सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 218

११६ वरिवस्यारहस्ये
काल-निर्धारण१—(१) ‘व्यापिका’ में दो लव हैं । (२) ‘समना’ में एक लव
है (३) ‘उन्मना’ में आधा लव है । (व्यापिकाया द्वौ लवौ, समनाया एको लवः,
उन्मनायास्तु लवार्धात्मकः कालः । मनोन्मनीति समनाया एवं संज्ञान्तरम् । यथा
समनायाः कालस्तथैवोन्मनीकालः । एक लवात्मक एव काल इति यावत् । एतदूर्ध्वं
कालानवच्छेदः— “देशकालानवच्छिन्नं तदूर्ध्वं परमं महत् ॥”२ वैसे यह भी कहा गया
है कि (१) शक्ति के ऊर्ध्व में द्विगुणित, ‘व्यापिका’ के बाद ‘समना’ में द्विगुणित
एवं इसी प्रकार उत्तरोत्तर द्विगुणित-द्विगुणित माया में उच्चारण-काल कम होता जाता
है । किन्तु ‘ततश्चोन्मनाया इह कालविधिर्नास्त्येव ॥” उन्मना में काल है ही नहीं ।
‘उन्मनी’ में नाद-लय को ही ‘कालविषुव’ कहते हैं ।३
काल गणना—(योगिनीहृदय के अनुसार)—शक्त्यादीनां वपुः स्फूर्जद्
द्वादशादित्यसन्निभम् । चतुःषष्टिरतदूर्ध्वं तु द्विगुणं द्विगुणं ततः । शक्त्यादीनां तु
मात्रांशो मनोन्मन्यास्तथोन्मनी ॥४ समना के ऊपर स्थित उन्मना में काल कलाभाव
तत्त्व एवं देवता कोई नहीं है—‘यावत्सा समना शक्तिस्तदूर्ध्वे उन्मना स्मृता । मात्र
कालकलाभावो न तत्त्वं न च देवता । सुनिर्वाणं परं तत्त्वं रुद्रवक्त्रं तदुच्यते । शिव-
शक्तिरितिख्यातं निर्विकारं निरञ्जनम् ।। तत्वातीतं वरारोहे वांभनोतीत गोचरम् ।।'५
बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति (व्यापिनी, समना, उन्मनी)—
योगियों की नौ चिन्मय भूमियों में प्रथम भूमि ‘बिन्दु’ है—मूलाधार से उठने वाला
‘नाद’ वर्णों के मध्य अनुविद्ध होकर माला में पिरोये सूत्र की भाँति प्रतीत होता
है—
‘आधारोत्थितनादो गुणा इव परिभाति वरामिध्यगतः ।।’’
(१) ‘बिन्दु’—भाल के मध्य वृत्ताकार रूप में दीप की भाँति देदीप्यमान
रहता है—“मध्येफालं बिन्दुदीप इवाभाति वर्तुलाकारः ।।” भ्रूमध्य में ललाट की
ओर कुछ ऊपर ‘बिन्दु’ का स्थान है । यह वर्तुलाकार दीप के समान है । इस
भूमि में ज्योतिर्मय ज्ञानरूप में ईश्वर बोध की सूचना होती है । यहाँ प्रवेश करने
पर जागतिक ज्ञान विलुप्त हो जाता है । यह समाधिजन्य प्रज्ञा से ऊपर की
अवस्था है क्योंकि समाधि जन्म ज्ञान जागतिक ज्ञान है । अर्द्धमात्रा का ज्ञान
चिन्मयानुभूति है । ओङ्कार के अकार-उकार-मकार इन तीन मात्राओं में स्थूल,
सूक्ष्म एवं कारण रूप में भेद है—ये सारे भेद जहाँ पिण्डीभूत होकर अविभक्त
रूप में स्थित होते हैं वहीं ‘बिन्दु’ है । यहाँ वेद्य या ज्ञेय ही प्रधान है । स्थूल
भूमि में भी नाद के नौ विभाग हैं और सूक्ष्म भूमि में भी नौ विभाग हैं । ‘बिन्दु’
का उच्चारण-काल आधी मात्रा में नहीं पहुँचने तक योगभूमियाँ नहीं पाई जाती ॥
योगियों के पञ्च शून्यों में प्रथम शून्य ही ‘बिन्दु’ है । बिन्दु-स्तर में बीज नहीं
रहता । यहाँ प्रकृति का स्फुरण नहीं रहता ।
१-३. सेतुबन्ध ४. योगिनी हृदय
५. स्वच्छन्द संग्रह : यही शिवपद ‘निर्द्वन्द्वं परमं शान्तं शिवाख्यं परमं पदं’