वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः ११५
‘समना’ और ‘उन्मना’ ये दोनों ब्रह्म शक्तियाँ हैं । ‘समना’ शक्तितत्त्व का
आश्रय लेकर परब्रह्म की इच्छा के अनुसार सृष्टि विस्तार करती है और ‘उन्मना’
शिवत्व का आश्रय लेकर परब्रह्म की विमर्शहीन विश्वातीत दिशा में उन्मुख होती
है। नादान्त से उन्मनापर्यन्त अवस्था तुर्यातीतावस्था’ कही जाती है । उन्मना से परे
और किसी भी प्रकार की अवस्था नहीं है । एक मात्रा विभक्त होकर अर्धमात्रा में
परिणत होती है । स्थूल विश्व की अनुभूति मन की जिस मात्रा में होती है उसे
एक मात्रा कहते हैं । स्थूल लौकिक अनुभूति का आरंभ इसी एक मात्रा में है ।
मात्रा का वैपुल्य जाड्याधिक्य का कारण है । व्यापिनी की मात्रा १।१२८ समना
की मात्रा १।२५६ है । उन्मना अमात्रक है । किसी-किसी के मत में उन्मना की
मात्रा १।५१२ है ।
‘समना’ की ऊर्ध्व कोटि ‘उन्मना’ है । यह अतीत मन के भी अतीत है ।
इस स्थान में आत्मा का विकल्पशून्य केवल स्वरूप में अवस्थान है । यह
अनिर्देश्य एवं अमेय है । ‘उन्मना’ नौ नादों में नवम नाद है । ‘बिन्दु’ में जिस
नाद समूह की सूचना मिलती है उसकी इसी ‘उन्मना’ में अवसान होता है । यही
‘महाशून्य’ है । इसके बाद ही ‘शब्दब्रह्म’ है । इससे भी ऊपर ‘महाबिन्दु’ है ।
महाबिन्दु ही सदाशिव है । इसी के ऊपर ‘चित्कला’ (चिच्छक्ति) (परावाक्, परा
मात्रा के विलासस्वरूप) क्रीड़ा करती है । शुक्ल एवं रक्त बिन्दुरूप प्रकाश-
विमर्शात्मक कामकलाक्षर के सङ्घट्ट से ‘चित्कला’ अभिव्यक्त होती है ।
‘स्वच्छन्दसंग्रह’ में ‘समना’ का स्वरूप इस प्रकार प्रकट किया गया है—
‘चिदानन्दस्वरूपा तु परा शक्तिस्तदूर्ध्वतः । समना नाम सा शक्तिः सर्वकारण
कारणा ॥१ सर्वाण्डानि बिभर्तीयं शिवेन समधिष्ठिता । प्रत्यारूढः स भगवान शिवः
परम कारणः ।। सृष्टिं स्थितिं च संहारं तिरोभावमनुग्रहम् । शिवः करोति सततं
सर्वकारण कारणः । शिवः सर्वस्य कर्तैयं शक्तिः कारणमिष्यते ॥’२
‘उन्मना’ क्या है? ‘एतस्माद बिन्दोर्विलसद ऋजुरेखा उन्मना ।।' 'उन्मना' का
स्वरूप इस प्रकार है—‘या शक्तिः कारणत्वेन तदूर्ध्वे उन्मना स्मृता । मनः संक्रमते
यत्र तेन सा उन्मना स्मृता । नात्र काल कला भावो न तत्त्वं न च देवता ॥
सुनिर्वाणं परं शुद्धं रुद्रवक्त्रं तदुच्यते । शिवशक्ति रितिख्याता निर्विकल्पा निरञ्जना ॥३
‘उन्मनी’ ‘निराकारा एवं निरुच्चारा' है । ‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा
सह’—कहकर जिस अवाङ्मनोऽतीतगोचर पद को निर्देशित किया गया है वही है
‘उन्मना’ ।४
यदि बिन्दु के ऊपर एक ऊर्ध्वरेखा खींच दी जाय तो उसे ही “उन्मना” का
आकार कहा जायेगा । ‘समना’ के सिर पर स्थित बिन्दु का अपनयन करने पर
‘उन्मना’ का आकार निर्मित हो जाता है ।५
१. स्वच्छन्द तन्त्र २. स्वच्छन्द संग्रह
३. स्वच्छन्द तन्त्र ४. अमृतानन्दनाथ-योगिनीहदय दीपिका
५. सेतुबन्ध