक्त योगियों के मन
में तो उन्मना में भी नाद का अन्त नहीं होता । उन्मना का भेदन करने के
अनन्तर उन्मना की ऊर्ध्व भूमि में ही 'नाद' का लय हो पाता है । और तभी
तत्वबोध या आत्मसाक्षात्कार संभव हो पाता है । उन्मनापर्यन्त समस्त मन्त्रावयव
१०८१७ बार उच्चारित होने पर नाद का अन्त एवं तत्वज्ञान का उदय हो पाता
है तथा परमपद की सम्प्राप्ति हो पाती है । ६ शून्य, ५ अवस्था एवं ७ विषुव के
कोलाहल से अतीत भूमि में ही विश्व की परम विश्रान्ति भूमि एवं परमानन्दस्वरूप
'परमपद' स्थित है । उन्मनापर्यन्त नाद के चिन्तन को 'कालविषुव' कहते हैं और
उसके अनन्तर 'तत्वविषुव' है । 'नाद' तत्व का अभिव्यञ्जक तो है किन्तु जब तक
नाद का अन्त नहीं होता तब तक तत्वबोध नहीं होता । उन्मना के भेदन के बाद
ही नाद अन्त हो पाता है अतः स्पष्ट है कि उन्मनी में तत्वबोध नहीं हो पाता
अतः उन्मनी 'परमपद' नहीं माना जा सकता ॥
'उन्मना' वह प्रदेश है जहाँ न मन है, न मात्रा है, न काल है, न देश है,
न देवता है; न प्रपञ्च का कोई अंश है । यह विशुद्ध चिदानन्दभूमि है । यही परम
लक्ष्य है ।

१०८ वरिवस्यारहस्ये
मन्त्र शास्त्र की दृष्टि से प्रणव के द्वादशावयवों में 'उन्मना' अंतिम अवयव
है। जप विज्ञान एवं योग विज्ञान की सीढ़ी का अंतिम सोपान 'उन्मना' ही है—
साधना की अंतिम मंजिल उन्मना ही है क्योंकि उसके ऊपर तो साधना की गति
ही नहीं केवल साध्य मात्र का अवस्थान है।
'उन्मना' तक की यात्रा प्रत्येक साधक का कर्तव्य है क्योंकि उन्मना पद के
पूर्व तक मनोराज्य है और वह शुद्धाशुद्ध रूप में स्थित है। उसका अशुद्ध भाग
मायात्मक एवं विशुद्ध भाग शुद्धमायात्मक या योगमायात्मक है। उसके अशुद्ध भाग
में प्रणव के अवयवत्रय—अकार, उकार एवं मकार (स्थूल-सूक्ष्म-कारण, जाग्रत,
स्वप्न, सुषुप्ति) स्थित है और विशुद्ध भाग में बिन्दु—अर्धचन्द्र, निरोधिका, नाद,
नादान्त, शक्ति, व्यापिनी एवं समना स्थित है। और इनके अनन्तर सबसे अतीत
'उन्मना पद है जो मनोराज्य से अतीत है।
उन्मना में न तो मात्रा है और न तो काल है—“अमात्रमुन्मना शक्ति
कालस्तत्र न विद्यते ।।” उन्मना 'परमाशक्ति' है और शिवरूपिणी है—
'सा शक्तिः परमा सूक्ष्मा उन्मना शिवरूपिणी ।
अस्तित्व मात्रमात्मानं क्षोभ्यं क्षोभयते सदा ॥' १
वस्तुतः परविमर्शमयी अहन्तकरसा पारमेश्वरी स्वातन्त्र्य शक्ति ही 'उन्मना' है
जो कि स्वरूप गोपनक्रीड़ोत्सुका होकर 'समना' के रूप में स्फुरित होती है ।२
एक प्रश्न उठता है कि क्या मन की अन्तिम सीमा 'बुद्धि' के पूर्व तक ही
है और उसके बाद उसका प्रसार नहीं है क्योंकि श्रुति में कहा गया है—'मनसस्तु
परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान परः ।।' वस्तुतः ऐसा नहीं है क्योंकि मन 'समना' तक
है। उपर्युक्त वेदा श्रुति-वाक्य मात्र अन्तःकरण के अवयव रूप मन की ओर इंगित
कर रहा है जिसके चार अवयव हैं—(१) 'मन' (२) 'बुद्धि' (३) 'चित्त' (४)
'अहङ्कार'। 'योग' एवं तन्त्रशास्त्र में विवेचित मन के इस सूक्ष्मतम एवं व्यापक
स्वरूप की ओर उसका सङ्केत नहीं है।
उन्मना का उच्चारण-काल मात्रा का ५१२वाँ भाग है। अन्य आचार्यों ने
कहा है कि उन्मनी कला मन से अतीत होने के कारण आकार-शून्य है। 'विज्ञान
भैरव' के ४२वें श्लोक में 'शून्या' शब्द से 'उन्मनी' को ही अङ्गीकृत किया गया
है। आचार्य भास्करराय ने 'समना' एवं 'उन्मना' का उच्चारण-काल मात्रा का
२५६वाँ भाग ही स्वीकार किया है। योगी अमृतानन्द ने उन्मना को निराकारा एवं
निरुच्चारा माना है। 'उन्मना' अतीत मन के भी अतीत हैं। नौ नादों में यह
नवम् नाद है ।३
१. नेत्रतन्त्र २. स्वच्छन्दोद्योत
३. बिन्दु में जिस नाद समूह की सूचना मिलती है 'उन्मना' में उसका अन्त हो
जाता है।

प्रथमोऽंशः १०९
भास्करराय और अमृतानन्द की दृष्टि: एक विश्लेषण—
चूँकि योग-भूमियों का (१) 'सकल' (२) 'सकल-निष्कल' एवं (३)
'निष्कल'—इन तीन खण्डों में वर्गीकरण करके उन्मनापर्यन्त भूमियों को
सकल-निष्कल खण्डों में अवस्थित माना गया है अतः 'उन्मना' का भी कोई
आकार मानना चाहिए । यदि उसका कोई आकार स्वीकार कर लिया जाता है तो
उसका कोई उच्चारण-काल भी होना चाहिए और वह समना से सूक्ष्मतर होना
चाहिए । 'उन्मना' काल-हीन है—अमात्रक है + निवृत्ति से लेकर शान्त्यतीत आदि
कलायें । प्राणचार, भुवन एवं देवताओं की गति नहीं है । इससे आगे केवल
अनामय पर तत्त्व की स्थिति है—
'यावत्सा समना शक्तिः तदूर्ध्वे चोन्मना स्मृता । नात्र कालः कलाश्वारो न तत्त्वं
न च देवता । सुनिर्वाणं परं शुद्धं गुरुवक्त्रं तदुच्यते । तदतीतं वरारोहे परं
तत्त्वमनामयम् ।।'१
'स्वच्छन्द तन्त्र' और 'योगिनी हृदय' में मतभेद—
स्वच्छन्दतन्त्र में कहा गया है कि 'नात्र कालः कलाश्वारो न तत्त्वं न च
देवताः ।।' अर्थात् उन्मना में काल नहीं है । 'योगिनीहृदय' में कहा गया है कि
उन्मना में भी काल है । इसीलिए आचार्य भास्करराय मखिन कहते हैं कि—
'यथा समनायाः कालः तथैवोन्मनी ।
एक लवात्मक एव काल इति यावत् ।।'२
'समना' और 'उन्मना' में भेद क्या है?—यदि 'समना' की ही भाँति
'उन्मना' में भी काल है तो 'समना' एवं 'उन्मना' में भेद ही क्या है? आचार्य
भास्करराय का कथन है कि आकृति से सूक्ष्म होने के कारण विद्यमान भी काल
'उन्मना' में दुर्लक्ष्य रहता है । यही उसका परत्व है ।
'स्वच्छन्द तन्त्र' में भी उन्मना के अन्त में ही कालहीनता का उल्लेख है
यथा—(१) उन्मन्यते परे योज्यो न कालस्तत्रविद्यते ।३ (२) ऊर्ध्वं मुन्मनसो यत्र तत्र
कालो न विद्यते ।।४
क्या 'स्वच्छन्दतन्त्र' में आत्मविरोधी दृष्टियाँ प्रस्तुत की गई है?—इसका
समाधान इस प्रकार किया जा सकता है—
(१) 'काल' के दो भेद हैं—(क) पर काल (ख) अपर काल । अपर काल
ही 'उन्मनी' है । पर कालात्मा ही उन्मनी शक्ति एवं लव आदि कार्यों का निष्पादक
है । चरम तत्व पर कालात्मा चिद्रूप है और कुण्डलिनी रूप उन्मनी शक्ति उनकी
उपाधि है ।५
१. स्वच्छन्द तन्त्र (पटल १०) २. भास्करराय : सेतुबन्ध
३. स्वच्छन्द तन्त्र ३।११।११ ४. स्वच्छन्द तन्त्र २८६।४
५. 'प्रयोगक्रम दीपिका'

११० वरिवस्यारहस्ये
(२) आचार्य पद्मपादाचार्य कहते हैं कि 'वही साक्षिलक्षणा परा प्रकृति पूर्वोक्त
स्वसंवेद्यस्वरूपा स्वसम्बन्धिनी अपरा शक्ति को जानती है । वह लव से परार्द्ध
पर्यन्त पन्द्रह काल पर्वों की अभिमानिनी अपरा काल शक्ति मुझ उन्मनी रूप काल
के द्वारा अभेद रूप से जानी जाती है ।' १'प्रपञ्चसार विवरण' एवं 'प्रयोगक्रमदीपिका'
की इन दृष्टियों में भी विरोध है ।
(३) हेलराज ने 'वाक्यपदीय' को टीका में कहा है कि स्वतन्त्र कालशक्ति
अनादिनिधन एवं काल की कलना से रहित शब्दब्रह्म में जन्म आदि पौर्वापर्य क्रम
को अवभासित करती है । इसकी अनुज्ञा से ही पदार्थों का आविर्भाव एवं प्रतिबंध
से तिरोभाव होता है । यह उन्मना ही 'काल शक्ति' स्वातन्त्र्य एवं परावाक् है ।
व्याकरणागम यही मानता है कि शब्द ब्रह्मकाल शक्ति का आश्रय लेकर जन्मादिक
विकारों का जनक बनता है । शब्दब्रह्म इस शक्ति द्वारा भोक्ता/भोग्य/एवं भोग रूप
में प्रसृत होता है । यह कालशक्ति ही स्वातन्त्र्यशक्ति है ।
(४) अभिनवगुप्तपादाचार्य कहते हैं—'काल' उन्मना के अतिरिक्त कुछ नहीं
है । इसीको 'काली' नामक पराशक्ति कहते हैं—‘‘क्रमा-क्रमात्मा कालश्च परः संविदि
वर्तते । 'काली' नाम पराशक्तिः सैव देवस्य गीयते ॥’’२ वस्तुतः पर विमर्शमयी,
अहन्तकरसा' पारमेश्वरी स्वातन्त्र्य शक्ति ही 'उन्मना' है । यही शक्ति अपने रूप को
छिपाने की क्रीड़ा की इच्छा से मात्रात्मक 'समना' के नाम से स्फुरित होती है ।
'वस्तुतो ह्युन्मनाख्यैव पर विमर्शमयी पारमेश्वरी स्वातन्त्र्य शक्ति रहन्तै करसा
स्वरूपगोपन क्रीड़ा सदाशिवानाश्रित पदात्मक सर्वभावभास सूत्रणभित्तिकल्प
समनारूपतया स्फुरति ॥'
“सा शक्ति परमा सूक्ष्मा उन्मना शिवरूपिणी ।
अस्तित्व मात्र मात्मानं क्षोभ्यं क्षोभयते यदा ॥”
'उन्मना' के प्रकारद्वय
┌────────────────────────┴────────────────────────┐
निर्वाण कलारूपा वर्णाविलीरूपा
(सहस्रार में स्थित) (सहस्रार में स्थित)
जहाँ 'मनस्' का अस्तित्व विध्वस्त हो जाता है वही है—'उन्मनी' स्थिति ।
'नाद' की सूक्ष्मतमावस्था एवं अन्तिम 'नाद' 'उन्मनी' है ।
मनोन्मनी और गुरु गोरक्षनाथ
निवर्तयन्तीं निखिलेन्द्रियाणि, प्रवर्तयन्तीं परमात्मयोगम् ।
संविन्मयीं तां सहजामनस्कां, कदा गमिष्यामि गतान्यभावः ॥
────────────────────────────────────────────────────────
१. आचार्य पद्मपाद—'प्रपञ्चसार विवरण' २. तन्त्रालोक (६ आ०)

प्रथमोऽंशः १११
नेत्रे ययोन्मेषनिमेष शून्ये, वायुर्यथा वर्जितरेचपूरः ।
मनश्च सङ्कल्प विकल्प शून्य, मनोन्मनी सा मयि सन्निधत्ताम् ॥
चित्तेन्द्रियाणां चिरनिग्रहेण, श्वासप्रचारे शमिते यमीन्द्राः ।
निवातदीपा इव निश्चलाङ्गाः, मनोन्मनीमग्नधियो भवन्ति ॥
महामाहेश्वराचार्यवर्य भगवान् गोरक्षनाथ की योग-साधना में मन्त्र, हठ, लय एवं
राजयोग चारों ही साधनाओं का समावेश है, तथापि उनका लक्ष्य राजयोग ही है
और यह राजयोग ही उन्मनयोग या मनोन्मनी की साधना का विधायक है ।
मनोन्मनी का स्वरूप—जिस योगावस्था में बिना दृश्य के ही दृष्टि स्थिर हो
जाय, बिना प्रयास के वायु स्थिर हो जाय, बिना अवलम्बन के चित्त स्थिर हो जाय
वही सहज अमनस्क अवस्था 'मनोन्मनी' है । वस्तुतः यह मन की एक
निरालम्बावस्था है—'निरालम्बश्चैकावस्था मनोन्मनी' । यह प्रशान्तचित्त की निश्चल
स्थिरावस्था है । यह राजयोग, समाधि, उन्मनी, अमरत्व, लय, तत्त्व, शून्याशून्य,
परमपद, अमनस्क, अद्वैत, निरालम्ब, निरञ्जन, जीवन्मुक्ति, सहजा एवं तुर्या का
पर्याय है । मनोन्मनी में एक विषयोन्मुख मन परिशान्त एवं निश्चल एवं ऊर्ध्वमुख
होकर किसी अलौकिक तत्व में लीन हो जाता है । प्राथमिक पाँच चक्रों में तो
पञ्चभूतों का एक छठे चक्र में मन का लय होता है और उसके अनन्तर ही
मनोन्मनी का उदय होता है । इस महादशा में योगी दशमद्वार (ब्रह्मरन्ध्र) में
समाधिस्थ हो जाता है । यह योगावस्था मन-पवन के ऐक्य, सूर्य-चन्द्र-योग,
रजरैतसयोग, शिवशक्तियोग एवं मन की अविचल शून्यावस्था का पर्याय है जो कि
पवन, नाद, मन, बिन्दु एवं कुण्डलिनी की साधना से प्राप्त होती है । इस
भोग-प्रक्रिया में ब्रह्मरन्ध्र शून्यमण्डल में अमृत-निर्झर झरने लगता है, अनाहत नाद
का गर्जन होने लगता है, बिन्दु ऊर्ध्वमुखी हो जाता है, शक्ति का शिव से समायोग
होता है और योगी महारस का पान करने लगता है, वस्तुतः यह तुरीयावस्था है
और कबीर ने इसे ही सहज रहनी एवं सहज समाधि की अवस्था कहा है ।
गोरक्ष-योग में मन और उसका स्वरूप—गुरु गोरक्षनाथ ने मन को शिव,
शक्ति एवं पञ्च तत्त्वों का जीव कहा है और इसको ही ग्रहण करके उन्मन रहने का
विधान किया है—
'यह मन सकती, यह मन सीव, यह मन पाँच तत्व का जीव ।
यह मन ले जे उनमन रहै, तौ तीनि लोक की बातां कहै ॥'
जब तक यह मन प्राण के साथ सुषुम्ना में प्रवेश नहीं करता तब तक
मनोन्मनी का उदय भी नहीं होता और द्वैत का निरास भी नहीं होता—(१)
“सुषुम्नावाहिनी प्राणेसिद्ध्यत्येव मनोन्मनी । (२) मनसौ ह्युन्मनीभावाद् द्वैतं
नैवोपलभ्यते ॥”
मन के कारण एवं उसके प्राणभूत तत्व—मन, बिन्दु, प्राणापानैक्य आदि ।
कल्याणी मल्लिक के अनुसार—'अन्तः शून्यः वहिः शून्यः शून्यः कुंभ इवाम्बरे' की

११२ वरिवस्यारहस्ये
निर्वितर्क अवस्था । स्मृतिपरिशुद्धि होने पर सम्प्राप्त स्वरूप शून्य शब्दातीत ज्ञानाप्ति
की अवस्था ही निर्गुणपंथी सन्तों एवं योगियों की 'उन्मनी' या निर्बीज समाधि है
और यही नाथों का 'अमनस्क' या मनोहीन अवस्था है । (ना.सं.इ.द.सा.प्र.) ॥
डा० नागेन्द्रनाथ जी ने कहा है कि मनोहीन अवस्था का अर्थ यह नहीं है कि मन
की सत्ता नहीं रहती अथवा उसका निर्दलन हो जाता है, वस्तुतः अचंचलमन जब
स्थैर्य प्राप्त करके परमतत्त्व में लीन हो जाता है तभी उन्मनीवस्था का उदय होता
है । डा० त्रिगुणायत के अनुसार 'उन्मनी' समाधि से मिलती-जुलती ध्यान की एक
अवस्था है जिसे 'तुरीयावस्था' भी कह सकते हैं । हठयोगियों की उन्मनी
पातञ्जलयोग की समाधि के समतुल्य है । डा० बड़थ्वाल ने भी इसका प्रयोग
समाधि के अर्थ में किया है । पं० परशुराम चतुर्वेदी के मतानुसार 'उन्मनी' समाधि
का ही एक पर्यायवाची शब्द है और यह मन एवं प्राण दोनों की ऐक्यावस्था एवं
मन के स्थिरत्व का बोधक है । अन्य विद्वानों के मतानुसार इसे सूर्यचन्द्रमिलन,
प्राणनियन्त्रण, समाधि एवं परमतत्व, सहजसमाधि का पर्याय मानना चाहिए ।
निर्गुणिया सन्तों ने इसे परम तत्त्व के अर्थ में भी प्रयुक्त किया है ।
अमनस्क एवं लय योग—अमनस्क योग मुख्यतः राजयोग की साधना है
किन्तु इसमें मनोलय के विविध सोपानों की सविस्तर मीमांसा भी मिलती है—जो
निम्नानुसार है—
लय की अवधि फल
एक निमेष, श्वास, पल, ⎤
घड़ी, प्रहर, दिन मास ⎥ परम तत्व की प्राप्ति
एवं वर्ष पर्यन्त लय ⎦
१. निमेष का लय— पर तत्व का संस्पर्श किन्तु बार-बार व्युत्थान ।
२. ६ निमेषों का लय— ताप शान्ति एवं बार-बार निद्रा एवं मूर्च्छा ।
३. १ श्वास का लय— प्राणादिकों का स्वस्थान में प्रवाहित होना ।
४. २ श्वासों का लय— कूर्मनागादिक वायुओं के प्रवाह का अवरोध ।
५. ४ श्वासों का लय— सात धातुओं के रसों का समवायु होकर धातुओं
के रसों की पुष्टि ।
६. १ पल तक का लय— श्वास-प्रश्वास, निमेषोन्मेष में स्वल्पता एवं किसी
भी आसन में दीर्घावधि तक बैठे रहने पर भी
थकावट नहीं ।
७. २ पलों तक का लय— हृदय नाड़ी का जागरण एवं अनाहत नाद का
उत्थान ।।
८. ४ पलों तक का लय— श्रुतिपेशल वाणी का श्रवण (दिव्यनाद का श्रवण)

प्रथमोऽंशः ११३
९. ८ पलों तक का लय— काम वासना की निवृत्ति ।
१०. १ घड़ी तक का लय— प्राणादिक वायु का सुषुम्णा में प्रवेश ।
११. १/२ घड़ी तक का लय— मूलाधारस्थ कुण्डलिनी का जागरण ।
१२. २ कला तक का लय— (कलामात्र)—वायुनिरोध—कुण्डलिनी का सुषुम्ना
द्वारा एक क्षण में एक बार ही मन में कम्पन ।
१३. ४ कलातक का लय— निद्राभाव निवृत्ति, हृदय में तेजो बिन्दु का दर्शन ।
१४. १/४ दिन तक का लय— आहार में स्वल्पता मूत्र-पुरीष की मात्रा में
स्वल्पता, शरीर में लघुत्व एवं स्निग्धत्व आदि ।
'व्यापिका' का आकार—शक्ति त्रिकोण के स्वाभिमुख कोण में बिन्दु बना
देने पर 'व्यापिका' का निर्माण होता है । बिन्दु के शिर के ऊपर ऊर्ध्व रेखा बना
दी जाय तो 'उन्मना' का आकार निर्मित हो जाता है और 'समना' के शिरस्थित
बिन्दु का अपनयन कर दिया जाय तो भी 'उन्मना' का आकार बन जाता है ।¹
'बिन्दु' भाल के मध्य में स्थित है, वृत्ताकार है और दीपक की भाँति देदीप्यमान्
है। उसके ऊपर अर्धचन्द्र है जो कि आकार एवं ज्योति में अर्धचन्द्र के समान है।
उसके ऊपर रोधिनी है जो चन्द्रिका की कान्ति वाली है । 'नाद' पद्मराग के समान
एवं नादान्त हल के समान है और विद्युत के समान प्रकाशित है ।
'अर्धचन्द्र'—बिन्दु का अर्धभाग ही अर्द्धचन्द्र है जो कि दीपक के आकार
का है—'अर्धचन्द्रो बिन्दोरर्धभागः, तथाकारो दीपाकार एव ।।² पादमात्रा (मात्रा काल
का चतुर्थभाग) ही उसका उच्चारण काल है ।
दीपाकारोऽर्धमात्रश्च ललाटे वृत्त इष्यते ।
अर्धचन्द्रस्तथाकारः पादमात्रस्तदूर्ध्वके ॥” (यो०हृ०)
ह्रस्व उच्चारण काल 'मात्रा' कहलाता है—'ह्रस्वस्य उच्चारणकालो
मात्रेत्युच्यते ।।'³ मात्रा का अर्ध उच्चारण काल जिसका हो उसे 'अर्धमात्रा' कहते
हैं—मात्राया अर्ध मुच्चारणकालो यस्य सोऽर्धमात्रः ।⁴ पादमात्रोच्चारणकाल वाला एवं
दीपक के आकार वाला या बिन्दु के अर्ध भाग के आकार वाला प्रणवावयव ही
अर्धचन्द्र कहलाता है—'पादमात्रोच्चारण कालो दीपाकारोऽर्धचन्द्र इत्यर्थः।'५
ज्योत्स्नाकारा (चन्द्रिका समकान्ति) = तदष्टांश (मात्राष्टांश) उच्चारणकाल,
त्र्यस्रविग्रहा (त्रिकोणाकारा) 'रोधिनी' कहलाती है—'ज्योत्स्नाकारा तदष्टांशा रोधिनी
त्र्यस्रविग्रहा ।।'६ स्वच्छन्द संग्रह में भी कहा गया है—'अर्धचन्द्रस्तदूर्ध्वं तु रोधिनी
तस्य चोपरि । ज्योत्स्ना ज्योत्स्नावती कान्तिः सुप्रभाविमलापि च ।। रोधिन्याख्यं
यदुक्तं ते नादस्तस्योर्ध्व संस्थितः । पद्मकिञ्जल्क सङ्काशः कोटिसूर्यसमप्रभः । पुरैः
परिवृतोऽसंख्यैर्मध्ये पञ्चकलावृतः । इन्धिका दीपिका चैव रेचिका मेचिका तथा
१. सेतुबन्ध २-६. दीपिका
८ वरि.

११४ वरिवस्यारहस्ये
ऊर्ध्वगा मध्यगा तासां पञ्चमी परमा कला । चन्द्र कोटिसम प्रख्यं तन्मध्येऽर्बुद-
योजनम् । पद्ममध्ये समासीनमीश्वरं चोर्ध्वगामिनम् । चन्द्रायुतप्रतीकाशं पञ्चवक्त्रं
त्रिलोचनम् । इन्धिका वृद्वैवृत्तं देवं शूलपाणिं जटाधरम् । तस्योत्सङ्गता मूर्ध्वगामिनी
परमां शिवाम् । ध्यायेत् ।।'१
अर्धचन्द्र एवं रोधिनी—'अर्धचन्द्रस्थिता ह्येताः कलाः पञ्च प्रकीर्तिताः ।
रून्धिनी रोधिनी रोद्धा ज्ञानरोधा तमोपहा । निरोधिका कलाः पञ्च कथितास्तव
सुन्दरि । ब्रह्मादिपरमेशानां परमाप्तिनिरोधनात् । निरोधिकेति सा प्रोक्ता तस्या भेदा
वरानने ।।'२
'योगिनीहृदय' में 'व्यापिका', 'समना', एवं 'उन्मनी' का स्वरूप इस प्रकार
व्यक्त किया गया है—
'व्यापिका बिन्दुविलसत्त्रिकोणाकारतां गता ।
बिन्दुद्वयान्तरालस्था ऋजुरेखामयी पुनः ।। ३२ ।।३
समना बिन्दु विलसद् ऋजुरेखा तथोन्मना ।
शक्त्यादीनां वपुः स्फूर्जद्द्वादशादित्यसन्निभम् ।। ३३ ।।४
चतुःषष्टितदूर्ध्वं तु द्विगुणं द्विगुणं ततः ।
शक्त्यादीनां तु मात्रांशो मनोन्मन्यास्तथोन्मनी ।। ३४ ।।५
अमृतानन्दनाथ 'दीपिका' में कहते हैं—'व्यापिका बिन्दुविलसद्वामा दित्रिशक्ति-
मयत्रिकोणरूपतां गता ।।' भास्कराचार्य 'सेतुबंध' में कहते हैं—'शक्तित्रिकोणस्य
स्वाभिमुखकोणे बिन्दु लेखनेन व्यापिकाया आकारो भवतीति सम्प्रदायः ।।' दुर्भेद्य
शक्तिकला का भेदन करके 'व्यापिनी' (महाशून्य) में आरूढ़ होना पड़ता है । यहाँ
प्राणों का सञ्चरण नहीं है, यहाँ क्रिया भी अस्तमित है । यहाँ नित्य सर्ग एवं
महादिन का भी अस्तित्व नहीं है । कलनात्मक काल यहाँ साम्यरूप में स्थित है ।
यह महाशून्य शक्तिपर्यन्त नीचे के समस्त विश्व में व्यापक है । ब्रह्मरंध्र के ऊपर
'शक्तिस्थान' है (यहीं ऊर्ध्व कुण्डलिनी प्रसुप्त है और भुजङ्गाकार रूप में स्थित है)
उसके ऊपर 'व्यापिनी' है केन्द्र में स्थित शक्ति की कला ही 'व्यापिनी' है । तथापि
यह 'शक्ति' से पृथक् है । वस्तुतः शक्तितत्त्व ही अनाश्रित भुवन हैं । इसमें
'व्यापिनी' 'व्योमात्मिका', 'अनन्ता', 'अनाथानामक शक्तियाँ हैं । मध्य में 'अनाश्रिता
शक्ति' स्थित है । 'व्यापिनी' भी शून्य है । किसी-किसी ने इसे 'महाशून्य' भी
कहा है । किन्तु वह महाशून्य नहीं है क्योंकि उसके बाद भी शून्य है । यहाँ पर
साकार-निराकार भाव तिरोहित है ।
परमात्मा सृष्टि-स्थिति-प्रलय-तिरोधान-अनुग्रह कृत्य 'समना' में निष्पादित करता
है । पूर्ण ब्रह्म की चिदात्मिका ईक्षरम शक्ति 'समना रूप' में अवतीर्ण होकर समष्टि
मन में सञ्चरित होती है 'समना' ब्रह्मविल के भीतर अतीत मन का स्थान है । यहाँ
मन नहीं है 'व्यापिनी' के परे ऊर्ध्व में—अनाश्रित भुवन के ऊपर 'समना' है ।
१-२. स्वच्छन्द संग्रह ३-५. योगिनी हृदय

प्रथमोऽंशः ११५
‘समना’ और ‘उन्मना’ ये दोनों ब्रह्म शक्तियाँ हैं । ‘समना’ शक्तितत्त्व का
आश्रय लेकर परब्रह्म की इच्छा के अनुसार सृष्टि विस्तार करती है और ‘उन्मना’
शिवत्व का आश्रय लेकर परब्रह्म की विमर्शहीन विश्वातीत दिशा में उन्मुख होती
है। नादान्त से उन्मनापर्यन्त अवस्था तुर्यातीतावस्था’ कही जाती है । उन्मना से परे
और किसी भी प्रकार की अवस्था नहीं है । एक मात्रा विभक्त होकर अर्धमात्रा में
परिणत होती है । स्थूल विश्व की अनुभूति मन की जिस मात्रा में होती है उसे
एक मात्रा कहते हैं । स्थूल लौकिक अनुभूति का आरंभ इसी एक मात्रा में है ।
मात्रा का वैपुल्य जाड्याधिक्य का कारण है । व्यापिनी की मात्रा १।१२८ समना
की मात्रा १।२५६ है । उन्मना अमात्रक है । किसी-किसी के मत में उन्मना की
मात्रा १।५१२ है ।
‘समना’ की ऊर्ध्व कोटि ‘उन्मना’ है । यह अतीत मन के भी अतीत है ।
इस स्थान में आत्मा का विकल्पशून्य केवल स्वरूप में अवस्थान है । यह
अनिर्देश्य एवं अमेय है । ‘उन्मना’ नौ नादों में नवम नाद है । ‘बिन्दु’ में जिस
नाद समूह की सूचना मिलती है उसकी इसी ‘उन्मना’ में अवसान होता है । यही
‘महाशून्य’ है । इसके बाद ही ‘शब्दब्रह्म’ है । इससे भी ऊपर ‘महाबिन्दु’ है ।
महाबिन्दु ही सदाशिव है । इसी के ऊपर ‘चित्कला’ (चिच्छक्ति) (परावाक्, परा
मात्रा के विलासस्वरूप) क्रीड़ा करती है । शुक्ल एवं रक्त बिन्दुरूप प्रकाश-
विमर्शात्मक कामकलाक्षर के सङ्घट्ट से ‘चित्कला’ अभिव्यक्त होती है ।
‘स्वच्छन्दसंग्रह’ में ‘समना’ का स्वरूप इस प्रकार प्रकट किया गया है—
‘चिदानन्दस्वरूपा तु परा शक्तिस्तदूर्ध्वतः । समना नाम सा शक्तिः सर्वकारण
कारणा ॥१ सर्वाण्डानि बिभर्तीयं शिवेन समधिष्ठिता । प्रत्यारूढः स भगवान शिवः
परम कारणः ।। सृष्टिं स्थितिं च संहारं तिरोभावमनुग्रहम् । शिवः करोति सततं
सर्वकारण कारणः । शिवः सर्वस्य कर्तैयं शक्तिः कारणमिष्यते ॥’२
‘उन्मना’ क्या है? ‘एतस्माद बिन्दोर्विलसद ऋजुरेखा उन्मना ।।' 'उन्मना' का
स्वरूप इस प्रकार है—‘या शक्तिः कारणत्वेन तदूर्ध्वे उन्मना स्मृता । मनः संक्रमते
यत्र तेन सा उन्मना स्मृता । नात्र काल कला भावो न तत्त्वं न च देवता ॥
सुनिर्वाणं परं शुद्धं रुद्रवक्त्रं तदुच्यते । शिवशक्ति रितिख्याता निर्विकल्पा निरञ्जना ॥३
‘उन्मनी’ ‘निराकारा एवं निरुच्चारा' है । ‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा
सह’—कहकर जिस अवाङ्मनोऽतीतगोचर पद को निर्देशित किया गया है वही है
‘उन्मना’ ।४
यदि बिन्दु के ऊपर एक ऊर्ध्वरेखा खींच दी जाय तो उसे ही “उन्मना” का
आकार कहा जायेगा । ‘समना’ के सिर पर स्थित बिन्दु का अपनयन करने पर
‘उन्मना’ का आकार निर्मित हो जाता है ।५
१. स्वच्छन्द तन्त्र २. स्वच्छन्द संग्रह
३. स्वच्छन्द तन्त्र ४. अमृतानन्दनाथ-योगिनीहदय दीपिका
५. सेतुबन्ध

११६ वरिवस्यारहस्ये
काल-निर्धारण१—(१) ‘व्यापिका’ में दो लव हैं । (२) ‘समना’ में एक लव
है (३) ‘उन्मना’ में आधा लव है । (व्यापिकाया द्वौ लवौ, समनाया एको लवः,
उन्मनायास्तु लवार्धात्मकः कालः । मनोन्मनीति समनाया एवं संज्ञान्तरम् । यथा
समनायाः कालस्तथैवोन्मनीकालः । एक लवात्मक एव काल इति यावत् । एतदूर्ध्वं
कालानवच्छेदः— “देशकालानवच्छिन्नं तदूर्ध्वं परमं महत् ॥”२ वैसे यह भी कहा गया
है कि (१) शक्ति के ऊर्ध्व में द्विगुणित, ‘व्यापिका’ के बाद ‘समना’ में द्विगुणित
एवं इसी प्रकार उत्तरोत्तर द्विगुणित-द्विगुणित माया में उच्चारण-काल कम होता जाता
है । किन्तु ‘ततश्चोन्मनाया इह कालविधिर्नास्त्येव ॥” उन्मना में काल है ही नहीं ।
‘उन्मनी’ में नाद-लय को ही ‘कालविषुव’ कहते हैं ।३
काल गणना—(योगिनीहृदय के अनुसार)—शक्त्यादीनां वपुः स्फूर्जद्
द्वादशादित्यसन्निभम् । चतुःषष्टिरतदूर्ध्वं तु द्विगुणं द्विगुणं ततः । शक्त्यादीनां तु
मात्रांशो मनोन्मन्यास्तथोन्मनी ॥४ समना के ऊपर स्थित उन्मना में काल कलाभाव
तत्त्व एवं देवता कोई नहीं है—‘यावत्सा समना शक्तिस्तदूर्ध्वे उन्मना स्मृता । मात्र
कालकलाभावो न तत्त्वं न च देवता । सुनिर्वाणं परं तत्त्वं रुद्रवक्त्रं तदुच्यते । शिव-
शक्तिरितिख्यातं निर्विकारं निरञ्जनम् ।। तत्वातीतं वरारोहे वांभनोतीत गोचरम् ।।'५
बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति (व्यापिनी, समना, उन्मनी)—
योगियों की नौ चिन्मय भूमियों में प्रथम भूमि ‘बिन्दु’ है—मूलाधार से उठने वाला
‘नाद’ वर्णों के मध्य अनुविद्ध होकर माला में पिरोये सूत्र की भाँति प्रतीत होता
है—
‘आधारोत्थितनादो गुणा इव परिभाति वरामिध्यगतः ।।’’
(१) ‘बिन्दु’—भाल के मध्य वृत्ताकार रूप में दीप की भाँति देदीप्यमान
रहता है—“मध्येफालं बिन्दुदीप इवाभाति वर्तुलाकारः ।।” भ्रूमध्य में ललाट की
ओर कुछ ऊपर ‘बिन्दु’ का स्थान है । यह वर्तुलाकार दीप के समान है । इस
भूमि में ज्योतिर्मय ज्ञानरूप में ईश्वर बोध की सूचना होती है । यहाँ प्रवेश करने
पर जागतिक ज्ञान विलुप्त हो जाता है । यह समाधिजन्य प्रज्ञा से ऊपर की
अवस्था है क्योंकि समाधि जन्म ज्ञान जागतिक ज्ञान है । अर्द्धमात्रा का ज्ञान
चिन्मयानुभूति है । ओङ्कार के अकार-उकार-मकार इन तीन मात्राओं में स्थूल,
सूक्ष्म एवं कारण रूप में भेद है—ये सारे भेद जहाँ पिण्डीभूत होकर अविभक्त
रूप में स्थित होते हैं वहीं ‘बिन्दु’ है । यहाँ वेद्य या ज्ञेय ही प्रधान है । स्थूल
भूमि में भी नाद के नौ विभाग हैं और सूक्ष्म भूमि में भी नौ विभाग हैं । ‘बिन्दु’
का उच्चारण-काल आधी मात्रा में नहीं पहुँचने तक योगभूमियाँ नहीं पाई जाती ॥
योगियों के पञ्च शून्यों में प्रथम शून्य ही ‘बिन्दु’ है । बिन्दु-स्तर में बीज नहीं
रहता । यहाँ प्रकृति का स्फुरण नहीं रहता ।
१-३. सेतुबन्ध ४. योगिनी हृदय
५. स्वच्छन्द संग्रह : यही शिवपद ‘निर्द्वन्द्वं परमं शान्तं शिवाख्यं परमं पदं’

प्रथमोऽंशः ११७
(२) 'अर्धचन्द्र' १—बिन्दु के ऊपर अर्धचन्द्र स्थित है जो दीप्ति एवं आकृति
दोनों दृष्टियों से अर्ध चन्द्रमा के समान है—'तदुपरिगतो अर्धचन्द्रोऽन्वर्थः कान्त्या
तथा कृत्या ।।'
'अर्धमात्रा' एकाग्रता एवं निरोध के संधिस्थान में स्थित है । यह द्वितीय भूमि
है । प्रथम भूमि है—'बिन्दु' । 'अर्धमात्रा' की मात्रा है—१।४ बिन्दु को पूर्णचन्द्र
या चन्द्रबिन्दु कल्पना अर्धचन्द्र की उसी के अर्धांशरूप में कल्पना की गई है ।
यह बिन्दु के ऊपर स्थित है इसके चारों ओर चार एवं केन्द्र में एक—(५ कलाएँ)
कला हैं । यह शून्य नहीं है । 'बिन्दु' मात्रा से मात्राहीन में जाने का द्वार है—जहाँ
कि ज्ञाता-ज्ञेय-ज्ञान एकाकार हो जाते हैं । मात्रा-भङ्ग होते ही अधर्ममात्रा का उदय
होता है । इसी भूमि से ईश्वर का आभास मिलना प्रारंभ होता है । बिन्दु से ऊपर
जाने में कपाल में जो 'सोमरस' दिखाई पड़ता है वही 'अर्द्धचन्द्र' है ।
(३) 'रोधिनी'—ब्रह्मरंध के नीचे त्रिकोण में 'रोधिनी' स्थित है जो कि
अर्धचन्द्र के ऊपर अवस्थित है । चूँकि यह पाँच विश्वस्वामियों को ऊर्ध्वगति से
निवृत्त करती है इसीलिए इसका नाम है 'रोधिनी' ।
“निरोधयति या देवान्ब्रह्मादींश्च सुराधिपे ।।
निरोधिकेति साख्याता.................... ।। (१०।१२२३)
परमशिवाभेदाख्यातिरे व ब्रह्मादेर्निरोधः ।।
ध्वनिरध्वगतो यत्र विश्राम्यंत्यतिनिरोधितः ।।
निरोधिनीति विख्याता सर्वदेव निरोधिका ।।'' (नेत्रतन्त्र)
रोधिनी तक ही 'बिन्दु' का आवरण है । यह भी 'शून्य' है । यहाँ दिक
एवं काल का पार्थक्य स्मृत नहीं रहता । निम्न मन एवं प्राण का यहाँ अनुभव भी
नहीं रहता । इसके बाद ही 'नाद' है जो कि ब्रह्मरंध के सम्मुख स्थित है ।
(४) नाद—निरोधिका के ऊर्ध्वदेश में एवं ब्रह्मरंध्र के सम्मुख 'नादस्थान' है ।
यह मन्त्र महेश्वररूपी महापुरुषों द्वारा परिवृत है । 'नाद' के अन्तर्गत भुवन पञ्चक
के मध्य की शक्ति 'ऊर्ध्वगा' कहलाती है । यहीं से विशुद्ध, चिद्बोध का सूत्रपात
होता है । ब्रह्मरंध्र के भीतर 'नादान्त' है । काल-भेदन के आरोह-क्रम में
प्रथमावस्था है—'बिन्दुपद' एवं दूसरी अवस्था है 'नाद पद' । बिन्दु पद के
अधिष्ठाता हैं 'ईश्वर' एवं नाद पद के 'सदाशिव' । बिन्दुअवस्था—सर्वज्ञत्व लाभ =
१. नेत्रतन्त्र : अर्द्धचन्द्र की कलाएँ निम्न हैं—
ज्योत्स्ना ज्योत्स्नावती चैव सुप्रभा विमला शिवा ।
अर्द्धचन्द्र कलाः ह्येताः सर्वज्ञपद संस्थिताः ।।
विद्या वरण संबद्धा मन्त्र कोटि विभूषिताः ।
क्रिया शक्तिस्वरूपस्तु संस्थिता विमला शुभाः ।। (नेत्रतन्त्र)

११८ वरिवस्यारहस्ये
सिद्धावस्था समस्त विश्व के बाह्य रूप का दर्शन इन्धिका दीपिका चैव रोचिका
मोचिका तथा । ऊर्ध्वगामिन्यः इत्येताः कला नाद समुद्भवाः । एता स्वतन्त्रता युक्ताः
सकले निष्कले स्थिताः । ज्ञानशक्तिस्वरूपास्तु ज्ञाताः सार्वज्ञ्यदायिकाः ॥" (नेत्रतन्त्र)
बिन्दु में 'अर्धचन्द्र' नाम की एक अवान्तर अवस्था है । इसके बाद ही निरोधिका
आती है । निरोधिका का प्राचीर पार किये बिना 'नाद' में जाना असंभव है ।
बिन्दु एवं अर्धचन्द्र तथा पातञ्जल योग—पातञ्जल में जिस अपर वैराग्य एवं
पर वैराग्य का वर्णन मिलता है उसका स्वरूप क्या है? अपर वैराग्य से
भोग-वितृष्णा एवं पर वैराग्य से त्रिगुण-वितृष्णा प्राप्त होती है पर वैराग्य—
'पुरुषख्याते र्गुणवैतृष्ण्यम्' पुरुष-साक्षात्कार—प्रकृति का दर्शन—प्रकृति के प्रति
वितृष्णा—विवेकख्याति की पूर्णता-पुरुष की केवली रूप में आत्मप्रतिष्ठा । तांत्रिक
योगी का लक्ष्य ब्रह्माण्ड का ईश्वरत्व या कैवल्य प्राप्ति नहीं है । ये काल-मार्ग को
नष्ट करने के लिए अग्रसर होते हैं । ये योगी सुषुम्णा में प्रवेश करके काल भेदन
करते हैं ।
'अर्धमाला एवं पतञ्जलि'—एकाग्रभूमि में उदित होने वाली प्रज्ञा है—
अस्मिता प्रज्ञा । काल यहाँ भी है । पातञ्जल योग की साधना थी—काल को
संक्षिप्त करते-करते अर्धमात्रा तक ले जाना । पातञ्जल योगी स्थूल योगी हैं ।
उनके विश्व का ज्ञान इस अर्धमात्रा में ही पर्यवसित हो जाता है—यही है अस्मिता
ज्ञान ।
'अर्धमात्रा', 'बिन्दु' एवं 'अर्द्धन्दु'—अर्धमात्रा 'एकाग्रभूमि' है और उसके बाद
है (पातञ्जल) 'निरोधभूमि' ।। मात्रा के विषय में आचार्यों का मत निम्न है—(१)
ह्रस्व स्वर का उच्चारण-काल एक मात्रा है । दीर्घ का दो मात्रा है । प्लुत का दो
से अधिक मात्रा है । जो ह्रस्व दीर्घ एवं प्लुत तीनों नहीं है किन्तु व्यञ्जन है—
उसकी काल-मात्रा 'अर्धमात्रा' है—"व्यजनं चार्धमात्रकम ।।" हलन्त-अर्धमात्रा है ।
परमशिव का स्थान तो 'महाबिन्दु' है किन्तु वहाँ तक पहुँचने के पूर्व अनेक
सोपानों का अतिक्रमण करना पड़ता है यथा—बिन्दु, अर्धचन्द्र आदि ।।
'बिन्दु' की प्राप्ति षट्चक्र भेदन के बाद होती है । इसके बाद ही काल एवं
माया तथा मन की मात्रा क्षीण हो पाती है । षट् चक्र का भेदन करके आज्ञा चक्र
के जिस बिन्दु की हमें प्राप्ति होती है वही यह 'बिन्दु' है । आज्ञाचक्र तक विश्व,
उस बिन्दु में, समाप्त हो जाता है । इस बिन्दु से ऊपर उठने के लिए अर्धमात्रा
का अवलम्बन लेकर 'महाबिन्दु' तक उठना आवश्यक है । बिन्दु से महाबिन्दु का
नाम ही है—सरल मार्ग । 'बिन्दु' की स्वाभाविक मात्रा है—'अर्ध' । यही 'बिन्दु'
योगमार्ग है क्योंकि यहीं से सरल मार्ग का आरंभ है । इस मार्ग में प्रवेश करके
क्रमशः उठते-उठते काल के सूक्ष्मतम परमाणु तक पहुँचा जा सकता है । उपाय
है—अर्धमात्रा का अवलम्बन । एकाग्रता के द्वारा 'बिन्दु' प्राप्त होता है । काल के
कुटिल मार्ग में भौतिक एवं काल्पनिक विश्व स्थित है । इसी तरह काल के सरल
मार्ग में भी विराट विश्व स्थित है । इसका दर्शन काल के राज्य में रहकर कर

प्रथमोऽंशः ११९
पाना संभव नहीं। 'बिन्दु' में प्रवेश किये बिना सरल मार्ग में प्रवेश करना असंभव
है। मात्र 'शुद्ध विद्या' (भगवदानुग्रह) ही अर्धमात्रा रूप काल को अतिक्रान्त करा
सकती है। आध्यात्मिक यात्रा के आरोहण-पथ में सद्गुरु काल की मात्रा से
अर्धमात्रा की धारा को जोड़ देता है। जहाँ से अर्धमात्रा प्रारंभ होती है वहीं से
सरल गति का आरंभ है। काल के राज्य में लोक-लोकान्तर तैर रहे हैं। काल
को अर्धमात्रा में प्रतिष्ठित करना चाहिए। उक्त सरल गति के क्रमविकास के साथ
ही साथ मात्रायें भी सूक्ष्मतर होती चली जाती हैं। यह सूक्ष्मता अर्धमात्रा आदि के
रूप में विभक्त होती है। यथा 'बिन्दुस्थान' में अर्धमात्रा किन्तु अर्धचन्द्र में १।४
अंश मात्रा एवं निरोधिका में १।८ मात्रा हो जाती है। इसी प्रकार काल की
क्षीणतम मात्रा तक पहुँचना पड़ता है। काल की क्षीणतम मात्रा का नाम है 'काल
का परमाणु' अर्थात् 'लव'। 'लव' = कालिक विभाग की ऊर्ध्व गति की चरम
सीमा। किन्तु यह चरम सीमा नहीं है। मात्रा-विभाग की चरम सीमा १/५१२
मात्रा का भी योगियों ने अनुभव किया है। यही सूक्ष्मतम मात्रा है काल की।
इससे भी अधिक मात्रा की सूक्ष्मता संभव तो है किन्तु अभी तक संभव नहीं हुई।
'बिन्दु' में भेद ज्ञान है 'नाद' में अभेद ज्ञान है।१ 'बिन्दु' से 'नाद' में जाने के
लिए भगवती का आदेश आवश्यक है। इसी प्रकार से नाद से बिन्दु में अवतरित
होने के लिए भी भगवती का आदेश आवश्यक है। 'नाद' में भी सभी सत्ताओं
का ज्ञान होता है किन्तु अपने से अभिन्न रूप में।
नाद के ज्ञान के साथ समग्र विश्व के नदन का अनुभव—समस्त विश्व की
समस्त सत्ता 'मैं' के रूप में ज्ञात होने लगना 'नदन' है। बिन्दु में स्थित योगी ही
विश्व के सञ्चालक है। आरोहण-क्रम = गुरुमन्त्र (गुरु की चित् शक्ति से सम्पन्न
मन्त्र) पश्यन्ती में शिष्य के बीजमन्त्र का उद्धार—मध्यमावस्था में उस बीज की
कल्पना के राज्य में 'मध्यमा वाक्' से शिष्य को अर्पण (गुरु का भौतिक आकाश
में उतरना)—वैखरी शब्दों से मन्त्र-दान—गुरु द्वारा शिष्य कर्ण में प्रदत्त मन्त्र का
स्थूल अंश + उसका स्थूल आवरण स्थित होना—शिष्य द्वारा मन्त्र जप से
स्थूलावरण का भेदन—(गुरु-मन्त्र के रूप में शिष्य श्रुतमन्त्र 'आवरण' है उसका
भेदन)—स्थूल आवरण का जप—ज्योतिदर्शन = चिताकाश का साक्षात्कार (मध्यमा
वाक् की परिपक्वावस्था)—मध्यमा ज्योति या चित् ज्योतिरूप का—चिदालोक में
परिणमन—चिदाकाश दर्शन—(विश्वोऽहं की अनुभूति) ॥
बिन्दु से नाद में प्रवेश—नदन की अनुभूति (स्थूल-सूक्ष्म देह का भी बोध
नहीं। विश्वोऽहं का बोध) नदन—विज्ञानमय से आनन्दमय कोष में गति ॥ नाद—
नदन किया आस्वाद।
'नादान्त' ही ब्रह्मरंध्रस्थ ज्योति का स्थान है। उसी के बाद 'चिदाकाश' में
गति। बिन्दु का नामान्तर 'चिदाकाश' है।
१. नादस्तु पद्मरागवदण्डद्वयमध्यवर्तिनीव सिरा।

१२० वरिवस्यारहस्ये
'नादान्त'—ब्रह्मरंध्र में नादान्त है । यह भी शून्य है ।१ 'नाद' पद्मराग की
कान्ति वाल । दो अण्डों के मध्य वर्तमान सिरा की भाँति स्थित है । बाईं ओर
स्थित बिन्दु से युक्त, विद्युतवत प्रकाशित 'नादान्त' हल की आकृति के समान है ।
'शक्ति'—दो बिन्दुओं के बाएँ से उदित होने वाली सिरा की आकृति वाली
होती है ।२ 'व्यापिका' बिन्दु एवं उसके ऊपर त्रिकोण के समान आकृति वाली है ।३
'समना' की आकृति रेखा के ऊपर-नीचे स्थित दो बिन्दुओं के समान होती है ।४
ऊपर वाले बिन्दु के बिना उपर्युक्त समना ही 'उन्मना' है । इसके ऊपर 'महाबिन्दु'
स्थित है ।५
रुन्धिनी, रोधिनी, रोद्धा, ज्ञानरोधा, तमोपहा—ये 'अर्धचन्द्र' में स्थित पाँच
कलायें हैं । इसी प्रकार रुन्धिनी, रोधिनी, रोद्धा, ज्ञानरोधा, तमोपहा—ये
'निरोधिका' की कलायें हैं । नाद की कलायें निम्न हैं—'इन्धिका दीपिका चैव
रेचिका मेचिका तथा ऊर्ध्वगा तासां पञ्चमी परमा कला ।।' नाद का अन्त ब्रह्मरंध्र में
होता है—'नादस्यान्तो लयो यत्र भवति ब्रह्मरन्ध्रक ।।' 'नादान्त'—नाड्याधारस्तु
नादान्तोभित्वा सर्वमिद जगत् ।।' 'शक्ति'—शक्तितत्वं समाख्यातं भुवनैरावृतं महत् ।
'शक्तिर्बिन्दुद्वयमध्ये वामभागस्थबिन्दूद्यत्स्थिरा रूपा ।।' (दीपिका) ।।
परमात्मा की जो पाँच शक्तियाँ हैं उनमें से मात्र 'इच्छाशक्ति' ही 'उन्मनी' से
सम्बंध रखती है—
सा शक्तिः परमा सूक्ष्मा उन्मना शिवरूपिणी ।
अस्तित्वमात्रत्मात्मानं क्षोभ्यं क्षोभयते सदा ।। ६० ।।
समानासौ विनिर्दिष्टा शक्तिः सर्वाध्ववर्तिनी ।
क्रीडीकरोति या विश्वं संहृत्य सृजते पुनः ।। ६१ ।।
कुण्डलाख्या महाशक्तिस्तृतीयाप्युचर्यते ।
ध्वनिरूपो यदा स्फोटस्त्व दृष्टाच्छिव विग्रहात् ।। ६२ ।।६
सारांश—'इच्छाशक्ति' = 'उन्मना'—'समना'—कुण्डलिनी नादस्वरूप सदाशिव
—निरोधिका ।।
१. नादान्तस्तडिदाभः सव्यस्थितबिन्दुयुक्तलाङ्गलवत् ।
२. तिर्यग्बिन्दुद्वितये वामोदगच्छत्सिराकृतिः शक्तिः ।
३. बिन्दुद्गच्छत्त्र्यश्राकारधरा व्यापिका प्रोक्ता ।
४. ऊर्ध्वाधोबिन्दुद्वयसंयुतरेखाकृतिः समना ।
५. सैवोर्ध्वबिन्दु हीनोन्मना तदूर्ध्वं महाबिन्दुः ।
'अर्धचन्द्रो' बिन्दोरर्धभाराः तथाकारो दीपाकार एव । ज्योत्स्नाकारा चन्द्रिका-
समकान्तिः । तदष्टांशा मात्राष्टांशोच्चारणकाला । त्र्यस्रविग्रहा त्रिकोणाकारा
'रोधिनी' अर्धचन्द्रस्तदूर्ध्वं तु रोधिनी तस्य चोपरि । ज्योत्स्ना ज्योत्स्नावती
कान्तिः सुप्रभाविमलापि च ।। (स्वच्छन्द तन्त्र)
६. नेत्रतन्त्र

प्रथमोऽंशः १२१
'व्यापिनी'—की मात्रा १।१२८ एवं समना की मात्रा १।२५६ है ।
किसी-किसी के मत में उन्मना की मात्रा १।५२ है । अन्य के मत में इसके
उच्चारण का काल है नहीं क्योंकि यह मन के अतीत है । यहीं नादरूपी शब्दब्रह्म
का अन्त है । यही पञ्चम नाद है और नवनादों में नवीं भूमि है । पाँच शून्यों में
पाँचवाँ शून्य व्यापिनी' है । व्यापिनी में त्वक् और केशस्थान में व्याप्ति होती है
शिखा केशस्थान में या समना पद में केवल मनन ही रहता है किन्तु मनन का
कोई विषय नहीं रहता ।¹
१।२५६ मात्रा के मन की सूक्ष्मतमा मात्रा का उच्चारण समझा जाता है ।
मात्रा के और भी शून्य होने पर मन की क्रिया को रखा नहीं जा सकता अतः
उसे 'उन्मना' कहा जाता है । उस समय मन को पकड़ा नहीं जा सकता । मन
चन्द्रमा है और काल राहु है । मन के न रहने पर काल का भय नहीं रहता ।
'समना' है—'कृष्णा चतुर्दशी' है तो 'उन्मना' है—'अमावस्या' । 'बिन्दु'—'पूर्णिमा'
है । उन्मना में सूक्ष्म मन भी नहीं है किन्तु संस्कार है । समना में सूक्ष्ममन है ।²
विश्व से समना तक सूक्ष्म वर्ण का उच्चारण काल अर्धमात्रा से एक मात्रा का
१।५१२ भाग है । काल की सूक्ष्मतम इकाई 'लव' है । १।२५६ मात्रा को मन
की सूक्ष्मतम मात्रा का उच्चारण समझा जाता है ।³
'व्यापिनी' की निम्न कलायें हैं—
व्यापिनी व्योमरूपा च ह्यनन्तानाथ संज्ञिता ॥ ४४ ॥
अनाश्रिता महेशानि व्यापिन्यास्तु कला स्मृता ।
समना की कलायें निम्न हैं⁴—
सर्वज्ञा सर्वगा दुर्गा सवना स्पृहणा धृतिः ॥ ४५ ॥
समना चेति विख्याता एताः शिवकलाः स्मृताः ।
'समना' तक ही पाशजाल है—
'समनान्तं वरारोहे पाशजाल मनन्तकं ।'
इसके ऊपर (उन्मना में) की स्थिति परम शान्त है—अप्रमेय—अनामय है—
'तदूर्ध्वं तु परं शान्तम प्रमेय मनामयम् ॥'⁵
'द्वादशसंहतिः' = व्योम (ह), अग्नि (र), वामलोचना (ई), बिन्दु (.),
अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना—बारह का
समूह ॥
'नाद' = बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना
एवं उन्मनी = इन ९ का समूह ॥
१-५. नेत्रतन्त्र

१२२ वरिवस्यारहस्ये
प्रथमेऽष्टादश वर्णा द्वाविंशतिरक्षराणि मध्ये स्युः ।
प्रथमेन तुल्यमन्त्यं सङ्घातेनाष्टपञ्चाशत् ॥ १४ ॥
(कूटत्रय में वर्ण संख्या)
प्रथम कूट (वाग्भव कूट) में अठारह एवं मध्य कूट (कामराज कूट) में बाईस
वर्ण हैं । अन्तिम कूट (शक्तिकूट) में प्रथम के समान (अर्थात् अठारह वर्ण) हैं
(और इस प्रकार) सब मिलाकर अट्ठावन वर्ण होते हैं ॥ १४ ॥

  • सरोजिनी *
    'मन्त्र' (पञ्चदशाक्षरी मन्त्र)
    ┌────────────────────────┼────────────────────────┐
    'वाग्भवकूट' 'कामराजकूट' 'शक्तिकूट' (श्रीकूट)
    (१८ वर्ण) (२२ वर्ण) (१८ वर्ण) = ५८ वर्ण
    ('क ए ई ल ह्रीं') ('ह स क ह ल ह्रीं') ('स क ल ह्रीं')
कूटमन्त्राक्षरमन्त्राक्षर संख्याह्रीं के अवयवमहायोग
(१) 'वाग्भव कूट'क् + अ, ए, ई,<br>(१) (१) (१) (१)<br>ल् + अ<br>(१) (१)६१२१८
(२) 'कामराजकूट'ह् + अ, स् + अ,<br>(१) (१) (१) (१)<br>क् + अ, ह् + अ,<br>(१) (१) (१) (१)<br>ल् + अ<br>(१) (१)१०१२२२
(३) 'शक्ति कूट'स् + अ, क् + अ,<br>(१) (१) (१) (१)<br>ल + अ<br>(१) (१)६१२१८
<td colspan="3">पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के<br>समस्त वर्णों की<br>संख्या = ५८</td>
महायोग२२ वर्ण२२३६५८

प्रथमोऽंशः १२३
निष्कर्ष—
(१) ‘वाग्भवकूट’—‘क ए ई ल ह्रीं’—‘क’ (क् + अ), ‘ए’, ई, ल (ल

  • अ) = ६ वर्ण ।। ह्रीकार के वर्ण ह, र्, ई, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद,
    नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मनी = १२ वर्ण ६ + १२ = १८ वर्ण
    (२) ‘कामराजकूट’ = ‘ह स क ह ल ह्रीं’—ह् + अ, स् + अ, क् +
    अ, ह् + अ, ल् + अ = १० वर्ण ।
    ह्रीं के १२ वर्ण—ह, र्, ई, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति,
    व्यापिका, समना, उन्मनी = १२ वर्ण । योग = १० + १२ = २२ वर्ण
    (३) ‘शक्तिकूट’ = ‘स क ल ह्रीं’
    स् + अ, क् + अ, ल् + अ, = ६ वर्ण, ‘ह्रीं’ के १२ वर्ण (ह + र् +
    ई + बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नाद, शक्ति, व्यापिका, समना उन्मनी) =
    १२ वर्ण ।। योग = ६ + १२ = १८ वर्ण
    (६ + १० + ६) + १२ + १२ = (२२ + ३६) = ५८ वर्ण ।।
    भास्करराय इसी तथ्य को इस प्रकार पुष्ट करते हैं—
    ‘एवं च प्रथम तृतीय कूटे अष्टादश वर्णात्मके । मध्यकूटं तु चतुरधिकम्
    संहत्याष्ट पञ्चाशद्वर्णात्मिका विद्येति सिद्धम् ॥१’
    वर्णानां कालानाह—
    मात्राद्वितयोच्चार्या कामकला च त्रिकोणा च ।
    बिन्दुरहितहल्लेखा मात्राकालत्रयोच्चार्याः ॥ १५ ॥
    अन्येषां वर्णानां मात्राकालो ऽर्धमात्रया सहितः ।
    बिन्दोरर्ध मात्रा परे परे चापि पूर्वपूर्वार्धाः ॥ १६ ॥
    संहत्यैकलवोनो मात्राकालोऽस्य नादस्य ।
    (‘कामकला’, ‘त्रिकोण’ एवं ‘हल्लेखा’ का उच्चारणकाल)
    कामकला (ई) एवं त्रिकोण (ए) का उच्चारण दो मात्राओं द्वारा एवं
    बिन्दु-रहित हल्लेखा (ह्रीं) का उच्चारण तीन मात्राओं से (तीन मात्रा काल के
    बराबर) किया जाना चाहिए) ॥ १५ ॥
    अन्य वर्णों (के उच्चारण) का काल अर्धमात्रा सहित मात्रा-काल (अर्थात् डेढ़
    मात्राकाल) एवं बिन्दु का अर्धमात्राकाल है । उत्तर वर्ती का वर्णों का उच्चारण-काल
    अपने पूर्ववर्ती (वर्ण के उच्चारण-काल का) का आधा होना चाहिए ॥ १६ ॥

१. वरिवस्यारहस्यम्