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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 530 में से

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पृष्ठ 220

११८ वरिवस्यारहस्ये
सिद्धावस्था समस्त विश्व के बाह्य रूप का दर्शन इन्धिका दीपिका चैव रोचिका
मोचिका तथा । ऊर्ध्वगामिन्यः इत्येताः कला नाद समुद्भवाः । एता स्वतन्त्रता युक्ताः
सकले निष्कले स्थिताः । ज्ञानशक्तिस्वरूपास्तु ज्ञाताः सार्वज्ञ्यदायिकाः ॥" (नेत्रतन्त्र)
बिन्दु में 'अर्धचन्द्र' नाम की एक अवान्तर अवस्था है । इसके बाद ही निरोधिका
आती है । निरोधिका का प्राचीर पार किये बिना 'नाद' में जाना असंभव है ।
बिन्दु एवं अर्धचन्द्र तथा पातञ्जल योग—पातञ्जल में जिस अपर वैराग्य एवं
पर वैराग्य का वर्णन मिलता है उसका स्वरूप क्या है? अपर वैराग्य से
भोग-वितृष्णा एवं पर वैराग्य से त्रिगुण-वितृष्णा प्राप्त होती है पर वैराग्य—
'पुरुषख्याते र्गुणवैतृष्ण्यम्' पुरुष-साक्षात्कार—प्रकृति का दर्शन—प्रकृति के प्रति
वितृष्णा—विवेकख्याति की पूर्णता-पुरुष की केवली रूप में आत्मप्रतिष्ठा । तांत्रिक
योगी का लक्ष्य ब्रह्माण्ड का ईश्वरत्व या कैवल्य प्राप्ति नहीं है । ये काल-मार्ग को
नष्ट करने के लिए अग्रसर होते हैं । ये योगी सुषुम्णा में प्रवेश करके काल भेदन
करते हैं ।
'अर्धमाला एवं पतञ्जलि'—एकाग्रभूमि में उदित होने वाली प्रज्ञा है—
अस्मिता प्रज्ञा । काल यहाँ भी है । पातञ्जल योग की साधना थी—काल को
संक्षिप्त करते-करते अर्धमात्रा तक ले जाना । पातञ्जल योगी स्थूल योगी हैं ।
उनके विश्व का ज्ञान इस अर्धमात्रा में ही पर्यवसित हो जाता है—यही है अस्मिता
ज्ञान ।
'अर्धमात्रा', 'बिन्दु' एवं 'अर्द्धन्दु'—अर्धमात्रा 'एकाग्रभूमि' है और उसके बाद
है (पातञ्जल) 'निरोधभूमि' ।। मात्रा के विषय में आचार्यों का मत निम्न है—(१)
ह्रस्व स्वर का उच्चारण-काल एक मात्रा है । दीर्घ का दो मात्रा है । प्लुत का दो
से अधिक मात्रा है । जो ह्रस्व दीर्घ एवं प्लुत तीनों नहीं है किन्तु व्यञ्जन है—
उसकी काल-मात्रा 'अर्धमात्रा' है—"व्यजनं चार्धमात्रकम ।।" हलन्त-अर्धमात्रा है ।
परमशिव का स्थान तो 'महाबिन्दु' है किन्तु वहाँ तक पहुँचने के पूर्व अनेक
सोपानों का अतिक्रमण करना पड़ता है यथा—बिन्दु, अर्धचन्द्र आदि ।।
'बिन्दु' की प्राप्ति षट्चक्र भेदन के बाद होती है । इसके बाद ही काल एवं
माया तथा मन की मात्रा क्षीण हो पाती है । षट् चक्र का भेदन करके आज्ञा चक्र
के जिस बिन्दु की हमें प्राप्ति होती है वही यह 'बिन्दु' है । आज्ञाचक्र तक विश्व,
उस बिन्दु में, समाप्त हो जाता है । इस बिन्दु से ऊपर उठने के लिए अर्धमात्रा
का अवलम्बन लेकर 'महाबिन्दु' तक उठना आवश्यक है । बिन्दु से महाबिन्दु का
नाम ही है—सरल मार्ग । 'बिन्दु' की स्वाभाविक मात्रा है—'अर्ध' । यही 'बिन्दु'
योगमार्ग है क्योंकि यहीं से सरल मार्ग का आरंभ है । इस मार्ग में प्रवेश करके
क्रमशः उठते-उठते काल के सूक्ष्मतम परमाणु तक पहुँचा जा सकता है । उपाय
है—अर्धमात्रा का अवलम्बन । एकाग्रता के द्वारा 'बिन्दु' प्राप्त होता है । काल के
कुटिल मार्ग में भौतिक एवं काल्पनिक विश्व स्थित है । इसी तरह काल के सरल
मार्ग में भी विराट विश्व स्थित है । इसका दर्शन काल के राज्य में रहकर कर